शक़ कहानी की पृष्ठभूमि असम का बोड़ो जनजातीय इलाका है। कब बोड़ो अस्मिता के लिए शुरू हुई जद्दोजहद शांतिपूर्ण आंदोलन से खिसककर आतंकवाद की गोद में चली गई यह इस कहानी में बड़े ही स्वाभाविक तरीके...
अव्यक्त* क्या आप किसी ऐसे सफल व्यवसायी की कल्पना कर सकते हैं जिसने सफल होते हुए भी अपनी कोई व्यक्तिगत संपत्ति ना बनाई हो, उसका कोई व्यक्तिगत बैंक अकाउंट ही ना हो? हमसे...
विद्या भूषण शब्दो! सुनो तुम यहाँ-वहाँ यूँ ही बिखर क्यों जाते हो? कभी तो बिखरी स्याही की तरह बेतरतीब से...
ज्योति शर्मा* काली मैना (ससुराल से वापस आने के बाद एक बेटी कीअपनी माँ से बातचीत ) संस्कारों की पोटली इतनी भारीकि उसको ढोते-ढोते मैंने...
प्रेम चंद जयंती (31 जुलाई) पर विशेष राजेंद्र भट्ट* कथाकार प्रेमचंद की कथाओं -  तावान और गुल्ली-डंडा पर प्राध्यापकों और समालोचकों की भाषा-शैली की बजाय साधारण पर संवेदनशील और ‘फोकस्ड’ पाठक...
क्या खूँटी पर लटके दिन देखे तुमने या फिर बिस्तर पर लेटी रातें करवटें बदलते पहर और घंटे या फिर तुमने देखे  दर्द से कराहाते पल?
पारुल हर्ष बंसल* दस्तक बदला-बदला और अजनबी सा है रुख हवाओं का...आंधियों की हो चुकी है दस्तक....बंद करना दरवाज़े और  खिड़कियों का  लाज़मी...
1 - ज़िन्दगी के इस सफ़र में आये कैसे मरहलेबघनखे हाथों में लेकर लोग मिलते हैं गले ! मैं जिरहबख़्तर पहनकर घूमता हूं शहर मेंऔर आख़िर दूर करता हूं दिलों...
1. चल पड़े भ्रम मनोज पाण्डे* अपनी पुरानी घड़ीइतराती थीजब चलती थीटक टक कर। शांत हो जाती थी,जब  रुकती थीथक थक कर। तब हिलाते थेथप-थपाते थेचलती घड़ी से मिलाते थे। धुंधलाए...
पारुल बंसल* स्त्री के अमूल्य प्रहर स्त्री चौके में सिर्फ रोटियां ही नहीं बेलती वह बेलती है अपनी थकान पचाती है दुःख

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