संकल्प घूम-घूम कर आता है  वह ज़िद्दी मच्छर, भिनभिनाता है  मेरे कानों के पास, जैसे बजा रहा हो 
पूनम जैन* कल बिहार विधानसभा चुनाव की तिथियों की घोषणा होते ही एकबारगी फिर याद ताज़ा हो आई उन प्रवासी मज़दूरों की जिन्हें कुछ माह पहले अचानक ही अपने घरों को लौटने को...
ओंकार केडिया* एक उदास सी चिड़िया वक़्त-बेवक्त कभी भी आ जाती है मुझसे मिलने, मेरा हाल जानने!
सुख और दुख पर सात लघु कवितायें इस वेब-पत्रिका में अजंता देव की कविताओं की यह चौथी कड़ी है। पहले आप उनकी कविताएं यहाँ , यहाँ और यहाँ पढ़ चुके हैं। अपनी...
आश्चर्य होता है कि कविता अपना रस, अपना पोषण कहाँ-कहाँ से ढूँढ निकालती है। कवि की नज़र अनछुई, अनजानी जगहों में जैसे बेखौफ घुस जाती है और लगभग एक जासूस की तरह कोने में दुबकी महत्वहीन...
1. खड़ीक* का पेड़ मैं किसी को नहीं जानता था मैं सबको भूल जाऊँगा   पर मैं पत्थर था बहते पानी में
विपुल मयंक* असलम का दोस्त था इरफ़ान। पकिया। दोनों क्लास दस में थे - एक ही स्कूल में! असलम की कोठी के बग़ल में थी इरफ़ान की कोठी। दोनों कोठियों के बड़े अहाते...
ओंकार केडिया परिंदों! मत इतराओ इतना और भ्रम में मत रहना कि यह दुनिया अब हमेशा के लिए तुम्हारी हुई!
Ajeet Singh* (Radio-Vaani 1) During my reporting assignments for the AIR and Doordarshan News which I did for almost three decades, there were several occasions when I met celebrities, even...

RECENT POSTS