गरीब को भुलाना संभव नहीं – धन्यवाद संविधान निर्माताओ

आज की बात

वर्ष के आरंभ में ही जब चुनावों के लिए मौसम तैयार हो रहा था तो कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी “मिनिमम इन्कम गारंटी” या न्यूनतम आय गारंटी योजना को चुनाव परिदृश्य में लेकर आए थे। कल उन्होंने उसी बात को आगे बढ़ाते हुए यह घोषणा की कि यदि कांग्रेस सत्ता में आई तो देश के 20% सबसे गरीब परिवारों को हर महीने 6 हज़ार रुपए दिये जाएँगे जिससे 5 करोड़ परिवारों को फायदा होगा।

भाजपा ने मामले की गंभीरता को समझा और राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस के तुरंत बाद अरुण जेटली ने भी प्रेस वार्ता की और कहा कि ये मतदाताओं को बेवकूफ बनाने का दांव है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार को भी राहुल गांधी के मुक़ाबले के उतारा गया जिन्होंने इस प्रस्तावित योजना को एकदम अव्यावहारिक बताया। सबसे बड़ा सवाल वही उठाया गया जो जनवरी में जिस समय ‘मिनिमम इन्कम गारंटी’ की बात शुरू हुई थी तो उठाया गया था कि इस योजना को लागू करने का पैसा कहाँ से आएगा?

लेकिन इस स्तम्भ का तात्कालिक उद्देश्य कल हुई इस घोषणा पर हुई सकारात्मक या नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ गिनवाने का नहीं है। हमने इस विषय का चुनाव सिर्फ यह रेखांकित करने के लिए किया है कि 1991 में उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद जहां उच्च वर्ग और मध्यम वर्ग की आय में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है वहीं देश का गरीब इस प्रक्रिया के चौथाई शताब्दी के बाद भी ‘विकास’ में हिस्सेदारी नहीं कर सका है और अभी भी ये ज़रूरत बनी हुई है कि उन्हें अर्थव्यवस्था का हिस्सा बनाने के लिए विशेष उपाय किए जाएँ।  

गनीमत ये है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने सत्तर वर्ष पहले, जब लोकतान्त्रिक व्यवस्था अपने शैशव काल में थी, बिना किसी भेदभाव के सभी वयस्कों के लिए बराबरी के स्तर पर मताधिकार का प्रावधान किया। उस समय तक अमेरिका जैसे उन्नत राष्ट्र में भी ऐसा प्रावधान नहीं था लेकिन हमारे संविधान के द्वारा गरीब से गरीब को भी बिना किसी शर्त के मत का अधिकार मिला। यह बहुत बड़ी बात थी कि क्योंकि भारत अभी आज़ाद हुआ ही था और आबादी का एक बड़ा हिस्सा अंग्रेजों की उपनिवेशवादी नीतियों के कारण ना केवल आर्थिक रूप विपन्न था बल्कि साक्षरता का प्रतिशत भी बहुत कम था और बमुश्किल देश की जनसंख्या का लगभग पांचवा हिस्सा ही साक्षर था।

उस समय संविधान सभा में भी कुछ सदस्यों द्वारा ऐसी आशंका व्यक्त की गई थी कि अशिक्षा और गरीबी के गर्त में पड़े लोग अपने वोट के अधिकार का कैसे इस्तेमाल करेंगे? ऐसी आपत्तियों को दर-किनार करते हुए, फिर भी उस समय के प्रगतिशील नेताओं ने ये सुनिश्चित किया कि बिना शर्त सभी को मताधिकार मिले और देश चलाने के लिए जो लोग चुने जाएँ, उनको चुनने में गरीब की भी भूमिका हो।  

उसी व्यवस्था का ये नतीजा है कि आज जब चुनावों में धन-बल का बढ़ता हुआ प्रयोग एक गंभीर चुनौती बन चुका है, कॉर्पोरेट सैक्टर देश के संसाधनों पर अपना शिकंजा कसता जा रहा है और वोट बटोरने के लिए बहुसंख्यकवाद और जातिवाद का सहारा लिया जा रहा है तो ऐसे समय में भी राजनीतिक दलों को ये ज़रूरी लग रहा है कि उन्हें कुछ ऐसा करना होगा जिससे गरीब से गरीब व्यक्ति तो कुछ ठोस फायदा हो। इसी कारण पहली यूपीए सरकार राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (NREGA) लेकर आई थी जिसकी गिनती अब गरीबों के कल्याणार्थ बनी विश्व की सबसे बड़ी योजनाओं में होती है।

मोदी सरकार को भी राहुल गांधी द्वारा दिया गया “सूट-बूट की सरकार” का लेबल धोने में ख़ासी मेहनत करनी पड़ी और अपने कार्यकाल के अंतिम तीन वर्षों में तो उसने ऐसी योजनाओं की झड़ी लगा दी जो गरीब के कल्याणार्थ या तो नई बनाई गई और या फिर पुरानी चल रही योजनाओं को नया रूप देकर चलाया गया। कुल मिलाकर यह कि गरीब योजनाओं के केंद्र में बना रहा है चाहे वह वर्तमान मोदी सरकार हो या फिर इससे पहले दो पारियाँ रह चुकी यूपीए सरकार। 2019 के चुनावों में भी कांग्रेस और भाजपा द्वारा गरीबों का हिमायती दिखने का प्रयास चल रहा है।

यह तो तब है जब हम सब जानते हैं उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद सरकारों पर ये निरंतर दबाव रहता है कि वो बिजनेस-फ्रेंडली बनें, खासतौर पर विदेशी पूंजी लगाने वालों के लिए रास्ता आसान करें और ऐसे में आईएमएफ़ (IMF) और वर्ल्ड बैंक जैसी संस्थाओं के अलावा अमेरिका जैसे शक्तिशाली देशों का ‘सब्सिडी’ खतम का दबाव रहता है तो ऐसे में ये और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि हमारे यहाँ कम से कम कुछ हद तक तो गरीब नीति-निर्धारण के केंद्र में रहता है।

लेकिन हमारे देश में भी जहां गरीब को वयस्क मताधिकार के रूप में, अभिव्यक्ति की आज़ादी के रूप में और संविधान के ‘डाइरेक्टिव प्रिंसिप्ल्ज़’ (राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत) के रूप में बहुत ही सबल संवैधानिक सम्बल मिला हुआ है, उस सबके बावजूद संसाधनविहीन गरीब और अमीर की ये लड़ाई लंबी चलने वाली है। कारण ये है कि उदारीकरण के बाद जीडीपी (GDP) वृद्धि के जो पैमाने हैं, उन पर खरा उतरने के लिए कॉर्पोरेट सैक्टर जिस तरह की छूट चाहता है, और जो उसे बिना किसी विरोध के भी मिलती भी है, उसके चलते किसी भी सरकार के लिए सबके लिए बुनियादी जरूरतों को जुटाना एक बड़ी चुनौती होगा।

यहाँ यह याद दिलाया जा सकता है कि देश में जब भी गरीब के लिए किसी ‘सब्सिडि’ या छूट की घोषणा होती है तो काफी हाय-तौबा मच जाती है जबकि उच्च वर्ग और मध्यम-वर्ग को सरकारी संसाधनों से ही जो सुविधाएं मिलती हैं, उनके बारे में किसी को याद नहीं रहता। ध्यान दिला दें कि सरकार को होने वाली आय केवल अमीर के द्वारा दिये जाने इन्कम टेक्स से ही नहीं होती बल्कि उसका बड़ा हिस्सा गरीब द्वारा अपने ज़रूरत के सामानों पर दिये जाने वाले टेक्स से भी आता है।

अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यदि अप्रत्यक्ष कर ज़्यादा हों तो गरीब पर उसका असर होता है क्योंकि वह अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा टेक्स के रूप में दे देता है। (“…..Economists say higher indirect taxes have a bigger impact on the wallets of the poor and low-income families, compared to high-income earners, as the former end up paying a larger share of their income as taxes.

“The marginal propensity to consume is near to one for people at the bottom of the pyramid. They spend nearly all their income on things like food, clothing, mobile bill, and other small-ticket consumer items. Given this, a greater proportion of their income goes as indirect taxes, compared to high-income people, who save a significant portion of their recurring income….”) बिज़नेस स्टैंडर्ड अखबार की ये रिपोर्ट पूरी यहाँ देखिये।

देश में सरकारी खर्चों पर चलने वाली तमाम ऐसी सुख-सुविधाएं हैं जिनका लाभ केवल उच्च वर्ग या मध्यम वर्ग ही लेता है लेकिन जिनके लिए पैसा गरीब की जेब से भी निकलता है। सुविधाओं की बात तो छोड़िये, सरकारी बैंक से लिए गए हज़ारों करोड़ के लोन भी सिर्फ अमीरों द्वारा लिए गए हैं जिनका अब भुगतान नहीं किया जा रहा।

ऐसी स्थिति में राजनीतिक दल या हमारी सरकारें अगर आज भी कोई ऐसी योजना चला पाती हैं जो गरीब को सीधा फायदा पहुँचाती हो तो उसका श्रेय हमें संविधान निर्माताओं को ही देना होगा जिन्होंने सबके लिए बराबरी वाले वयस्क मताधिकार को इतना महत्व दिया। वैसे आजकल नेहरू जी को तो कोसने का ही चलन है लेकिन धन्यवाद के पात्र वो भी हैं क्योंकि उन्होंने आज़ादी के तुरंत बाद मिली अपनी ताकत का इस्तेमाल देश में लोकतान्त्रिक संस्थाओं को मजबूत करने में लगाया।

यदि नई सरकार द्वारा (चाहे वह किसी भी पार्टी की सरकार हो) 5 करोड़ परिवारों को 72,000 रुपए वार्षिक की सहायता की यह योजना लागू कर दी गई तो निश्चय ही यह योजना भी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना की तरह ग्रामीण क्षेत्र में गरीबी हटाने के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है।

…..विद्या भूषण अरोरा

3 COMMENTS

  1. आपका विश्लेषण सटीक और सामयिक तो है ही, तथ्यात्मक विश्लेषण इस बात की भी पुष्टि करता है कि आजादी के सात दशक भी यह देश दरिद्रता के अभिशाप से मुक्त नहीं हो पाया है। 1947 मेंं जो गरीब थे, क्या आज 72 साल की उम्र मेंं भी उतने ही अभावग्रस्त हैं या कि उनकी अगली पीढियां विकास तो ठीक विमान की सीढियां चढ़कर पूरे कुनबे को निहाल कर चुकी हैं। अगर कश्मीर से कन्याकुमारी और भुज से अरुणाचल तक देश ने लगातार विकास की करवटें बदली हैंं तो फिर आज 2019 मेंं जिन्हें गरीब मानकर सालाना 72 हजार रुपये देने के उपकार का प्रलोभन दिया जा रहा है, उनके गरीब होने का असली सबब तो पता चले..!

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here