कांग्रेस को बिन-मांगी सलाह – ‘बेबी-स्टेप्स’ भी लें

आज की बात  

चुनाव परिणाम आने के बाद विपक्ष में एक तरह का सन्नाटा है। कोई पत्रकार कभी कोई सवाल पूछ ले तो एक-आध मध्यम दर्जे के नेता का कोई ब्यान आ जाता है अन्यथा सबको जैसे सन्निपात हो गया है। कांग्रेस की तरफ से केवल एक खबर आ रही है (और वो भी सूत्रों के माध्यम से) कि उनके अध्यक्ष यांनी राहुल गांधी इस्तीफे पर संजीदा लग रहे हैं और उन्होंने कांग्रेस कार्यकारिणी को जल्दी से जल्दी नया अध्यक्ष चुनने को कहा है ताकि वह इस ज़िम्मेवारी से मुक्त हो सकें।

विपक्ष में और कहीं से कोई खास खबर देखने को नहीं आ रही। हालांकि इस स्तंभकार को लग रहा है कि सिलसिलेवार ढंग से चिंतन-मनन ना सही, कांग्रेस सहित सभी छोटे-बड़े दलों में आपसी मान-मुटौवल तो चल ही रहा होगा – कभी साथियों से नाराज़गी तो कभी बड़े नेताओं से नाराज़गी! ऐसा तो नहीं होगा कि सब आराम से घर जाकर बैठ गए होंगे और इंतज़ार कर रहे होंगे कि कब अगला चुनाव हारें।

स्वस्थ लोकतन्त्र में सबल विपक्ष ज़रुरी

एक स्वस्थ लोकतन्त्र में सबल विपक्ष का होना बहुत आवश्यक माना जाता है। लोकसभा चुनावों में विपक्ष बहुत कमजोर हुआ है – कांग्रेस की चाहे आठ सीटें बढ़ गईं हैं लेकिन कुल मिलाकर विपक्ष 2014 के मुक़ाबले काफी कमज़ोर हुआ है। इस बार इतना कमज़ोर कि लोकसभा में किसी नेता को विपक्ष के नेता का पद नहीं दिया जा सकता। एक तरह से ये एक डराने वाली स्थिति है।  

इन चुनाव परिणामों ने यह साफ कर दिया है कि मोदी की भाजपा से निपटने के लिए विपक्ष को किसी मौलिक नीति के बारे में सोचना होगा। इस बार के चुनाव से पहले देश की आर्थिक स्थिति भी डांवाडोल थी, बेरोजगारी अपने सबसे बड़े स्तर पर थी और किसान और कृषि की हालत तो काफी बुरी थी ही। कहने की आवश्यकता नहीं कि राहुल गांधी सहित सभी विपक्षी नेता इन सब बातों का ज़िक्र चुनाव-प्रचार के दौरान अपने भाषणों में करते थे। कांग्रेस के चुनाव घोषणा पत्र की तो ख़ासी तारीफ भी हुई थी और कांग्रेस अध्यक्ष ने अपनी रैलियों में अपनी ‘न्याय योजना’ पर काफी बोला था लेकिन कुछ भी तो काम नहीं आया। सपा-बसपा गठबंधन को उत्तर प्रदेश जीतने के लिए राम-बाण की तरह पेश किया गया था लेकिन इस सबके बावजूद विपक्ष नरेंद्र मोदी का नाम-मात्र का मुक़ाबला भी ना कर सका।

विपक्ष क्यों हारा या क्यों इतना बुरी तरह हारा, इसके कारणों पर कई कयास लगाए जा रहे हैं। हमारा मानना है कि इसमें विपक्ष क्या करता या क्या ना करता उतना महत्वपूर्ण कारक नहीं रहा जितना कि ये कि मोदी जी ने चुनाव किस तरह से लड़ा। किस तरह से उन्होंने लोगों के सामने राष्ट्रीयता और देशभक्ति का ताना-बाना बुना और स्वयं को उन्होंने एकमात्र विकल्प के रूप में पेश करने में सफलता पाई। मतदाताओं ने बेरोजगारी, कृषि की दुर्दशा और अर्थव्यवस्था की कमज़ोरियाँ – इन सबको नज़र-अंदाज़ करके उन्हें एक ऐसे नेता के रूप में चुना जो पाकिस्तान का मुक़ाबला कर सकता है।

क्या होनी चाहिए विपक्ष की रणनीति

ऐसे में विपक्ष की रणनीति क्या होने चाहिए? मोदी का मुक़ाबला अगर तब भी ना हुआ जब देश इन सब मुश्किलों से गुज़र रहा था और देश की आर्थिक मंदी का कारण मोदी सरकार द्वारा बिना अर्थशास्त्रियों की सलाह के लिए गया नोटबंदी निर्णय माना जा रहा था तो फिर अब जब हालात सुधरने उम्मीद जताई जा रही है तो फिर इस परिस्थिति में विपक्ष अपनी सार्थकता कैसे सिद्ध करेगा?

ऐसे में विपक्ष को बहुत शिद्दत के साथ ‘बेबी-स्टेप्स’ लेने होंगे – बहुत छोटे छोटे कदम लेकिन उनमें बच्चे वाली लगन और बच्चे ही जैसा उत्साह होना ज़रूरी है। अगर ऐसा ना हुआ तो विपक्ष मतदाताओं की तरफ से ही किसी चमत्कार की उम्मीद करता रहेगा और मतदाताओं को रिझाने में फिलहाल तो विपक्ष का ऐसा कोई नेता नज़र नहीं आ रहा जो मोदी जी का मुक़ाबला कर सके। ये बात कही जा सकती है कि राहुल गांधी ने अपनी ‘पब्लिक आउट-रीच’ बढ़ाने के लिए अच्छी कोशिश की और उनकी सभाएं पहले की अपेक्षा काफी बेहतर होने लगीं लेकिन फिर भी वो अपने उम्मीदवारों को जिताने में कुछ खास कामयाब नहीं हुए।

तो वो कौनसे ‘बेबी-स्टेप्स’ होंगे जो विपक्ष को अब नए सिरे से लेने होंगे? इस स्तंभकार की राय ये है कि विपक्ष सबसे पहले फोकस करे अगले कुछ महीनों में आने वाले विधानसभा चुनावों पर जो हरियाणा, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर, झारखंड और दिल्ली में हैं। याद दिलाने की आवश्यकता नहीं कि लोकसभा चुनावों के कुछ ही पहले कांग्रेस ने राजस्थान, मध्यप्रदेश और छतीसगढ़ में विधानसभा के चुनाव जीते थे और कोई कारण नहीं कि विपक्ष आगामी कुछ महीनों में होने वाले इन चुनावों में फिर से एक बार ज़ोरदार वापसी ना कर सके।

विधानसभा चुनावों के लिए तुरंत जुटें

विपक्ष को चाहिए कि सबसे पहले तो वह इन विधानसभा चुनावों के लिए पूरी गंभीरता से काम शुरू करे अगर उन्होंने पहले से ही शुरू नहीं कर दिया तो! वैसे अगर नहीं किया तो थोड़ा लेट तो वो हो चुके हैं लेकिन अब और देरी किए बिना उन्हें चुनाव के काम में जुटना चाहिए। ऐसा नहीं है कि हमें इस काम की गंभीरता या इसके बहुत मुश्किल और बड़ा होने का अनुमान नहीं है लेकिन फिर भी जोर देकर कहना चाहेंगे कि कांग्रेस के पास अगर पुनर्जीवित होने का कोई अवसर है तो वह इन्हीं चुनावों में हैं जो एकदम सिर पर खड़े हैं।

इन चुनावों में किस प्रदेश में क्या मुद्दे उठाने हैं और कैसे मतदाताओं को रिझाना है, इस पर एक स्पष्ट रणनीति तुरंत बनानी चाहिए। स्पष्ट है कि ये रणनीति राज्य के अनुभवी नेताओं और अन्य विशेषज्ञों के साथ मिलकर बनानी होगी। “केंद्र में मोदी तो आप ले आए लेकिन यहाँ की समस्याओं के लिए हम क्यों बेहतर हैं”, कुछ इस तरह के थीम के साथ हर प्रदेश के लिए अलग-अलग रणनीति बनाना आवश्यक है।

यदि कांग्रेस और विपक्ष को अपने को ज़िंदा रखना है तो उन्हें सबसे पहले कार्यकर्ता स्तर पर इन राज्यों में सम्मेलन करके उनका उत्साह बढ़ाना चाहिए और बताना चाहिए कि हम इन विधानसभा चुनावों को जीतने के लिए ही लड़ना चाहते हैं। इस समय कार्यकर्ताओं में ये संदेश जाना बहुत ज़रूरी है कि हमारे नेतृत्व ने हौसला नहीं छोड़ा है और वो हर अगली जंग के लिए पूरी तैयारी से उतरना चाहते हैं।

इन्हीं कार्यकर्ता सम्मेलनों के साथ-साथ विधानसभा चुनावों के उम्मीदवारों का चयन और उनके नामों की घोषणा कर देनी चाहिए ताकि किसी किस्म की कोताही ना हो और सब लोग अपनी पूरी शक्ति से घर घर जाकर प्रचार के काम में लग जाएँ।

राहुल गांधी अध्यक्ष रहें या नहीं रहें, उन्हें पहले वाले उत्साह के साथ बल्कि उससे भी ज़्यादा संख्या में रैलियाँ करनी चाहिए क्योंकि चाहे लोकसभा चुनावों में वो ज़्यादा सीटें ना जितवा सके हों, आंकड़े बताते हैं कि उन्होने जहां जहां रैलियाँ की हैं, वहाँ हार का अंतर कम हुआ है। विश्लेषकों ने इसका अर्थ ये निकाला है कि राहुल की सभाओं ने वोटों को कुछ ना कुछ स्विंग अवश्य किया हुआ है। स्मरण रहे कि विधानसभा की सीटों पर ये थोड़ा स्विंग भी सीट जिता सकता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण बात ये है कि विपक्ष आपसी गठबंधन समय पर कर ले और भाजपा विरोधी वोट बंटे नहीं, ये सुनिश्चित करे। इस संबंध में इससे भी बड़ी बात ये है कि विपक्षी पार्टियों में खासतौर पर कांग्रेस में जो आपसी खींचतान रहती है, उससे पार्टी को नुकसान नहीं पहुँचना चाहिए। यह आम चर्चा का विषय है कि राजस्थान में सचिन पायलट और अशोक गहलोत की आपसी लड़ाई के कारण पार्टी को विधानसभाई चुनावों में भी नुकसान हुआ था और अभी हाल ही में सम्पन्न लोकसभा चुनावों में भी। अगर अभी भी ये लोग आपसी लड़ाइयाँ और अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं नहीं छोड़ सकते तो फिर क्या कहा जा सकता है, फिर तो विपक्ष पूरी तरह नेस्तनाबूद हो जाएगा और देश में लोकतन्त्र कमज़ोर होने का खतरा होगा।

मूल सिद्धांतों पर ढुल-मुल ना रहें

विपक्ष में जब कांग्रेस पर ही बात चल रही है तो एक सुझाव उनको ये दिया जा सकता है कि वो एक बार फिर चाहे अपने सिद्धांतों को पुनर्परिभाषित कर लें लेकिन फिर उन पर ढुल-मुल रवैय्या अख़्तियार ना करें। अगर वो संविधान में धर्म-निरपेक्षता के सिद्धान्त को सही मानते हैं तो फिर उन्हें उसका उल्लेख करने से बचना नहीं चाहिए। राष्ट्रवाद एक ज़माने में कांग्रेस की ताकत होता था, उन्होंने पिछले कुछ वर्षों में उसे भाजपा को सौंप दिया है, उन्हें उस पर खुल कर बात करनी चाहिए और लोगों को याद दिलाना चाहिए कि कांग्रेस के कार्यकर्ता अंग्रेजों के विरुद्ध “भारत माता की जय” का नारा उस समय लगाते थे जब ये नारा लगाने पर जेल भेज किया जाता था।  

कांग्रेस नेतृत्व को भी याद रखना चाहिए और अपने कार्यकर्ताओं को भी याद दिलाना चाहिए कि कांग्रेस हमेशा से ही एक बड़ी छतरी के रूप में रही है जिसके नीचे कई तरह की पहचान वाले नेता हमेशा से रहे हैं। कांग्रेस में एक तरफ वाम विचारों वाले बड़े नेता हुए हैं तो दूसरी तरफ धर्म-निरपेक्षता के सिद्धान्त को मानते हुए भी व्यक्तिगत आचरण में अपने धर्म को खुलकर जीने वाले बड़े नेता भी हुए हैं। कांग्रेस अगर इस हार से घबरा कर अपने को किसी स्ट्रेट-जैकेट में फिट करने की कोशिश करेगी तो फिर वह भाजपा की ‘बी’ टीम के रूप में सामने आएगी। इसलिए कांग्रेस को बहादुरी से अपनी व्यापकता से जुड़े रहना चाहिए जिसमें अतिवादी विचारधारा के अलावा हर विचार के लोगों की जगह हो लेकिन शर्त इतनी सी हो कि उनकी संवैधानिक मूल्यों में अटूट आस्था हो, मानवता के व्यापक कल्याण में आस्था हो और परिवर्तन के लिए वह हिंसा को औज़ार ना मानते हों।

कुल मिलाकर ये कि कांग्रेस को लोकसभा चुनाव के निराशाजनक परिणामों से हतोत्साहित होने की बजाय उनसे सबक लेकर आगे बढ़ना चाहिए! कांग्रेस का बचना एक सवा सौ साल पुरानी पार्टी का बचना तो है ही लेकिन उससे कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण ये है कि फिलहाल उसका बचना इस देश के लोकतन्त्र को मज़बूत करने के लिए भी ज़रूरी है। यह विडम्बनापूर्ण स्थिति है कि ये स्तंभकार जहां कुछ वर्ष पहले तक इस बात से डरता था कि देश में आपातकाल लगाने वाली पार्टी कांग्रेस के हाथ में ज़्यादा शक्ति ना बढ़ जाये, वहाँ आज उसकी ये चिंता है कि कैसे ये पार्टी इतनी तो बच जाये कि देश में एक प्रभावी लोकतन्त्र बना रहे जिस पर हम सभी अभी तक गर्व करते रहे हैं।

विद्या भूषण अरोरा

3 COMMENTS

  1. अन्य पार्टियों की भूमिका पर भी प्रकाश डालें!

  2. हिंदुस्तानी मानस अपने तर्क उन महागाथाओं में ढूंढ़ता है जो उसे जन्म से और अंतिम यात्रा तक साथ देती हैं. 18 दिन के महाभारत में 17 दिन पांडव हारे थे लेकिन 18वें दिन विजय सत्यार्थीयों का ही वरण करती है. पांडव 17 दिनों की लगातार हार से कोपभवन में नहीं बैठे थे. उनके ह्रदय भी शिथिल हुए होंगे लेकिन वो जम्बूद्वीप में अत्याचार के खिलाफ विरोध के स्वर को ज़िंदा रखने के लिए सतत प्रयासरत रहे. विपक्ष कोशिश, जुम्बिश करे ताकि कहीं विरोध न करने का अक्षम्य पाप न कर बैठें.

  3. मेरी नज़र में मैं आपके कॉंग्रेस को दिए सुझाव को काफी महत्वपूर्ण समझता हूं , लेकिन यंहा एक बात से सहमत नही हूँ कि कांग्रेस को अन्य पार्टियों की तरफ गठबंधन के लिए किसी भी चुनाव से पहले देखना चाहिए। जब जब कांग्रेस गठबंधन की तरफ बढ़ी है तब तब उन्हें हो सकता है एक short term फायदा हुआ हो, लेकिन long term बड़ा नुकसान झेला है। हाँ ये बेहद जरूरी है कि अन्य पार्टियों से सामंजस्य जरूर बनाये रखे।
    दूसरा, ये कि कुछ बेहद कड़े फैसले लेने होंगे जैसे छत्तीशगढ़, राजस्थान और मध्यप्रदेश हाल ही के राज्यो में बनी सरकारों में, जिनसे अन्य राज्यो में वोटर के मन मे निजी फायदे की उम्मीद जग सके और कार्यकर्ता जो आज कांग्रेस का न होकर निजी फायदे के लिए एक नेता का होकर रह गया है।

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