कागद कारे

कागद कारे

शुभम मिश्र* जिन्होंने पहले भी कई उर्दू पुस्तकों का अनुवाद किया है, हाल ही में दिल्ली पर राजेंद्र लाल हांडा द्वारा जनवरी 1951 में प्रकाशित उर्दू पुस्तक “दिल्ली जो एक शहर था” का अनुवाद किया है। इसी...
पुस्तक-परिचय : गिरीश कर्नाड की आत्मकथा 'यह जीवन खेल में' राजेंद्र भट्ट* ‘यह जीवन खेल में’ हार्पर कॉलिन्स से प्रकाशित गिरीश कर्नाड की आत्मकथा के अंग्रेजी संस्करण ‘दिस लाइफ...
गौरी डे * पेड़ का धर्म पेड़ एक, जड़ अनेकबढ़ता है पेड़और बढ़ती हैं टहनियाँ भी बढ़ा हुआ पेड़ छाया देता हैऔर वो...
विद्या भूषण शब्दो! सुनो तुम यहाँ-वहाँ यूँ ही बिखर क्यों जाते हो? कभी तो बिखरी स्याही की तरह बेतरतीब से...
गोबिन्द प्रसाद* इस वेब-पत्रिका के पाठक मोहन राणा के नाम से अपरिचित नहीं हैं। उनकी कुछ कवितायें आप इस पोर्टल पर यहाँ और यहाँ पढ़ चुके हैं। दिल्ली में जन्मे मोहन राणा पिछले दो...
पारुल बंसल* क्षणिकाएं एक - प्रेम ने सुनी सिसकी कानों से और आ गया आंखों के रास्ते से!
योगेन्द्र दत्त शर्मा* कभी जनकवि नज़ीर अकबराबादी ने 'आदमीनामा' लिखा था। उस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए लगभग दो सदियों बाद मैंने नये दौर का 'एक और आदमीनामा' तैयार किया है। सो प्रस्तुत...
धीरज सिंह* कुछ है जोमुँह बाये खड़े ह्रास के बीच भीअपने शिल्प की ज़िद सींचता रहता है कुछ है जोअंत के नंगे सच परहसरतों का कोहरा बुनता रहता है
खंडहर नष्ट करो मुझे पूराआधा नष्ट अपमान है निर्माण कामेरा पुनर्निर्माण मत करनामत करना मेरे कंगूरों पर चूना आधे उड़े रंग  वाले भित्तिचित्र ध्वस्त करनाले जाने देना चरवाहे को मेरी...
पारुल बंसल* दुपट्टा - 1 सूर्य की किरणों की डोर बांधकर सुखाया है मैंने अपना वह दुपट्टा जिसे ओढ़ भीगी थी यौवन...

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