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रसवती ‒ बन्ध मोक्ष कारणम्

डॉ मधु कपूर* "कोई सवाल उठा सकता है ‘बन्ध’ और ‘मोक्ष’ यह तो एक तरह का विरोधी समन्वय...

बूढ़े हँसते क्यों हैं?

ओंकार केडिया* ओंकार केडिया के पैने आलेखों की बानगी आपने उनके पिछले लेख अमलतास, गुलमोहर और गुलज़ार  में देख...

सभी मनुष्य मरणशील हैं

पिछले कुछ समय से दार्शनिक सिद्धांतों को हमारी वेबपत्रिका के लिए सहज-सुगम शैली में प्रस्तुत कर रहीं डॉ मधु कपूर का यह...

अमलतास, गुलमोहर और गुलज़ार 

ओंकार केडिया* ओंकार केडिया की कविताओं से आप पहले ही परिचित हैं। इस वेब पत्रिका में प्रकाशित उनकी अनेक...

अनसुलझा समीकरण

डॉ मधु कपूर* पिछले कुछ समय से दार्शनिक सिद्धांतों को हमारी वेबपत्रिका के लिए सहज-सुगम शैली में प्रस्तुत कर...

मैं शब्दों का जादूगर हूँ

सुधीरेंद्र शर्मा* “जो जाने-माने कवि और गीतकार आनंद बक्शी को नहीं जानता वो हिंदी सिनेजगत से वाकिफ नहीं है”,...

स्त्री-चेतना की खिड़कियाँ

ओम निश्चल* पारुल बंसल की कविताएं इस वेबपत्रिका में प्रकाशित होती रही हैं और इस पत्रिका के...

DOES SOCIAL MEDIA INFLUENCE VOTING BEHAVIOUR?

Manoj Pandey* I am neither a psephologist nor a political analyst. I am a media/ social media watcher...

शाम आती है, आती रहेगी

सुधीरेन्द्र शर्मा* क्या यह कहना सही होगा कि हम कुछ खास दिनों को तो 'सेलिब्रेट' करते हैं (जैसे आज...