डॉ मधु कपूर* "कोई सवाल उठा सकता है ‘बन्ध’ और ‘मोक्ष’ यह तो एक तरह का विरोधी समन्वय है. मोक्ष किससे? फिर बन्धन कैसा? यही तो हमारी बिडम्बना है, मन छुटकारा भी पाना...
ओंकार केडिया* ओंकार केडिया के पैने आलेखों की बानगी आपने उनके पिछले लेख अमलतास, गुलमोहर और गुलज़ार  में देख ही चुके हैं जिसमें सुकोमल अनुभूतियों के साथ-साथ व्यंग्य का भी सहज मिश्रण था। हाल...
पिछले कुछ समय से दार्शनिक सिद्धांतों को हमारी वेबपत्रिका के लिए सहज-सुगम शैली में प्रस्तुत कर रहीं डॉ मधु कपूर का यह दसवां लेख है। इससे पूर्व के उनके सभी लेखों के लिंक हम इस लेख के...
ओंकार केडिया* ओंकार केडिया की कविताओं से आप पहले ही परिचित हैं। इस वेब पत्रिका में प्रकाशित उनकी अनेक कविताओं में से कुछ आप यहाँ, यहाँ,यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं। कविताओं के अलावा...
डॉ मधु कपूर* पिछले कुछ समय से दार्शनिक सिद्धांतों को हमारी वेबपत्रिका के लिए सहज-सुगम शैली में प्रस्तुत कर रहीं डॉ मधु कपूर का यह नौवां लेख है। इससे पूर्व के उनके सभी लेखों...
सुधीरेंद्र शर्मा* “जो जाने-माने कवि और गीतकार आनंद बक्शी को नहीं जानता वो हिंदी सिनेजगत से वाकिफ नहीं है”, यह कहना है प्रसिद्ध कवि एवं गीतकार गुलज़ार का और उनका यह कथन हाल ही...
ओम निश्चल* पारुल बंसल की कविताएं इस वेबपत्रिका में प्रकाशित होती रही हैं और इस पत्रिका के पाठक स्त्री अस्मिता पर लिखी उनकी रचनाओं से बखूबी वाकिफ़ हैं। हाल ही में...
Manoj Pandey* I am neither a psephologist nor a political analyst. I am a media/ social media watcher trying to share my take on how social media might (or might not?) influence voting...
सुधीरेन्द्र शर्मा* क्या यह कहना सही होगा कि हम कुछ खास दिनों को तो 'सेलिब्रेट' करते हैं (जैसे आज Mothers’ Day  मना रहे हैं) लेकिन दिन के भीतर समाए हुए विभिन्न 'प्रहरों ' को...
डॉ मधु कपूर* पिछले कुछ समय से इस वेब-पत्रिका में हम विभिन्न दार्शनिक सिद्धांतों पर डॉ मधु कपूर के लेख प्रकाशित कर रहे हैं जिनमें वह दर्शन या फिलोसॉफी की गूढ़ गुत्थियों को हमारे...

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