लोहिया के सपनों का भारत : भारतीय समाजवाद की रुपरेखा – पुस्तक समीक्षा

जैनबहादुर*

लोहिया के सपनों का भारत, भारतीय समाजवाद की रुपरेखा: लेखक प्रोफेसर अशोक पंकज

लोकभारती प्रकाशन, प्रयागराज द्वारा प्रकाशित मूल्य 225 रुपए, पृष्ठ 199  

प्रखर समाजवादी चिंतक डॉ राम मनोहर लोहिया स्वतन्त्रता संग्राम के अग्रिम योद्धाओं में तो शुमार होते ही हैं, उससे भी ज़्यादा वह जाने जाते हैं एक ऐसे राजनेता के तौर पर जिन्होंने स्वतंत्र भारत की राजनीति में समता, लोकतन्त्र, लैंगिक समानता, जातिगत विषमता को समाप्त करने जैसे मूल्यों और उच्च आदर्शों को देश की राजनीति का सामान्य हिस्सा बनाया। आज़ादी के तुरंत बाद जब सरदार पटेल की मृत्यु हो गई और पंडित नेहरू देश और कांग्रेस के एकछत्र नेता के रूप में स्थापित थे तो स्वयं नेहरू जी को यह चिंता होती थी कि यदि लोकतन्त्र को मज़बूत करना है तो उनको चुनौती देने वाला कोई होना चाहिए। ऐसे समय में डॉ लोहिया ने संसद में और संसद के बाहर एक मज़बूत प्रतिपक्ष की नींव रखी।

डॉ लोहिया के बारे में लिखना निश्चित रूप से दुरूह और चुनौतीपूर्ण है जिसका सीधा कारण है  कि लोहिया के मौलिक विचारों की रेंज बहुत बड़ी है और विभिन्न विषयों पर उनके विचार उनके भाषणों, लेखों और संसद की कार्यवाही के रिकार्डों में बिखरा हुआ है। काउंसिल फॉर सोशल डेव्लपमेंट, दिल्ली में कार्यरत प्रो. अशोक पंकज ने हाल ही में प्रकाशित अपनी पुस्तक “लोहिया के सपनों का भारत, भारतीय समाजवाद की रुपरेखा” में लोहिया के विचारों को प्रस्तुत कर सर्वजन-सुलभ बना दिया है। यह कार्य श्रमसाध्य तो अवश्य रहा होगा किन्तु अनिवार्य भी था क्योंकि दुर्भाग्यवश या राजनीतिक कारणों से, लोहिया के विचार शैक्षणिक जगत के पठन-पाठन और आम जनमानस में भी विचार-विमर्श का उतना हिस्सा नहीं बन पाया जितना उन्हें होना चाहिए था। इसका एक कारण यह भी रहा है जिसका ज़िक्र हमने ऊपर किया कि उनके विचार अलग-अलग जगह बिखरे हुए थे जिनको सिलसिलेवार ढंग से एक जगह प्रस्तुत करने की ज़रूरत थी । प्रो.अशोक पंकज की यह पुस्तक इस कमी को पूरा करती है और उम्मीद है कि इस पुस्तक के माध्यम से लोहिया के विचारों पर शैक्षणिक जगत और आम जनमानस में चर्चा-परिचर्चा एवं विमर्श की एक नई शुरुआत होगी । लोहिया के विचारों को आमजनमानस तक पहुँचाना लेखक का एक प्रमुख उद्देश्य है, जिसमें वे सार्थक हुए हैं।

इस पुस्तक में लेखक ने लोहिया के समाजवाद के विचारों को सैद्धांतिक, वैचारिक एवं अन्य पहलुओं को पांच खंडों में प्रस्तुत किया है । पहला खंड लोहिया के समाजवाद की रूपरेखा है; दूसरा खंड लोहिया के सैद्धांतिक पहलुओं, जिसमें समता से संपन्नता, सप्तक्रांति से समाजवाद, सिविलनाफ़रमानी से लोकतंत्र को बताया गया है; तीसरा खंड लोहिया के वैचारिक पहलुओं पर प्रकाश डालता है; चौथे खंड में व्यावहारिक पहलू हैं तथा पांचवे खंड में उनके विचारों की समसामयिकता का विश्लेषण किया गया है ।       

लेखक द्वारा लोहिया के समाजवादी विचार को वैश्विक, राष्ट्रीय एवं स्थानीय स्तर पर व्याख्या कर उसकी सर्वउपयोगिता को बताया गया है। लोहिया का समाजवाद पश्चिम के समाजवाद, मार्क्सवाद और गाँधीवादी से कुछ तत्वों को लेता है लेकिन किसी एक का नकल नहीं किया बल्कि सभी से अच्छाईयों को ग्रहण करते हुए भारतीय संदर्भ में पिरोया है। लोहिया जीवनपर्यन्त समाजवाद के सैद्धांतिक और नैतिक पक्ष पर अडिग रहे, जिसकी पुष्टि उनके राजनीतिक जीवन में लिए गए निर्णयों एवं कार्यों से होती है । लेखक ने पुस्तक में लोहिया के विचारों के सैद्धांतिक पहलुओं को प्रस्तुत करने के साथ-साथ उनके विचारों का भविष्य में क्या आधार होगा, इसकी संभावना भी तलाशी है।

लोहिया समाजवाद की प्रचलित अवधारणा के बरक्स अपना विचार रखते है । उनके अनुसार समाजवाद गरीबी एवं असमानता को मिटाने, संपत्ति का राष्ट्रीयकरण करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका अर्थ लोगों में संपत्ति के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव से है जिसका सार्वभौमिक उद्देश्य समस्त मानव प्राणी के जीवन स्तर में सुधार लाना है । लोहिया के समाजवाद की यह अवधारणा गाँधी के दृष्टिकोण से प्रभावित समझी  जा सकती है, जिसके माध्यम से लोहिया न केवल बाहरी बदलाव, बल्कि मन, मस्तिष्क, हृदय तीनों के बदलाव की बात करते है, जिससे समतामूलक समाज का निर्माण संभव है । लोहिया सामाजिक गैर बराबरी को समाप्त करते हुए सच्चे समाजवाद की स्थापना के लिए ‘अवसर बनाम योग्यता’ का सिद्धांत देते है, और समाज में हाशिए के लोगों के सार्वजनिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने की बात करते हैं ।  

लोहिया के समाजवाद की व्याख्या करते हुए लेखक ने उनकी ‘सप्तक्रांति’ की अवधारणा पर खास बल दिया है, जिसमें सात प्रकार की क्रांति के माध्यम से समाजवाद लाने की बात कही गई हैं। ये सात क्रांतियाँ हैं – गरीबी-अमीरी की लड़ाई; प्रभु एवं गुलाम देश की लड़ाई; जाति एवं वर्ग से उत्पन्न अन्याय के खिलाफ संघर्ष; नर-नारी की बराबरी;  रंग-भेद एवं नस्ल-भेद के खिलाफ लड़ाई; हथियार बनाम सत्याग्रह; एवं सातवीं व्यक्तिगत स्वतंत्रता की लड़ाई । लोहिया सप्तक्रांति की अवधारणा को राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मौजूद प्रत्येक प्रकार की गैर बराबरी को समाप्त करने का साधन मानते है और जिसे सैद्धांतिक एवं व्यावहारिक दोनों स्तरों पर आत्मसात करने की बात करते हैं ।

प्रोफेसर पंकज डॉ लोहिया की इस बात को रेखांकित करते हैं कि जाति- वर्ग भेद और नर- नारी असमानता को समाप्त किए बिना समाज की अन्य असमानताओं को खत्म करना भी मुश्किल है। यह भी स्पष्ट करते हैं कि लोहिया की सप्तक्रांति उनके समाजवाद को स्थापति करने का प्रमुख सिद्धांत एवं कार्यक्रम है । लोहिया गरीबी-अमीरी की लड़ाई को ‘बड़ा वाला अन्याय’ मानते है, जिसे वह ‘कैलाश’ और ‘पाताल’ की उपमा देते हैं । लोहिया कहते हैं कि “बिना कैलाश को गिराए पाताल को उठाना एकदम असंभव है । गरीब कभी भी उठ ही नहीं सकते, अगर अमीरों को अपनी दौलत से खेलने दिया जाए (पृ.सं.78) ।”

पुस्तक में लेखक बताते हैं कि लोहिया समाजवाद को व्यावहारिक रूप देने के लिए किसी भी तरह की हिंसा के खिलाफ थे। इस मामले में लोहिया गाँधी के साथ खड़े हैं । समाजवाद एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए, लोहिया सिविलनाफ़रमानी का तरीका अपनाते हैं। सिविलनाफ़रमानी के माध्यम से वे लोगों में नागरिकबोध का विकास करना चाहते हैं, इसका उपयोग करना सिखाते है, जिससे समाज की तमाम बुराइयों एवं गैर बराबरी का लोग प्रतिकार कर सकें। लोहिया एक तरह से सिविलनाफ़रमानी को नैतिक हथियार और कर्तव्यपरायणता के रूप में देखते हैं ।

लेखक ने लोहिया के समाजवाद, मार्क्सवाद और गाँधीवाद के बीच अंतर स्पष्ट किया है । लोहिया मार्क्सवाद से संपत्ति के मोह को खत्म करने की सीख ग्रहण करते हैं, तो गाँधी से सिविलनाफरमानी, ग्राम स्वराज्य, स्वायत गाँव, व्यक्ति के कर्मो, चरित्र में सुधार की बात करते हैं, जिससे व्यक्ति का हृदय परिवर्तन कर संपत्ति के मोह को खत्म किया जा सके । लोहिया का समाजवाद ‘पूँजीवादी पैदावार की व्यवस्था’ एवं ‘पूँजीवाद पैदावार के रिश्तों’ दोनों को खत्म करने पर बल देता है(पृ.सं.106) । जो कि गाँधीवाद और मार्क्सवाद दोनों से भिन्न है । 

लोहिया तीसरी दुनिया के देशों को पश्चिम के वैचारिक वर्चस्व से बचने का सुझाव देते है, साम्यवाद और पूँजीवाद के बरक्स एशियाई देशों के लिए ‘एशियाई समाजवाद’ का विचार देते हैं, जो एशिया के देशों की समस्याओं की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए गढ़ा गया हैं जिसके संदर्भ में लोहिया कहते हैं कि “एशिया के समाजवाद का सर्वोच्च लक्ष्य है ऐसी विश्व व्यवस्था का निर्माण करना, जिसमें भूख, गुलामी और युद्ध के लिए कोई जगह न हो (पृ. सं.129)।” पुस्तक में लेखक ने लोहिया के उन विचारों को समझाया है जिसे वैश्विक स्तर पर पूँजीवादी एवं साम्यवादी देशों के बीच चलने वाली प्रतिद्वंदिता को लोहिया ‘समान अप्रासंगिकता का सिद्धांत’ कहते है, जो एशियाई देशों में व्याप्त ‘भूख’ ‘स्वतंत्रता’ और ‘शांति’ जैसे मसलों के समाधान की बात करते हैं ।

इस पुस्तक में प्रो. पंकज ने लोहिया के समाजवाद का केवल सामाजिक, राजनीतिक पक्ष ही नहीं बताया है, बल्कि उसके सांस्कृतिक पक्ष की भी व्याख्या की है। वैश्विक राजनीति में जहाँ ‘रोटी’ और ‘संस्कृति’ अलग- अलग विचारधारा से जुड़ा हुआ था, वहीं लोहिया ने दोनों को एक साथ अपनाया। लोहिया ‘रोटी’ को बुनियादी आवश्यकता का प्रतीक मानते है, तो ‘संस्कृति’ को लोकतान्त्रिक मूल्य – स्वतंत्रता, समानता बंधुत्व का प्रतीक । लोहिया समाजवाद में ‘रोटी’ और ‘संस्कृति’ दोनों को शामिल करते हैं और एक समावेशी खुशहाल समाज का निर्माण करने की कल्पना करते हैं।

पुस्तक में लेखक लोहिया के विचारधारा के वाहकों का वर्णन करते है कि कौन लोग लोहिया के समाजवादी विचारों के वाहक होंगे? इसका जबाव लेखक लोहिया के विचारों में खोजते हैं और लोहिया के शब्दों में ही बताते हैं कि, “नीचे की जनता की, मसलन किसान, मजदूर, विद्यार्थी की राजनीति चलानी है, मजदूर आंदोलन, खेत- मजदूर, किसान आंदोलन, महिला आंदोलन, जाति तोड़ो आंदोलन, दाम बाधों आंदोलन (पृ.सं.147) ।” यानी लोहिया के समाजवाद की राजनीति के मुख्य वाहक दबे कुचले लोग है, जिसके लिए उन्होंने जीवन पर्यन्त संघर्ष किया। दबे कुचले लोगों की समस्याओं के प्रति लोहिया हमेशा चिंतित रहते थे, समाधान के लिए सुझाव एवं संगठनात्मक स्तर पर पहल किया करते थे, चाहे भूमि की समस्या हो, कृषि उत्पादन में वृद्धि एवं अन्य समस्याएँ हों।

प्रो.पंकज ने पुस्तक में लोहिया के सपनों के भारत का महत्वपूर्ण स्तंभ ‘चौखंभा राज’ की अवधारणा की सरल तरीके से व्याख्या की है, जिसमें लोहिया सत्ता और शासन का विकेंद्रीकरण करना चाहते है और आम जनमानस का सत्ता, शासन में प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना चाहते हैं। लोहिया ‘चौखंभा राज’ के माध्यम से सत्ता, शासन का बंटवारा गाँव, जिला, प्रदेश और केंद्र स्तर पर करना चाहते हैं, आम जनमानस को भी नीतियों के निर्माण एवं क्रियान्वयन का भागीदार बनाना, उनके समाजवाद का हिस्सा है ।

पुस्तक के अंत में प्रो.पंकज लोहिया की प्रासंगिकता का, लोहिया के जीवन दर्शन का, उनके सिद्धांतों और उनके राजनीतिक आंदोलनों का आज के समय में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक, गैर बराबरी के संदर्भ में विश्लेषण करते हैं। लेखक ने राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति आय में असमानता, बढ़ती गरीबी, जातीय एवं वर्ग भेद, शिक्षा एवं स्वास्थ्य के सुविधाओं की कमी रोजगार का संकट के आँकड़ों को प्रस्तुत कर यह साबित किया है कि ‘लोहिया के सपनोँ का भारत’ का निर्माण अधूरा है और उसके लिए उनके विचारों को समझने एवं कार्यक्रमों को सही संदर्भों में लागू करने पर बल दिया है। लेखक ‘लोहिया के सपनों का भारत’ के निर्माण को समसामयिक सामाजिक, राजनीतिक परिदृश्य से गायब पाते हैं और उसे  साकार होने की उम्मीद के रूप में देखते हैं। उन उम्मीदों में इस पुस्तक की प्रासंगिकता है और इसकी सार्थकता भी।

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*जैनबहादुर दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा विभाग से पीएच.डी. कर रहे हैं।

ई-मेल : [email protected]

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