ओंकार केडिया* मास्क - 1 तुम्हारे मुँह और नाक पर मास्क लगा है, पर तुम बोल सकते हो,
विपुल मयंक* असलम का दोस्त था इरफ़ान। पकिया। दोनों क्लास दस में थे - एक ही स्कूल में! असलम की कोठी के बग़ल में थी इरफ़ान की कोठी। दोनों कोठियों के बड़े अहाते...
पारुल हर्ष बंसल* दस्तक बदला-बदला और अजनबी सा है रुख हवाओं का...आंधियों की हो चुकी है दस्तक....बंद करना दरवाज़े और  खिड़कियों का  लाज़मी...
पूनम जैन* कल बिहार विधानसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा होते ही एकबारगी फिर याद ताज़ा हो आई उन प्रवासी मज़दूरों की जिन्हें कुछ माह पहले अचानक ही अपने घरों को लौटने को...
अमरदीप* सिर्फ धूप पहनना सुनो आज तुम धूप पहनना सिर्फ धूप सजा लेना अपनी माँग में!
पारुल हर्ष बंसल* एक चुटकी सिंदूर  एक चुटकी सिंदूर,  जिसकी क्रय वापसी है अति दुर्लभ। आ गिरी दामन में...
डा. शैलेन्द्र त्रिपाठी* 1. समझो तो समझ लो इशारा ना करेंगेरोकर अपनी बात दोबारा न करेंगे।
बारिश बारिश से बारिश, आज ज़रा जम के बरसना, उन काँपती बूढ़ी हथेलियों में थोड़ी देर के लिए ठहर जाना, बहुत...
इस वैबसाइट पर कविता के पाठक अजंता देव की कविताएं पहले भी पढ़ चुके हैं। वह अपनी कविताओं में आजकल विविध प्रयोग कर रही हैं। कभी हम उनसे इन प्रयोगों के बारे में एक लेख अलग...
ज्योति शर्मा* काली मैना (ससुराल से वापस आने के बाद एक बेटी कीअपनी माँ से बातचीत ) संस्कारों की पोटली इतनी भारीकि उसको ढोते-ढोते मैंने...

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