रसवती ‒ बन्ध मोक्ष कारणम्

डॉ मधु कपूर*

कोई सवाल उठा सकता है ‘बन्ध’ और ‘मोक्ष’ यह तो एक तरह का विरोधी समन्वय है. मोक्ष किससे? फिर बन्धन कैसा? यही तो हमारी बिडम्बना है, मन छुटकारा भी पाना चाहता है, और बंधना भी चाहता है!यह डॉ मधु कपूर बता रही हैं अपने दार्शनिक लेखों की शृंखला के ग्यारहवें लेख के बारे में। पाठकों की रुचि उनके पिछले लेखों में हो तो हम इस लेख के नीचे उनके पुराने लेखों की सूची दे रहे हैं।

रसवती ‒ बन्ध मोक्ष कारणम्

एक दिन अचानक मेरे शिक्षक का फ़ोन आया कि वे हम चार लोगों को दोपहर के भोजन पर आमंत्रित करना चाहते है, अँधा क्या चाहे दो आँखे! हमारे लिए यह विशेष दिन था, उनके स्नेह की छत्रछाया में  समय बिताना जो अक्सर कक्षा में संभव नहीं होता था. शिक्षक महोदय ने खुद अपने हाथों से पारंपरिक तरीके से कहवा, कश्मीरी चाय हमारे लिए बनाई. उनका कहना था कि ‘मुझे रसोई में काम करना अच्छा लगता है, इससे  मुझे मुक्ति या मोक्ष का एहसास  होता है’. रसोई को सम्पूर्ण व्यवस्थित करते हुए उन्होंने अपनी देख-रेख में पूरा आयोजन किया, जो न केवल पाक कला में उनकी पारदर्शिता अपितु उनकी संपूर्ण सत्ता की अभिव्यक्त कर रहा था. उन्होंने सबकी रूचि का ख्याल रख कर भोजन की व्यवस्था की थी. हम यदि कोई सहायता करने का प्रयत्न भी करते तो वे यह कह कर मना कर देते कि ‘मुझे रसोई में काम करने के वक्त कोई झल्लाहट नहीं होती है, क्योंकि यह मुझे मुक्ति की उड़ान देता है. मुझे लगता है जैसे मैं किचन की खिड़की से एक नई दुनिया में प्रवेश करता हूँ’.    

“मोक्ष का एहसास” रसोई घर में सुन कर आश्चर्य हो सकता है, क्योंकि अक्सर महिलाएं इसे कैदखाना समझती हैं, जहाँ उनकी इच्छाओं का दमन और उम्मीदों को भूना जाता है, उनके सपनों को उबाला जाता है. एक समय मैंने अपनी एक शिक्षिका को यह कहते सुना था कि, ‘मेरी सारी कवितायें अब चूल्हें पर भेंट चढ़  चुकी है’. मेरे एक भाई साहब अक्सर कहते थे, “औरतों की ९०% जिन्दगी चौके में बीतती है”. महिलाओं को बचपन से ही रसोईं घर का रखरखाव करना, खाना बनाना इत्यादि घुट्टी में पिलाया जाता है. तर्क दिया जाता है ‘पढ़ कर क्या करोगी चूल्हा चौका ही तो फूंकना है’. इसके विपरीत कभी कभी माँ को यह भी सुनने को मिलता था, ‘जब देखो  चौके में घुसी रहती हो’. यह रोजमर्रा की बातें एक अंतहीन प्रक्रिया के तहत घटती थी, जिससे माँ को कभी छुट्टी नहीं मिलती थी. इस प्रसंग में जया बच्चन द्वारा अभिनीत नाटक ‘माँ कभी रिटायर नहीं होती’ की बात सहसा याद आ जाती है. इन्हीं सब बातों के मद्दे नज़र कुछ महिलाएं तो आजीवन खाना पकाने को एक छोटा और तुच्छ काम समझने लगती है.

इसका पाश्चात्य रूप ‘नारीवाद आन्दोलन’ के रूप में प्रकट हुआ और वे मानने लगी कि रसोईघर पुरुषों द्वारा महिलाओं के लिए बनाई गई जेल, हाशिये पर ढकेलने की एक  सामाजिक साजिश, उनकी भावनाओं को दमित करने की कोशिश, पुरुषों की नज़र में हीन बनाने की प्रक्रिया है. महिलाएं इस पीड़ा से जूझती, टकराती अपनी अस्मिता को खंगालती, अपना आक्रोश निकालती है― रसोई घर की उपेक्षा करके. कुछ विद्वानों ने औरतों को इस घरेलू समस्या से मुक्ति दिलाने का बीड़ा भी उठा लिया और वकालती करने लगे कि इस सामाजिक व्यवस्था में आमूल परिवर्तन सिर्फ कानून में सुधार लाने से नहीं हो सकता है, स्त्रियों को आर्थिक रूप से सशक्त तथा सक्षम होना पड़ेगा. रसोईघर को कैदखाना के बदले मुक्ति का आकाश समझना उनकी इसी स्थिति पर निर्भर करता है.

हमारे यहाँ शास्त्रों में ‘अन्न को ब्रह्म’ कहा गया है, तथा इसके धारक प्राणों को ‘अन्नमय कोष’ की संज्ञा दी गई है. स्त्री उसकी वाहक समझी जाती है. कई घरों में जूते पहनकर रसोईघर में जाना, बिना नहाए खाना पकाना और बिना नहाए भोजन करना तक मना होता है, क्योंकि कभी-कभार इसके अन्दर पूजा घर भी होता है. पाक-कला नाटक की तरह एक जटिल तथा रचनात्मक प्रक्रिया है, जो भोजन, संस्कृति, मानवीय संबंधों और शारीरिक आवश्यकताओं का आधार है. हमें इसके लिए किसी किताब को खोलने  की जरूरत नहीं पड़ती है. सब्जी में कितना नमक-मसाला डालना है, चाय में कितनी पत्ती डालनी है, मिर्चा देना है कि नहीं, सब कुछ अंदाज़ से और रूचि के अनुसार चलता है. और फिर यह भोजन इतना अपना लगता है कि कहीं भी बाहर जाओ, घर का खाना ही याद आता है, इसलिए मां के जाने के साथ उसके हाथ के भोजन का स्वाद भी चला जाता है.  प्रसिद्ध शेफ विकास खन्ना कहते हैं, ‘मै जब बनारस के गंगा घाट पर जाता हूँ तो मुझे खाने के नए नए प्रयोग करने की प्रेरणा मिलती है. मेरी रचनात्मकता सक्रिय हो उठती है. खाना बनाने के कई तरीके दिमाग में उपजने लगते हैं. यह वही ‘उपज’ है जो एक तबलावादक वादन के समय प्रयोग करता है, अर्थात नए से नए ‘बोल’ उसके दिमाग में खलबली मचाने लगते हैं. ऐसे रसोईघर को हम जेलखाना कैसे कह सकते हैं’?

इसका ये मतलब भी नहीं है कि ज्ञान दस्तावेज़ों में नहीं मिलता है. प्राचीन ग्रन्थ नल रचित  “पाक दर्पण”  पकाने की क्रिया का विस्तृत वर्णन कर उसे एक कला का रूप देता है, जो रसोई में रह कर मुक्ति का स्वाद भी चखा देता है, क्योंकि इसके साथ हमारे आवेगों की डोर बंधी रहती है. यह हमारी जीवन शक्ति का स्रोत होता है. सिर्फ दासत्व नहीं बल्कि यह हमें स्वयं को प्रस्फुटित होने  का मौका देता है. सौन्दर्य शास्त्र में वर्णित सभी इन्द्रियों का यह आगार है.जैसे एक चित्रकार रंगों से, संगीतकार सुरों से  खेलता है, मूर्तिकार हाथों के स्पर्श से तथा गंधी नासिका से इत्र कला का सृजन करता हैं, रसोइया पांचों इन्द्रियों का प्रयोग करके भोजन को लज़ीज़ बनाता है. चूल्हे पर रखे बर्तनों और कड़ाही में पड़ी दाल का खदबदाना, सब्जी का हलचल मचाना, तवे पर पड़ी रोटी का फूल जाना, कुरकुरे पापड़ की खड़खड़ाहट को महसूस करना किसी कविता लिखने से कम नहीं होता है. जलेबी की जटिलता तो शीघ्र ही हमारे तनावों का हरण कर लेती है.

 ‘Alice in wonderland’ में एलिस रसोई घर में प्रवेश करती है, तो देखती है एक अव्यवस्थित रसोई घर. रानी बच्चे को दूध पिलाती दिखाई देती है, बच्चा दूध की बोतल बार बार फेंकता रहता है, चारों तरफ धुঁआ ही धुঁआ, बिल्ली बैठी मुस्करा रही है, बच्चे के प्रति रानी का व्यवहार निर्दयता भरा है, रसोइये का इधर उधर चीजों को फेंकना इत्यादि, एक अद्भुत पागलपन में भी वैचित्र्य का बोध कराता है. एलिस इन सभी तथाकथित अर्थहीन गतिविधियों को चटकारे लेकर इन अविस्मरणीय क्षणों को संजो कर भरपूर आनंद लेती है. ऐसे में बच्चों के लिए लिखी गई एक कविता का स्मरण हो आता है जो लैंगिक भेद-भाव को नकारते हुए उल्लास और आनंद की अभिव्यक्ति है ―

चूल्हा फूंक रहे है बापू, नाच रही है मैया

रोटी बेल रहा है मुन्ना, फ़ौज बनी है मुन्नी

घर का नौकर खेल रहा है, फुदक रही गौरैया …

रसोईघर का यह दृश्य किसी भी सौन्दर्यपारखी को आह्लादित कर सकता है. यहाँ यह उल्लेख करना उचित होगा कि अभी मेरे पास सही संदर्भ उपलब्ध नहीं है किन्तु जहां तक मुझे स्मरण पड़ता है, यह कविता प्रसिद्ध नारीवादी एक्टिविस्ट कमला भसीन की लिखी हुई है जिनका करीब तीन वर्ष पहले देहांत हो गया था।

अंत में अपने एक और अध्यापक का उल्लेख करना चाहूंगी. एक समय सुबह की सैर करते समय जब वह वेदान्त दर्शन  की मुक्ति का प्रसंग समझा रहे थे, तो उन्होंने कहा, “देखो, कल रात मैंने सपना देखा कि मेरी पत्नी इडली, डोसा बना रही है और मैं खा रहा हूँ, क्योंकि जब से मै यहाँ (लखनऊ) आया हूँ, मुझे अपने दक्षिण भारत के व्यंजन की हूक उठती, मै लाचार हो जाता हूँ. मेरे अन्दर घर के भोजन की जो सूक्ष्मवासना है, सपने के रूप में कल रात प्रकट हो गयी. तुम लोगों को पढाता भी हूँ, समझाता भी हूँ, लेकिन इस सूक्ष्मवासना को कहाँ ले जाऊঁ, जो मुझे कुरेदती रहती है. वेदांत में जिस ‘अहं ब्रह्मास्मि या तत्त्वमसि’ का उल्लेख किया गया है, वह मै सपने में कैसे भूल जाता हूँ? तुमलोग भी इसे समझने की कोशिश करो, तराशो उसे सागर के मोती की तरह, जो वक्त और हालात की मार सहते सहते बेशकीमती हो उठता है, जिसका अधिकतम मूल्य सिर्फ जौहरी ही आंक सकता है”.

क्या यह मुक्ति से किसी भी अर्थ में कमतर है?

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  1. मैं कहता आंखिन देखी
  2. कालः पचतीति वार्ता
  3. रस गगन गुफा में
  4. अस्ति-अस्तित्व का झिंझोड़
  5. नास्ति की खुन्नस
  6. काल की चपेट  
  7. द्विमुखी सत्य की संकल्पना
  8. जागें जथा सपन भ्रम जाईं  
  9. अनसुलझा समीकरण

      10. सभी मनुष्य मरणशील हैं

*डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, “दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।“ डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance फरवरी में दिल्ली में सम्पन्न हुए विश्व पुस्तक मेला में रिलीज़ हुई है।

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2 COMMENTS

  1. सत्य शोधक का सत्य बोध.
    अद्भुत प्रस्तुति.

  2. धन्यवाद . आपके शब्दों ने मुझे सातवें आकाशा पर पहुंचा दिया. पढ़ते रहे लिखते रहे.

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