पारुल हर्ष बंसल* दस्तक बदला-बदला और अजनबी सा है रुख हवाओं का...आंधियों की हो चुकी है दस्तक....बंद करना दरवाज़े और  खिड़कियों का  लाज़मी...
1. चल पड़े भ्रम मनोज पाण्डे* अपनी पुरानी घड़ीइतराती थीजब चलती थीटक टक कर। शांत हो जाती थी,जब  रुकती थीथक थक कर। तब हिलाते थेथप-थपाते थेचलती घड़ी से मिलाते थे। धुंधलाए...
पारुल बंसल* स्त्री के अमूल्य प्रहर स्त्री चौके में सिर्फ रोटियां ही नहीं बेलती वह बेलती है अपनी थकान पचाती है दुःख
इस वैबसाइट पर कविता के पाठक अजंता देव की कविताएं पहले भी पढ़ चुके हैं। वह अपनी कविताओं में आजकल विविध प्रयोग कर रही हैं। कभी हम उनसे इन प्रयोगों के बारे में एक लेख अलग...
मोपांसा* (अनुवाद एवं कहानी के अंत में समीक्षा राजेन्द्र भट्ट** द्वारा) मृत्यु के समय वह गौरव के शिखर पर पहुँच गया था। बड़ी अदालत का मुख्य न्यायाधीश था वह...
  सोते जागते यहीं कहीं जो रह जाता फिर वहीं भूल कर याद रह जाता मैंने रोपा था उखड़े पेड़ की छाया को आकाश के संताप को अपने सीने पर सांस भर एक दम
अजीत सिंह*         कैमला, जो चंद रोज़ पहले तक एक अज्ञात सा गांव था, हाल ही में मीडिया की सुर्खियों में आया है। गत रविवार दस जनवरी को हरियाणा के मुख्यमंत्री को वहां...
ओंकार केडिया* बेटे, बहुत राह देखी तुम्हारी, बहुत याद किया तुम्हें, अब आओ, तो यहीं रहना, खेत जोत लेना अपना,
अजीत सिंह* (रेडियो-वाणी 4) रेडियो कश्मीर से काफी यादें जुड़ी हैं जिनमें से एक मैंने पिछली बार साझा की थी। अफसोस की बात ये है कि धरती का स्वर्ग कहे...
बारिश बारिश से बारिश, आज ज़रा जम के बरसना, उन काँपती बूढ़ी हथेलियों में थोड़ी देर के लिए ठहर जाना, बहुत...

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