डॉ मधु कपूर* दार्शनिक सिद्धांतों को हमारी वेबपत्रिका के लिए सहज-सुगम शैली में प्रस्तुत कर रहीं डॉ मधु कपूर का यह बारहवां लेख है। इससे पूर्व के उनके सभी लेखों के लिंक हम इस...
डॉ मधु कपूर* "कोई सवाल उठा सकता है ‘बन्ध’ और ‘मोक्ष’ यह तो एक तरह का विरोधी समन्वय है. मोक्ष किससे? फिर बन्धन कैसा? यही तो हमारी बिडम्बना है, मन छुटकारा भी पाना...
पिछले कुछ समय से दार्शनिक सिद्धांतों को हमारी वेबपत्रिका के लिए सहज-सुगम शैली में प्रस्तुत कर रहीं डॉ मधु कपूर का यह दसवां लेख है। इससे पूर्व के उनके सभी लेखों के लिंक हम इस लेख के...
डॉ मधु कपूर* पिछले कुछ समय से दार्शनिक सिद्धांतों को हमारी वेबपत्रिका के लिए सहज-सुगम शैली में प्रस्तुत कर रहीं डॉ मधु कपूर का यह नौवां लेख है। इससे पूर्व के उनके सभी लेखों...
सुधीरेन्द्र शर्मा* क्या यह कहना सही होगा कि हम कुछ खास दिनों को तो 'सेलिब्रेट' करते हैं (जैसे आज Mothers’ Day  मना रहे हैं) लेकिन दिन के भीतर समाए हुए विभिन्न 'प्रहरों ' को...
डॉ मधु कपूर* पिछले कुछ समय से इस वेब-पत्रिका में हम विभिन्न दार्शनिक सिद्धांतों पर डॉ मधु कपूर के लेख प्रकाशित कर रहे हैं जिनमें वह दर्शन या फिलोसॉफी की गूढ़ गुत्थियों को हमारे...
डॉ मधु कपूर* आजकल पूरे विश्व में ‘उत्तर-सत्य काल’ या ‘Post-truth Era’ का बोलबाला है। ऐसे में उपलब्ध तथ्यों की पड़ताल करके सत्य की पहचान करना एक दुरूह कार्य हो गया है।...
सुधीरेन्द्र शर्मा* रिश्तेदारी का उद्गम कैसे और कब हुआ इस पर विचार करने से अच्छा तो यह है कि हम यह जांचें कि 'यह कहाँ आ गए यूँ ही साथ-साथ चल के'।  जहाँ तक...
डॉ मधु कपूर* काल का व्यक्तित्व बहु आयामी है। हमारी हर क्रिया में काल कहीं  न कहीं  नेपथ्य में  छिपा रहता है। कोई कहता है यह नित्य अपरिवर्तनीय, निरपेक्ष...
विभिन्न दार्शनिक सिद्धांतों से परिचित होने के लिए पिछले कुछ सप्ताह में डॉ मधु कपूर के चार लेख आप पहले पढ़ चुके हैं। आज के अपने लेख में...

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