विजय प्रताप आज मुझे ऐसे लोगों के बीच बोलते हुए बहुत अच्छा लग रहा है जो धर्म तथा जाति की किसी दीवार को नहीं मानते। वे केवल इंसानियत की जात पर ही...
राजेन्द्र भट्ट नक्कारखाने में तूती – 3 पिछली बार नल-दमयंती की प्रेम- कथा की बात कही थी। नोट कीजिए कि ये प्रेम-कथा हमारे संस्कृत ग्रंथ ‘महाभारत’ में है। बल्कि इस...
अरविंद मोहन* गाँधी की पत्रकारिता बहुत बड़ा विषय है- शायद मेरे जैसे लोगों से न सम्हलने वाला। उनके एक अखबार ‘इंडियन ओपिनियन’ पर वर्षों का समय लगाकर एलिजाबेथ हाफ्मेयर ने ‘द गाँधी प्रेस’ जैसी...
आलोक कुमार* सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। देश के मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय तक को सूचना के अधिकार (आरटीआई) के अधीन कर दिया। यह मामला 2010 से लंबित...
इस सरकार ने मीडिया के पतन को सार्वजनिक कर दिया है और अब कुछ भी छिपा नहीं रहा। चिंता की बात ये है कि यदि सरकार बदल भी जाती है तो भविष्य की सरकारों को यह...
उषा पारिख स्मृतिः जीवन का अर्थ और अर्थमय जीवन -असीम श्रीवास्तव- मैं अपनी बात एक कहानी से शुरू करूं तो अच्छा होगा। मंत्री जी थे, विलायत गए, विलायत से जब लौटे तो...
आलोक कुमार आज बीते सदी के नायक महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती मना रहे हैं। वह इंसानियत के अद्भूत ब्रांड एम्बेसडर रहे। दुनिया में भारत की धवल पहचान बनाने में गांधी का...
‘खिचड़ी सरकारों’ का कार्यकाल आर्थिक विकास के लिए अच्छा ही रहा है! आज की बात आजकल व्हाट्सएप्प और सोशल मीडिया पर राजनीति के नाम पर जो संदेश आ रहे...
राजेन्द्र भट्ट लगता है कि हम इस समय एक बड़े नक्कारखाने में हैं जिसमें, सीधे-सीधे कहें तो ‘पोस्ट-ट्रुथ’ का शोर, धोंस-पट्टी और बेसुरापन है। सोशल मीडिया ने सम्पादकीय संस्था तथा तथ्यों की पड़ताल के फिल्टर...
डॉ गोपाल कृष्‍ण* इन दिनों स्विट्ज़रलैंड की राजधानी जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र की परिसंकटमय जहरीले रसायनों के विषय पर एक सम्मलेन चल रहा है। यह सम्मलेन 29 अप्रैल को शुरू हुआ और 10 मई को समाप्त होगा।...

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