कागद कारे

कागद कारे

ओंकार केडिया* मुझे नहीं देखने शहरों से गाँवों की ओर जाते अंतहीन जत्थे, सैकड़ों मील की यात्रा पर निकले थकान से...
मनोज पांडे* कैक्टस हँस रहे हैं – एक वर्षों से बरबस बरसती गर्म रेत,टीला बनाते-बिगाड़ते अंधड़ोंऔर सूखा उगलती रातों के बादआज यहां टपक रही हैं बूँदेंजलती ज़मीन पर.
Smita Vats Sharma Do you recollect the FB picture of that radiant school friend of mine as she stood next to her newly minted MBA son at his graduation ceremony? And that one of...
बिना किसी पूर्व-चेतावनी के हुए लॉक-डाउन ने देश के बड़े शहरों में रह रहे दिहाड़ी मज़दूरों को जिस तरह अचानक बेघर कर दिया और उन्हें जिन हालातों में पैदल ही सैंकड़ों मील चलकर अपने घरों को लौटना...
........अनुवाद - राजेंद्र भट्ट 2018 का वर्ष अपने हिसाब से इतिहास में तोड़-मरोड़, देशद्रोह और देशभक्ति के सर्टिफिकेट देने और बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं बनाने के गौरव-यशोगान में पिछले वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ता...
शक़ कहानी की पृष्ठभूमि असम का बोड़ो जनजातीय इलाका है। कब बोड़ो अस्मिता के लिए शुरू हुई जद्दोजहद शांतिपूर्ण आंदोलन से खिसककर आतंकवाद की गोद में चली गई यह इस कहानी में बड़े ही स्वाभाविक तरीके...
क्या खूँटी पर लटके दिन देखे तुमने या फिर बिस्तर पर लेटी रातें करवटें बदलते पहर और घंटे या फिर तुमने देखे  दर्द से कराहाते पल?
1. चल पड़े भ्रम मनोज पाण्डे* अपनी पुरानी घड़ीइतराती थीजब चलती थीटक टक कर। शांत हो जाती थी,जब  रुकती थीथक थक कर। तब हिलाते थेथप-थपाते थेचलती घड़ी से मिलाते थे। धुंधलाए...
  सोते जागते यहीं कहीं जो रह जाता फिर वहीं भूल कर याद रह जाता मैंने रोपा था उखड़े पेड़ की छाया को आकाश के संताप को अपने सीने पर सांस भर एक दम
ओंकार केडिया* बेटे, बहुत राह देखी तुम्हारी, बहुत याद किया तुम्हें, अब आओ, तो यहीं रहना, खेत जोत लेना अपना,

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