सभी मनुष्य मरणशील हैं

पिछले कुछ समय से दार्शनिक सिद्धांतों को हमारी वेबपत्रिका के लिए सहज-सुगम शैली में प्रस्तुत कर रहीं डॉ मधु कपूर का यह दसवां लेख है। इससे पूर्व के उनके सभी लेखों के लिंक हम इस लेख के अंत में दे रहे हैं। यदि किन्हीं पाठकों का कोई लेख छूट गया हो तो इन लिंक्स पर जाकर पढ़ सकते हैं। आज का लेख इस शृंखला के पूर्व के लेखों से कई मायनो में भिन्न है। इस लेख का विषय ऐसा है जिसे हम अपने बाल्यकाल से सुनने लगते हैं किन्तु जिसका उत्तर इतना सीधा-सादा है कि हमें लगता है कि फिर यह पूछा ही क्यों जाता है? विषय आपने शीर्षक में पढ़ा ही है कि सभी मनुष्य मरणशील हैं। यदि इसे प्रश्न के रूप में लिया जाए तो उत्तर तो ‘हाँ’ ही होगा लेकिन अगर दर्शनशास्त्री सीधे उत्तर दे देंगे तो भला आप और हम उन्हें फिलॉसफर कैसे समझेंगे (यह बात सिर्फ मुस्कराहट लाने के लिए कही गई है)! अब देखना है कि क्या स्वयं डॉ मधु कपूर और या फिर कोई अन्य दर्शनशास्त्री हमें यह भी बताएगा कि चलो, मनुष्य तो मरणशील है किन्तु आत्मा का क्या, वह तो मरणशील नहीं – तब क्या हम अपने जीवनकाल में ही अपनी देह और आत्मा को अलग करके देख सकते हैं? आप कह सकते हैं कि आत्मा को देखना तो संभव नहीं लेकिन क्या हम देह और आत्मा को अलग-अलग महसूस कर सकते हैं? बहरहाल, सम्बद्ध प्रश्नों के उत्तर हम जुटाने का प्रयास करते रहेंगे, अभी तो आप देखें कि क्या मनुष्य मरणशील है, इस विषय को दर्शनशास्त्र कैसे ‘डील’ करता है।

डॉ मधु कपूर*

शिक्षिका ने कक्षा में घुसते ही श्यामपट पर लिखा―

सभी मनुष्य मरणशील है,

सुकरात मनुष्य है,

अतएव, सुकरात मरणशील है

और समझाने लगी कि यह निगमन अनुमान (Deductive Reasoning) का विषय है―  प्रथम दो हेतु वाक्यों से सिद्धांत निश्चित रूप से निसृत होता है कि, ‘सुकरात मरणशील है’. पर यह कोई नई बात नहीं है, क्योंकि सभी प्राणी जो जन्म लेते हैं, कभी न कभी मृत्यु को प्राप्त होते ही हैं. बात सिर्फ इतनी है कि उपरोक्त सत्य को अनुमान के द्वारा प्रमाणित किया गया है. यह तो वही बात हुई न कि किसी ने आपको खून करते देख लिया, तो भी न्यायालय में उसका प्रमाण माँगा जाता है, क्योंकि हो सकता है उसने गलत देखा हो. आँखों पर भी तो कोई भरोसा नहीं रहा. उपरोक्त निगमन अनुमान वैध है, और सिद्धांत सत्य है. पर अक्सर ऐसा होता नहीं है― जैसे

सभी मनुष्य अमर है,

सुकरात एक मनुष्य,

अतएव, सुकरात अमर है.

तार्किक नियमों के अनुसार उपरोक्त अनुमान वैध होने पर भी, सिद्धांत सत्य नहीं है. इस निगमन अनुमान की प्रक्रिया में हम जिस सामान्य वचन से विशेष वचन की ओर जाते है, उस सामान्य  वचन की प्रमाणिकता की जाँच कैसे होगी? हम सभी अपने अपने अनुभव में किसी न किसी को मरते अवश्य देखते है, और निष्कर्ष निकाल लेते है कि ‘सभी मनुष्य मरणशील है’.

यह सत्य है कि जैविक रूप से हर प्राणी के शरीर की कोशिकायें निरंतर नष्ट होती रहती है, जो उसे धीरे धीरे मृत्यु की ओर ठेल देती है. पर सभी मनुष्यों को मरते हुए किसने देखा है? क्या चिकित्सा विज्ञान ने ऐसी किसी तकनीक को विकसित किया है, जिससे मनुष्य अमर बन सके ? यदि हाँ, तो इस वाक्य  की सत्यता  अप्रमाणित हो जाएगी.

 मरणशील होना और अमर होना दो विपरीत धर्म है. हमारे दूसरे उदाहरण में सिद्धांत वाक्य “सभी मनुष्य अमर है’ को सत्य नहीं कहा जा सकता हैं, क्योकि हमने आज तक ऐसा अनुभव में देखा नहीं है. हाँ, सुना जरुर है, अश्वत्थामा  और हनुमान दो मिथकीय चरित्रों की अमरता के सम्बन्ध में, जो आस्था का विषय है.   

कई बार अनुभव के आधार पर हम अंदाज़ कर लेते, ‘आज स्कूल की छुट्टी हो जाएगी क्योंकि आज बरसात हो रही है’, या  ‘कक्षा में विद्यार्थी कम है तो आज पढाई नहीं होगी’. इसके पीछे हमारा तर्क होता है, “जब जब पानी बरसता है, तब तब स्कूल बंद हो जाता है.” किन्तु इस प्रकार आगमन अनुमान (Inductive Reasoning) से प्राप्त निष्कर्ष को अनिवार्य नहीं कहा जा सकता है. अनुभव में गलत होने की संभावना बनी रहती है. इसलिए इसे संभाव्य ही कहा जाता है. विज्ञान के प्रयोग प्रायः अनुभव केन्द्रित ही होते है, अतः उनकी सत्यता भी  संभाव्य होती है. हमारी दैनंदिन जिन्दगी अनुभव सापेक्ष है, जहाँ हम आगमन तर्क का सहारा लेते है. इसलिए “सभी मनुष्य मरणशील हैं”, यह वचन निरपेक्ष सत्य नहीं हो सकता हैं. ‘मनुष्य’ और ‘मरणशीलता’ कार्य कारण सम्बन्ध के बारे में कोई निश्चयता प्रदान नहीं करता है, क्योंकि इनके बीच कोई कार्य कारण सम्बन्ध नहीं है. उदाहरण के लिए ‘बाज़ार में जब प्याज का दाम बढ़ता है तो अपराध ज्यादा होते है’― ऐसा कहना कुछ हद तक सही हो सकता है. पर अंततः यह सही साबित नहीं होता है, क्योंकि जब प्याज़ का दाम कम था, तब  कहीं ज्यादा अपराध होते थे. यह मात्र एक काकतालीय सम्बन्ध हैं, यानि दो घटनायें एक साथ घटती है, पर उनमें कोई कार्य कारण सम्बन्ध नहीं होता है. 

Nassim Nicholas Taleb अपनी पुस्तक The Black Swan में दिखलाते है कि इस जगत की घटनाओं में नियमानुवर्तिता होने के बावजूद भी कुछ अनियमिततायें होती है, जिनकी हम अक्सर उपेक्षा कर जाते है. उदाहरण के लिए यदि हम ईश्वर पर विश्वास करते है, तो हम ईश्वर पर अविश्वास करने वाले सभी तर्कों को ख़ारिज कर देते है. ऐसा हम इसलिए करते है, क्योंकि हमारे अन्दर छिपे जो संस्कार है वे प्रतिबंधक बन जाते हैं. वे कहते हैं, जब तक हमने अपने अनुभव में काला राजहंस नहीं देखा था, तब तक “सभी राजहंस सफेद होते है” इस वाक्य को सत्य मानते थे. अचानक एक दिन काला राजहंस दिख गया, और हमारा यह वाक्य मिथ्या प्रमाणित हो गया. वे एक अत्यंत रोचक दृष्टान्त से ‘काले राजहंस’ की उपमा का अर्थ समझाते है. आप किसी नजदीकी व्यक्ति के बारे में साधारणतः जानते है, कि वह किस परिस्थिति में कैसा व्यवहार करता है. पर कभी विपत्ति के समय जब वह मुंह मोड़ लेता है, तो आप दंग रह जाते है कि ‘अरे ! यह तो ऐसा नहीं था.’ असल में आपने उसके इस स्वभाव को पहले अनदेखा कर दिया था. कार्ल पापर (Karl Popper) इसलिए किसी सामान्य वाक्य की सच्चाई जानने से पहले उन परिस्थितियों का कठोरता से परीक्षण करने की सलाह देते है, जिनके तहत वे मिथ्या हो सकते हैं.

इसी प्रसंग में “सभी मनुष्य मरणशील है” उपन्यास की लेखिका Simone de Beauvoir का उल्लेख प्रासंगिक होगा. उपन्यास का किरदार Raimon Fosca अपने शहर में शांति सुरक्षा स्थापित करने के लिए अमर होना चाहता है. लेकिन अमर हो जाने पर उसे आभास होता है कि उसे सिर्फ अपने शहर ही नहीं, पूरे इटली पर नियंत्रण करना होगा, और फिर पूरी दुनिया पर. लेकिन अमर होने से Fosca मनुष्य होने के सभी गुणों को खो देता है, जिन्दगी से उसे अब कोई खतरा नहीं है, वह अमर है. वह हर चीज को ऐसे देखता है जैसे वह अतीत का हिस्सा हो. वह जीवन का सौन्दर्य और अपना लक्ष्य भी भूल जाता है. सारा जगत उसके लिए दीमक का पहाड़ बन चुका है. साथ ही साथ उसे यह भी एहसास होने लगता है, कि वह कभी भी अपने प्रयासों में सफल नहीं हो सकता है. उसे जीवन की व्यर्थता और अमरत्व के वरदान के बीच द्वंद्व की अनुभूति  होने लगती है.

दूसरी तरफ जीवन की क्षणभंगुरता हमें एहसास दिलाती है कि हर क्षण का सदुपयोग करो जिससे हमारा अस्तित्व सार्थक हो सके, क्योंकि हमारा समय इस पृथिवी पर सीमित है. हमें अपनी वास्तविकता से हर क्षण मुठभेड़ करनी चाहिए. मृत्यु को स्वीकार कर लेने से हमारे सपने तेजी से जाग उठते हैं, खतरा लेने का जोखिम भी हम उठा लेते हैं. जीवन में तो हम उच्च कोटि और निम्न कोटि, धनी-गरीब, शिक्षित-अशिक्षित खेमों में बंट जाते हैं, पर मृत्यु में हम समान हो जाते हैं.

टॉलस्टॉय जीवन से निराश होकर स्वयं से पूछते है,  “दुनिया में जो वस्तुएं है, वे क्यों है? मै क्यों हूँ? उनके पास इस प्रश्न का कोई उत्तर नहीं हैं. ‘आकाश नीला क्यों है’ इसकी व्याख्या तो दी जा सकती है― सूर्य की रश्मियाँ वायुमंडल में कुछ यूँ छिटकती है कि आकाश नीला दिखाई देने लगता है. किन्तु तर्क का काम है यह बतलाना कि किस प्रयोग के द्वारा हमें यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि ‘आकाश नीला हैं’. वस्तुतः तर्क करना एक कला और विज्ञान दोनों है, जिसका निर्माण हम करते हैं, और साथ ही साथ इसका परीक्षण-निरीक्षण भी.

Alice in Wonderland में एलिस का सामना ऐसी घटनाओं से हर क्षण होता है, जो वास्तव जगत में नहीं घटती है, जैसे पशु आपस में हमारी तरह ही बातचीत करते है, ताश खेलते है, क़ानूनी कार्यवाही भी करते है इत्यादि. एलिस कुछ ऐसे ही तर्क का सहारा लेकर कहती है, “सभी बिल्लियाँ फ्रेंच भाषा समझती है, कुछ मुर्गियां बिल्ली होती है, अतएब कुछ मुर्गियां फ्रेंच भाषा समझती है”.  सिद्धांत गलत होने पर भी तर्क वैध कहा जाता है. जो कुछ प्रथम हेतु वाक्य में कहा गया उसी की पुनरावृत्ति सिद्धांत में की गई है. जैसे ‘त्रिभुज’ शब्द की परिभाषा से स्पष्ट है कि ‘त्रिभुज की तीन भुजाएं होती है’. संसार में ‘त्रिभुज’ नाम की कोई वस्तु नहीं है, यह एक अमूर्त धारणा है, जिसे हमने बनाया है और मूर्त वस्तुओं पर लागू कर देते हैं, अर्थात हम अपने शब्दों के अर्थों को खुद गढ़ते है, और उनका व्यवहार करते हैं.

अपनी साहसी यात्रा के अंत में एलिस इस निष्कर्ष पर आती है कि वह एक स्वप्न देख रही थी. एक दूसरा जगत, जो इस परिचित जगत के समकक्ष चल रहा था और जो इससे सम्पूर्ण विपरीत था. जितने भी तार्किक नियम है, उन सबका खंडन एलिस के जगत में हम  देखते है. जीवन की जटिलताओं को तार्किक नियमों से नहीं जाना जा सकता है. वस्तुतः “सभी मनुष्य मरणशील है” इस वाक्य की सत्यता तभी प्रमाणित की जा सकती हैं, जब यह निश्चित हो जाये कि ‘यदि कोई एक ‘क’ मनुष्य है’, तो वह मरणशील अवश्य होगा. प्रश्न यहीं आकर थम जाता है―क्या कोई एक भी ‘क’ मनुष्य है?

  1. मैं कहता आंखिन देखी
  2. कालः पचतीति वार्ता
  3. रस गगन गुफा में
  4. अस्ति-अस्तित्व का झिंझोड़
  5. नास्ति की खुन्नस
  6. काल की चपेट  
  7. द्विमुखी सत्य की संकल्पना
  8. जागें जथा सपन भ्रम जाईं  
  9. अनसुलझा समीकरण

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*डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, “दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।“ डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance हाल ही में दिल्ली में सम्पन्न हुए विश्व पुस्तक मेला में रिलीज़ हुई है।

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3 COMMENTS

  1. लेखिका ने बहुत विचारणीय संदर्भ की उपस्थापना की हैं, और यह परोक्ष रूप से सत्य भी है लेकिन विज्ञान का परीक्षण मानता है कि …..” मनुष्य ही नहीं बल्कि सभी जीवित प्राणी निरंतर मरणशील हैं” । हमारे शरीर की कोशिका हर क्षण मरती हैं और निरंतर नई कोशिकाएं जन्म लेती रहती हैं, अतः हम कह सकते हैं कि हम तो निरंतर मरणशील हैं जो कल थे वह आज नही है और जो आज हैं, कल नही रहेंगे, लेकिन हमारी स्थूल इंद्रियां इसको देख नहीं पाती हैं। यह तो प्रमाणित सत्य है कि हमारे खून की एक इकाई केवल तीन महीने ही जीवित रहती हैं लेकिन हम जीवित रहते हैं कारण नई कोशिकाएं निरंतर जन्म लेती रहती हैं। यह जन्म मृत्यु की प्रक्रिया जब वृद्धावस्था में शिथिल पड़ने लगती हैं तब देह का स्थानांतरण दूसरे नए चोले में हो जाता है मात्र क्योंकि आत्मा वही रहती हैं क्योंकि वह अमर हैं उसने अपने आगे के चोले में जहां पर अपनी यात्रा शेष किया था वही से नए चोले में यात्रा शुरू होगी। तब तो यही लगता हैं मनुष्य की देह निरंतर मरणशील हैं लेकिन आत्मा अजर अमर हैं।

  2. शशिजी आपने बिलकुल ठीक कहा, हम हर क्षण मरते है और पुनः नया जन्म लेते है,और इस तरह यह यात्रा पुनर्जन्म की धारणा की पुष्टि भी करता है.तथाकथित एक ही जन्म में लाखों जन्म हो जाते हैं. सूक्ष्म दृष्टि से उन्हें देखना संभव नहीं होता है इसलिए हम स्थूल मृत्यु की बात करते है. शरीर की नश्वरता का ख्याल हमें आता है पर आत्मा की अमरता तो संदेह के घेरे में रह जाती है.
    सुन्दर प्रस्ताव आपका. आदरणीय संपादक महोदय की टिपण्णी से भी प्रेरित होकर इस विषय पर शीघ्र ही लिखने की सम्भावना को नकारा नहीं जा सकता है.
    पढ़ते रहे
    धन्यवाद.

  3. धन्यवाद लेखिका जी। आपकी लेखनी सदा ही साधारण व्यक्ति के लिए प्रेरणा स्रोत हैं। पुनर्जन्म के विश्वासवादियो के लिए आत्मा की अमरता संदेह के घेरे में कैसे हो सकती हैं ? मनुष्यों की विविधता, संस्कार, स्वभाव, रूचि, करणीय कर्म इत्यादि ही प्रमाणित करती हैं और जड़ विज्ञान इसी को Genetics कहता है। हमारी genes ही हमें अपने नक्शे पर चलाती हैं और हम सब इस लीक पर चलने के लिए ही आंतरिक प्रेरणा अनुभव करते हैं।
    बहुत बहुत शुक्रिया आपका. ऐसे ही लिखती रहिए और लिखवाने के लिए प्रेरित करती रहें. प्रणाम।

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