अरविंद मोहन* गाँधी की पत्रकारिता बहुत बड़ा विषय है- शायद मेरे जैसे लोगों से न सम्हलने वाला। उनके एक अखबार ‘इंडियन ओपिनियन’ पर वर्षों का समय लगाकर एलिजाबेथ हाफ्मेयर ने ‘द गाँधी प्रेस’ जैसी...
ओंकार केडिया* मैं सरहद के इस ओर से देखता हूँ उस ओर की हरियाली, कंटीली तारें नहीं रोक पातीं मेरी लालची नज़रों को.
राजेंद्र भट्ट* मीडिया यानि जो संवाद कराए, अकेलेपन को तोड़े और इकतरफा सोच ओर पूर्वाग्रह से बाहर निकाल कर एक समग्र, सुकून देने वाली समझ बनाए। लेकिन हमारे दौर का जो ‘सोशल’ और...
विजय प्रताप आज मुझे ऐसे लोगों के बीच बोलते हुए बहुत अच्छा लग रहा है जो धर्म तथा जाति की किसी दीवार को नहीं मानते। वे केवल इंसानियत की जात पर ही...
In our series on Myths Under the Lens, you have already read the article on numerology “Is numerology a science or myth”. This time the same author MK dwells into the origins of zero which is believed...
अजय तिवारी* बिहार में चमकी बुखार से 140 से अधिक बच्चों की मौत ने आगे बढ़ते भारत का नाम दुनिया में काफी खराब किया है। इन मौतों की वजह सिर्फ हमारी स्वास्थ्य सेवाओं...
MK* I have taken the liberty to generalize some concepts for the sake of simplicity. Puritans may please forgive me for that. As we often do in this column, let me...
प्रेमचंद की जयंती पर राजेन्द्र भट्ट* की श्रद्धांजलि प्रेमचंद की प्रासंगिकता स्वत:सिद्ध है लेकिन फिर भी इस विषय पर लिखने की उस समय तत्काल ज़रूरत महसूस हुई जब पिछले दिनों हिन्दी की एक...
MK* What is radiation? Is there too much unnatural radiation around us now? The notion that cellphones are harmful to humans seems to have arisen from the often-misunderstood word radiation....
राजेन्द्र भट्ट* मशहूर शायर मजाज़ ने एक बिम्ब का इस्तेमाल किया है – ज़ंजीरे-हवा। यानि हवा में ज़ंजीर बना कर किसी को बांधने की कोशिश। गांधीजी और उनके प्रभाव को शब्दों की चौखट...

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