शाम आती है, आती रहेगी

सुधीरेन्द्र शर्मा*

क्या यह कहना सही होगा कि हम कुछ खास दिनों को तो ‘सेलिब्रेट’ करते हैं (जैसे आज Mothers’ Day  मना रहे हैं) लेकिन दिन के भीतर समाए हुए विभिन्न ‘प्रहरों ‘ को नहीं?  करते भी हैं तो बिना यह जाने कि क्यों ऐसा करते हैं.  दिन में आठ प्रहर होते हैं, उनका अपना  महत्त्व भी होता होगा लेकिन हम में से ज़्यादातर को उनकी अहमियत का शायद अन्दाज़ नहीं. अमृत-काल या ब्रह्म-मुहूर्त के बारे में बहुत सुनते आए हैं, इसलिए उसका कुछ अंदाज़ होगा भी लेकिन बदलते परिवेश में यह काल महज काल ही रह गया है, और इस की अहमियत एक अलग चर्चा का विषय हो सकती है. प्रहरों में एक अन्य महत्वपूर्ण केटेगरी है गोधूलि बेला जिसे काफी लोग जानते हैं क्योंकि विवाह के लिए इस प्रहर को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। बहरहाल, यहाँ मूल प्रश्न सिर्फ यह है कि ‘प्रहर’ को हम कैसे समझ रहे हैं. 

 विवाह के लिए चाहे यह सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त हो लेकिन महानगरीय जीवन में ‘गोधूलि-बेला’ इंगित करता है दिन-के-ढलने से रात-के-आने तक का वो प्रहर जब मन बेदिल हो जाता है बिना किसी कारण, और अकेलापन और उदासी घर कर जाती है. यह तो पता नहीं कि ऐसा क्यों महसूस किया जाता है पर ‘उदासी’ शाम को अचानक पसर जाती है. ऐसी अवस्था में गायक तलत महमूद का स्वर कानों में गूंजने लगता है – ‘शाम-इ-गम की कसम, आज ग़मग़ी हैं हम’. यह भी हो सकता है कि तब आप की भावनात्मक स्थिति लता मंगेशकर की याद दिलाये  – ‘यह शाम की तन्हाईआं ऐसे में तेरा ग़म’. शाम को गम से जोड़ा जाता है क्योंकि शाम होते न होते बहुत से लोगों की मन:स्थिति कुछ ऐसी होने लगती है कि उदासी बढ़ जाती है. यूं तो पीने वालों को बस बहाना चाहिए लेकिन ये सच है कि साँझ होते ही ग़म गलत करने के बहाने पीने वालों का जी मचलने लगता है।

मनोवैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि शाम को डिप्रेशन बढ़ जाता है और इसके कारणों में एक सबसे बड़ा कारण यह बताया जाता है कि शाम होते ही हम past conflicts के बारे में सोचने लगते हैं। जो भी हो यह तो लगभग तय है कि ‘शाम’ का प्रहर अपने में बहुत जटिलताओं को सँजोये है जिन्हें समझना ज़रूरी है. शाम को एक परेशानी की तरह देखा जाता है और इस परेशानी से निपटने के कोई ऐसे उपाय नहीं हैं जिन्हें हर व्यक्ति पर लागू किया जा सके। अगर इसे कोई मनोरोग भी मानना है तो इसका कोई मानक या स्टैन्डर्ड उपचार नहीं है। ध्यान बटाने के लिए अब तो ऐसी महफिलें/पार्टियां भी आयोजित की जाती हैं जो इस ‘प्रहर’ से निकलने में सहायक हों. कुछ का तो यह भी मानना है कि ‘happy hours ‘  यूँ ही नहीं होते।

चूंकि यह प्रहर खुद को रोज़ दोहराता है, इस से बचने का प्रयास करने के बजाये इस के साथ व्यस्त होना ठीक होगा. वैसे यूं हर शाम एक जैसी तो होती नहीं, वरना गीतकार कभी नहीं लिखता –  –  ‘वो शाम कुछ अजीब  थी, ये शाम भी अजीब है’.  दिक्कत सिर्फ यह है कि इस प्रहर को गम की ऐसी संज्ञा दे दी गई है कि किसी और ध्यान ही नहीं जाता. गम के भूलाने के तरीकों पर ही नज़र रहती है. मुझे तो लगता है कि इस प्रहर को समझे बिना हमने इस प्रहर की अवहेलना की है बिना यह जाने कि इस प्रहर में कुछ तो होगा जो प्रकृति चाहती है कि जाना जा सके. हो सकता है की यह प्रहर पूरे  दिन का लेखा-जोखा लेने का हो अगले प्रहर में प्रवेश करने से पहले। यह भी हो सकता है कि यह प्रहर प्रतिदिन एक-सा नहीं होता और मौका देने की सनद रहे।

गीतों के माध्यम से भी शाम को गम के सन्दर्भ में ही देखा गया है. लेकिन एक गीत ऐसा भी है जो गम-से सनी शाम को अलग दृष्टि से समझता है. इस के बोल हैं –  ‘रोज़ शाम आती थी, मगर ऐसी न थी’, रोज़ रोज़ घटा छाती थी मगर ऐसी न थी ‘. मजरूह सुल्तानपुरी का लिखा स्वर कोकिला लता मंगेशकर द्वारा स्वरबद्ध लक्ष्मीकान्त-प्यारेलाल की रचना इस विषय पर अलग रोशनी डालती है. इस गीत में शाम को अलग ढंग से समझा गया है – ‘अरमानों का रंग है जहाँ पलकें उठाती हूँ मैं’. गम का तो कोई ज़िक्र ही नहीं है वर्ना यह नई आशा नहीं जगाई जाती  –  ‘होले होले, धीरे-धीरे कोई गीत मुझको सुनाये, प्रीत मन में जगाये खुली आंख सपने जगाये’. गीत के माध्यम से प्रीत और सपने जगाने की बात हो रही है. क्या इस का यह अर्थ मान लिया जाये कि ‘शाम’ मनोरम और आशावान है.  हालांकि एक गीत से ठोस निर्णय तो नहीं लिया जा सकता लेकिन एक मौका मिलता है शाम को अलग ढंग से समझने का. तो क्या हमने इस खूबसूरत ‘प्रहर’ को समझने में ज़रूर भूल की है, क्योंकि अगर ऐसा ना होता तो शाम के प्रहर (गोधूलि बेला) को बेहद ‘शुभ’ क्यों माना जाता? तनिक सोच कर देखें। संगीत ने समय के ‘प्रहरों’ को खूब समझा है.

हर प्रहर विभिन्न ‘राग’ के लिए उपयुक्त माना जाता है. हर राग के लिए अलग-अलग ‘प्रहर’ को निर्धारित किया गया है. अमुक राग को अमुक ‘प्रहर’ में सुनंने से ही राग का पूरा रस निचोड़ा जाता है. यही कारण है राग एक माध्यम बनता है प्रहर को परिभाषित करने का और समझने का.  इस पूरी चर्चा को राजा मेहँदी अली खान और मदन मोहन की एक ख़ूबसूरत रचना के साथ आप को समर्पित करता हूँ – ‘इक हसीं शाम को मेरा दिल खो गया, पहले अपना हुआ करता था अब किसी का हो गया’.  1966 में बनी फिल्म ‘दुल्हन एक रात की’ में प्रदर्शित यह गीत शाम को बहुत खूबसूरती से पेश करता है. तो क्या हम यह मान लें कि शाम का प्रहर इतना भी बुरा नहीं है जितना शायद मान लिया गया है.

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सुधीरेन्द्र शर्मा मूलत: पत्रकार हैं किन्तु बहुमुखी प्रतिभा के स्वामी हैं। जे.एन.यू. से पर्यावरण विज्ञान में पीएचडी तो बरसों पहले पूरी कर ली किन्तु कहते हैं कि “पर्यावरण को समझने अब लगा हूँ – वो भी संगीत के माध्यम से”! संगीत वैसे इन्हें बचपन से ही प्रिय है। फिल्म-संगीत में भी फ़िलॉसफी खोज लेते हैं। इस वेब-पत्रिका में फिल्म-संगीत में छिपी जीवन की गहरी बातों के बारे में आप तान-तरंग नामक केटेगरी में कई लेख पढ़ सकते हैं। पिछले कई वर्षों से गहन विषयों पर लिखी पुस्तकों के गंभीर समीक्षक के रूप में अपनी खासी पहचान बनाई है। इनकी लिखी समीक्षाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं जिन्हें वह अपने ब्लॉग में संकलित कर लेते हैं।

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