स्वास्थ्य सेवाओं का निजी हाथों में सौंपना कहाँ तक उचित?

आखिरी पन्ना

आखिरी पन्ना उत्तरांचल पत्रिका के लिए लिखा जाने वाला एक नियमित स्तम्भ है। यह लेख पत्रिका के फरवरी 2020 अंक के लिए लिखा गया।

इस स्तम्भ में राजनीति और समाज पर ही ज़्यादा बात होती है और इसलिए जब इस बार पता चला कि उत्तरांचल पत्रिका का यह अंक स्वास्थ्य विशेषांक है तो इस स्तंभकार को कहा गया कि वह भी देश में स्वास्थ्य की स्थिति पर लिखे। हमने एक आम जागरूक नागरिक की तरह सरकार की योजनाओं के बारे में सुना-जाना है और एक पाठक के तौर पर कुछ पढ़ा भी है। उसी आधार पर यह स्तम्भकार अपनी बात कहेगा।

आज देश में जब स्वास्थ्य पर बात होती है तो सबसे पहले आयुष्मान भारत या प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की याद आती है जिसे सरकार ने काफी धूम-धाम से प्रचारित किया है। सुनने में बुरी भी नहीं है योजना – आखिरकार ये दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना है जिसके अंतर्गत देश के 10.74 करोड़ परिवार आ जाते हैं जिनमें लाभार्थियों की कुल संख्या 50 करोड़ के आस-पास बनती है। इस योजना को बीमा कम्पनियों और निजी क्षेत्र के बड़े अस्पतालों के साथ मिलकर शुरू किया गया है। सरकार इसी बात को सकारात्मक मानकर प्रचारित करती है और स्वास्थ्य सक्रियकर्मी (या हेल्थ एक्टिविस्ट) इसी बात को आलोचना का सबसे बड़ा मुद्दा बनाते हैं। उनके तर्क भी तब गलत नहीं लगते जब वो कहते हैं कि ये स्कीम तो सरकारी पैसा (यानि जनता से करों के रूप में इकट्ठा किया गया सार्वजनिक पैसा) प्राइवेट अस्पतालों और प्राइवेट बीमा कंपनियों को बांटने का तरीका है अन्यथा इसी पैसे का इस्तेमाल सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं को सुधारने में क्यों नहीं किया जाता?

इतना ही नहीं, स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाली स्वयंसेवी संस्थाएं तो यहाँ तक कहती हैं कि देश की केंद्र और राज्य सरकारें एक तरह से निजी क्षेत्र (प्राइवेट क्षेत्र) की स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ बीमा कंपनियों साथ भी मिल गई हैं और सरकारी प्राथमिक चिकित्सा केन्द्रों से लेकर बड़े बड़े सरकारी अस्पताल तक निजी हाथों में सौंपने की तैयारी में लगी हैं। चूंकि ये लिखने का नोटिस छोटा था, इस स्तंभकार के पास समय नहीं है कि वह  इस विषय पर जानकार लोगों से बात करे या पब्लिक डोमेन में उपलब्ध सामग्री के आधार पर कोई ठोस राय आपके सामने रखे, किन्तु इतना तो निश्चित है कि स्वास्थ्य सेवाएँ प्राइवेट करने की मुहिम की शुरुआत यूपीए सरकार के समय से ही हो गई थी। बीमा कम्पनियों को जोड़ने का मॉडल मनमोहन सिंह सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के रूप में खड़ा किया था जिसके तहत असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को एक निश्चित खर्चे के अंतर्गत इलाज की सुविधा देने की बात की गई थी।  

अगर आप ये सोच रहे हों कि स्वास्थ्य सेवाएँ अगर प्राइवेट हो जाएँ तो अच्छा ही है और आपके दिमाग में बड़े-बड़े प्राइवेट अस्पताल आ रहे हैं कि सबको अपोलो, मैक्स या फोर्टिस जैसे अस्पतालों की सेवाएँ मिलने लगेंगी तो आप दुबारा सोचिए! ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा बल्कि आपके द्वारा दिये जाने वाले करों (आप जो भी सामान खरीदते हैं तो उसमें सरकारी टैक्स जुड़ा होता है) से होने वाली आय को प्राइवेट अस्पतालों और प्राइवेट बीमा कंपनियों को आसानी से पहुँचने लगेगी। प्राइवेट कम्पनियों की इस बात मेँ कोई रुचि नहीं होगी कि आप स्वस्थ रहें, उनका पहला उद्देश्य होगा पैसा कमाना – चाहे वो गरीब लोगों का इलाज लटकाए रखकर हो या फिर दवा बनाने वाली कंपनियों से हिस्सेदारी करके गैर-ज़रूरी और महंगी दवाइयाँ उनके गले के नीचे उतार कर हो।

भारतीय दवा कंपनियाँ अपनी कारगुजारियों के लिए अब दुनिया भर में बदनाम हो चुकी हैं। खास तौर पर तब जब करीब साल भर पहले एक किताब आई – “बॉटल ऑफ लाईज़ : रैनबैक्सी एंड द डार्क साइड ऑफ इंडियन फार्मा” जिसे किसी कैथरीन एबन नामक एक खोजी पत्रकार ने लिखा और जिसकी चर्चा भारत में कम लेकिन विदेशों में ज़्यादा हुई। न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी इस किताब के बारे में छापा। आप भी इंटरनेट पर इस किताब के बारे में पढ़कर ये अनुमान लगा सकते हैं कि हमारी दवा कंपनियाँ क्या-क्या कारगुज़ारियाँ करती हैं।

ऐसे में गरीबों तक आसान ढंग से इलाज पहुंचे, इसके लिए होना क्या चाहिए, इसकी कोई लिस्ट इस स्तंभकार के पास चाहे नहीं है लेकिन संचित अनुभव के आधार पर समझ आ रहा है कि स्वास्थ्य सेवाओं का निजीकरण तो इसका समाधान कतई नहीं है।

सबसे पहली बात तो मन में ये आ रही है कि देश के ग्रामीण क्षेत्रों या छोटे कस्बों में या फिर आदिवासी इलाकों में जहां अभी आधुनिक दवा पद्धति ने अपनी पहुँच नहीं बनाई है, कम से कम ऐसी जगहों पर तो पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों को ना मरने दें बल्कि उनके पुन: उद्धार के लिए कुछ करें। जहां अभी डॉक्टर नहीं पहुँच पा रहे, वहाँ उपलब्ध हैल्थ-वर्कर्स या गाँव में जो पारंपरिक दाइयाँ हैं, उन्हें कुछ सुविधाएं दिलाई जाएँ वो अपने काम को ज़्यादा अच्छे से और साधिकार कर सकें। प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों (PHCs) को प्राइवेट हाथों में सौंपने की बजाय उन्हें स्थानीय सरकार के अंतर्गत रखकर ही मजबूत किया जाना चाहिए। पीने का स्वच्छ पानी सबको उपलब्ध हो, विद्यालयों में छोटे बच्चों को पोषण आहार ठीक से मिले और आंगनवाड़ियों में शिशुओं और उनकी युवा माँओं को नियमित आहार मिले – यदि केंद्र सरकार ऐसी सब चीज़ों के लिए धन मुहैया कराये और राज्य सरकारें स्थानीय प्रशासन और संबद्ध समुदायों के साथ साझेदारी करके उपरोक्त व्यवस्थाएं सुनिश्चित करे तो बीमारियाँ भी कम होंगी और शिशु मृत्यु दर भी नीचे आ जाएगी।

करने को तो स्थानीय स्तर पर ही बहुत कुछ किया जा सकता है किन्तु हमारी सरकारें समुदायों से बात करके उनकी देखरेख में ऐसे कार्य शुरू करने की बजाय बाज़ार के माध्यम से जनता का कल्याण करना चाहते हैं। बाज़ार तो फिर ये काम भी बाज़ार की तरह ही करेगा – यानि लाभ कमाने के लिए (व्यापारियों की भाषा में कहें तो दो पैसे कमाने के लिए) ही वो बाज़ार में उतरे हैं। सब जानते हैं कि दो पैसे कमाने का ये लालच गरीब आदमी को तो हाशिये पर खड़ा कर देता है। स्वास्थ्य के मामले में कुछ अलग होगा, इसकी कोई संभावना या आश्वासन नहीं है।