अनसुलझा समीकरण

डॉ मधु कपूर*

पिछले कुछ समय से दार्शनिक सिद्धांतों को हमारी वेबपत्रिका के लिए सहज-सुगम शैली में प्रस्तुत कर रहीं डॉ मधु कपूर का यह नौवां लेख है। इससे पूर्व के उनके सभी लेखों के लिंक हम इस लेख के अंत में दे रहे हैं। यदि किन्हीं पाठकों का कोई लेख छूट गया हो तो इन लिंक्स पर जाकर पढ़ सकते हैं। आज के लेख में उत्तर आधुनिकतावाद में गहन रूप से व्याप्त युग्म (Binary ) की धारणा को हमारे लिए आसान बनाया गया है। स्वयं डॉ कपूर ने अपने इस लेख का जो परिचय भेजा है, वह कुछ इस प्रकार है : “दो पक्षों की लड़ाई में तीसरा जो बचाव करने आता है उससे कहा जाता  है कि ‘या तो तुम मेरे साथ रहो या मेरे विरुद्ध रहो किसी एक को चुनो’ ! एक झूठा द्वंद्व उसके सामने उपस्थित होता है. हम भूल जाते है कि तीसरा पक्ष बहुत आवश्यक होता है जिसमें दोनों पक्षों का सम्मिश्रण करके कुछ मध्यम पंथ की बात की जा सके, जो मेरी भी न हो, तेरी भी न हो”। आइए इस लेख को पूरा पढ़ते हैं।   

टीवी खोले, आमने सामने दो पक्ष बैठे मिलेंगे और तर्क-बाणों के द्वारा एक दूसरे को बींधते दिखेंगे, घर में पिता-पुत्र, माता-पुत्री, शिक्षक-छात्र, पति-पत्नी, दंगल में दो पहलवान, शास्त्रीय संगीत में गायक और वादक तबला-वादक से भिड़ते हुए दिखाई देंगे। किसी भी क्षेत्र में देखें, ‘दो-का-मामला’ जम जाता है। एक तो अकेला बिसूरता रहेगा या शांत, स्थिर होकर काम में मग्न रहेगा, या फिर गोबर-गणेश की तरह बैठा मिलेगा, या फिर किसी साजिश में व्यस्त होगा। दो का मामला गंभीर होता है। उत्तर आधुनिक काल का केंद्रबिंदु ‘दो’ यानि binary अथवा युग्म की धारणा है।  

यूँ तो ‘दो’ शून्य और एक अथवा सत्य और मिथ्या मूल्य का निर्देश करता है। यह पद्धति बुलियन अलजेब्रा पर आधारित है और इसका प्राथमिक प्रयोग कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग और data storage को ठीक रखने के लिए किया जाता है। इस  पद्धति का उपयोग उत्तर आधुनिक काल में कई अन्य तरीकों से जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में किया जाता है। उत्तर आधुनिकतावादियों का तर्क है कि हमारे अन्दर जो छिपा हुआ ‘दूसरा’ है उसे निकाल कर आमने-सामने खड़ा कर देना चाहिए, जो हम से पृथक होकर भी हमें जगाये रखता है। जैसे लोकतंत्र में विपक्ष का रहना बहुत आवश्यक होता है, वैसे ही हमारे अन्दर इस ‘दूसरे’ की पहचान बहुत अनिवार्य होती है। यह एक ‘जुड़वां सत्ता’ है, जो अलग होकर भी एक साथ चलती है।  

साहित्य और कला में युग्म का प्रयोग कथानक या कला को आगे बढ़ने में मदद करता है। किसी पात्र के कथन के उत्तर में यदि कोई जवाब न मिले तो कथानक आगे नहीं बढ़ सकता है। लोकव्यवहार में हम अक्सर इसका प्रयोग करते है ― “आप कुछ बोलें तो बात कुछ आगे बढे”। इस दृष्टि से उत्तर-आधुनिकतावाद हाशिए पर पड़े हुए लोगो की आवाज़ को बुलंद करने के लिए उन्हें  केन्द्र में लाकर खड़ा कर देता है जिससे एक प्रकार का वैमनस्य भी आरम्भ हो जाता है। साधारणतः जिसे हम उच्च कला और निम्न कला, समाज के दलित वर्ग और तथाकथित उच्च वर्ग, लोक संस्कृति और शास्त्रीय संगीत की संज्ञा देते है, उसके भेदभाव को भी उत्तर आधुनिक काल मिटाने का दावा करता है।

यूँ तो हम किसी भी मुद्दे को काले और सफेद, सही और गलत के घेरे में रख कर देखने के आदी होते हैं  पर यदि थोड़ा ठहर कर विचार करें तो हम पाएंगे कि किसी भी घटना या शब्द में निहित अनंत संभावनों को कुरेदने का सामर्थ्य भी यहाँ होता है। प्रसिद्ध फ्रेंच दार्शनिक देरिदा (Jacques Derrida) के अनुसार यह एक सतत शक्ति के समीकरण की प्रक्रिया है, जो विपरीत के द्वारा प्रभावित होते हुए एक नए अर्थ का संधान करती है। एक BMW गाड़ी की तुलना में, एक रिक्शा क्यों नहीं ज्यादा प्रभावशाली हो सकता है?  एक विख्यात अभिनेत्री की तुलना में हमारे घरों में काम करने वाली बाई क्यों नहीं जादू की पुड़िया हो सकती है? तिजोरी में पड़े करोड़ों रुपयों की तुलना में, जेब में पड़ा दस रूपया क्यों नहीं मूल्यवान हो सकता है? किसी प्रभावशाली रेस्ट्रोरेन्ट की तुलना में ताज़ा स्ट्रीट फ़ूड क्यों नहीं बेहतर माना जाय?  अर्थात ये परस्पर सापेक्ष हैं, जिनके स्तरों में कोई भेद नहीं है, और जो एक दूसरे को  प्रभावित करते हुए आगे बढ़ते है। निगाहों को बदलने की आवश्यकता है, इसलिए उत्तरकाल में वैकल्पिक सत्यों की भरमार है, ऐसा लगता है कि हम सत्य की प्रयोगशाला में बैठे है।  

पर यही युग्म जब विरोध या द्वंद्व का रूप ले लेता है, यथा― स्व-सत्ता और पर-सत्ता के बीच जो घटता है, वह नासूर भी बन जाता है। इसे आप “मैं’ और “तुम” के बीच दवंद के रूप में भी देख सकते हैं। वास्तविक जीवन में युग्म यानि अच्छा-बुरा, प्रकाश और अँधेरा, स्त्री-पुरुष, गाँव और शहर इत्यादि के बीच विरोध ही दिखाई देता है, जिससे सामाजिक समस्याएं और संघर्ष बढ़ते जाते है। मैंने पहले ही कहा कि युग्म और द्वंद्व समानार्थक नहीं हैं। युग्म का  सार्थक उपयोग संभावित खतरों से बचाव के लिए किया जाता है, किन्तु आजकल ‘युग्म’ शब्द द्वंद्व के अर्थ में मुठभेड़ का एहसास कराता है।

उत्तर आधुनिकतावादियों का विचार है कि “मैं जो देखता और समझता हूं, वह आपके देखने और समझने से भिन्न है”। वे एक नई अस्मिता की तलाश में पारंपरिक प्रथाओं और तत्वों को अस्वीकार करते है। वे दुनिया को एक नई समझ के साथ जोड़ना चाहते हैं। सामान्यतः मनुष्य परम्पराओं में बंधकर, लकीर के फ़क़ीर की तरह चलते चलते भीड़ में खो जाते है। लेकिन जब कभी उनकी अस्मिता को चुनौती मिलती है, तो वह कुछ नया करने के चक्कर में  वस्तुनिष्ठ और निरपेक्ष सत्य की अवहेलना करके नए सत्य की खोज में निकल पड़ते है, जो सिर्फ उनका ही हो, कहीं से उधार लिया न हो। उनकी हर दिन की बातचीत में यह साफ झलकता है। वे दूसरी संस्कृतियों से उधार लेकर कुछ मिक्स एंड मैच सम्मिश्रण भी तैयार करते है, जो उन्हें नया दीखता है. उनके खाद्य, पानीय, वस्त्र, भाषा इत्यादि सभी क्षेत्रों में इसकी मिसाल देखने को मिल जाती है। इस तरह टुकड़ों टुकड़ों से बना जोड़ “टाट का पैबंद” कहावत को ही चरितार्थ करता है, अथवा एक अभिनवत्व का भी सन्देश दे सकता है, यह विचारणीय होगा।  

स्व-सत्ता की अहमियत के कारण समाज अपने लिए पृथक पृथक नैतिकता को भी स्वीकृति दे देता है, जो अक्सर चिंता का विषय भी बन जाता है, क्योंकि तब हिटलर जैसे राक्षस और महात्मा बुद्ध जैसे संत के बीच कोई नैतिक अंतर नहीं रह जाता है। आज की राजनीति इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। नैतिकता जब अपना कोई विचार नहीं थोपती है, तो वह पसंद नापसंद तक सीमित हो जाता है। नैतिकता की दृष्टि से अब सवाल यह नहीं है कि आपको क्या करना चाहिए, बल्कि आप ‘किसी समस्या का समाधान कैसे करते है’ ― यह देखा जाता है। ‘चाहिए’ हमारे शब्दकोश से अब मिट चुका है. बीसवीं शताब्दी के महान जर्मन दार्शनिक मार्टिन हाइडेगर की दिलचस्पी इस बात को दिखलाना था कि दुनिया में घटनेवाली घटनाएँ हमारी मानवीय स्थिति का चित्र है, हम उनके साथ कैसे खड़े हैं― यह देखना भर है, उन पर चाहिए का ‘टैग’ नहीं लगाना है।  

‘मैँ’ और ‘तुम’ के इस संबंध की दूरी जितनी बढती जाती है, उतना समाज के साथ संवाद समाप्त होता जाता है, मुश्किल यह है कि अपने आप से भी तब संवाद ख़त्म हो जाता है, क्योंकि संवाद के लिए भी तो हमें दूसरा ही चाहिए! टेलीविज़न के कार्यक्रमों में अक्सर निष्क्रिय दूरस्थ श्रोताओं को सवाल पूछ कर सक्रिय बनाने की कोशिश की जाती है। युग्म का कार्य परस्पर विरोधों को तोड़ना है।  

देरिदा अक्सर हमें उलझन में डाल देते हैं, जब वे युग्म के दोनों ध्रुवों की, जैसे, अच्छा बुरा, सच-झूठ, ज्ञान-अज्ञान, आदि की पैरवी करने खड़े हो जाते हैं. आप बहुत कुछ नहीं जानते हैं, तो मैं भी बहुत कुछ नहीं जानता हूँ। स्त्री घर का काम जानती है, तो पुरुष अक्सर उसमें अनाड़ी निकल जाता है। पुरुष यदि बाहर के कार्यों में माहिर है, तो स्त्री अनाड़ी निकल जाती है। ज्ञान और अज्ञान दोनों ही तो हमारे अन्दर एक साथ बैठे हैं। बचपन में जब हम जान बूझ कर झूठ बोलते थे तो हम जानते थे झूठ बोलना अनुचित है, पर उसमें एक सजगता भी होती थी कि माँ ने मेरे झूठ को ठीक से समझ लिया. ‘सच और झूठ’ का युग्म हमारे अन्दर ही छिपा रहता है.

आज का समाज हमें सिर्फ मुठभेड़ करना सिखाता है। Dr. Jekyll and Mr. Hyde की तरह दोनों मनोवृत्तियों का अच्छा खासा प्रदर्शन समाज के प्रति क्षेत्र में देखा जाता है, पर अर्धनारीश्वर की धारणा जो युग्म को साथ लेकर चलती है ― को देखना आस्तिकों की झोली में ही कामयाबी हासिल करती है। अतः रात के आकाश में यदि युग्म तारों को देखें तो दूरबीन का उपयोग करके अक्सर वे पृथक पृथक तारों के रूप में दिखाई देते हैं, जबकि नग्न आंखों से गुरुत्वाकर्षण के खिंचाव के कारण वे एक ही वस्तु के रूप में देखे जाते हैं।  

भगवती चरण वर्मा के उपन्यास चित्रलेखा की अंतिम पंक्तियाँ विचार करने लायक है, जो पाप और पुण्य की सीमा का अतिक्रमण कर जाती है ― “हम न पाप करते है, न पुण्य करते है, हम वही करते है, जो हमें करना पड़ता है”। शायद उत्तर-उत्तर आधुनिकतावाद यही वार्ता देना चाहते है।

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  1. मैं कहता आंखिन देखी
  2. कालः पचतीति वार्ता
  3. रस गगन गुफा में
  4. अस्ति-अस्तित्व का झिंझोड़
  5. नास्ति की खुन्नस
  6. काल की चपेट  
  7. द्विमुखी सत्य की संकल्पना
  8. जागें जथा सपन भ्रम जाईं  
*डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, “दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।“ डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance हाल ही में दिल्ली में सम्पन्न हुए विश्व पुस्तक मेला में रिलीज़ हुई है।

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2 COMMENTS

  1. आपकी बातें अपनी जगह सही होंगी, लेकिन मेरा मानना कुछ अलग है. हो सकता है कि चूंकि मैं दार्शनिक नहीं हूँ, और मुझे दर्शन ‘शास्त्र’ की समझ नहीं है, इसलिए ऐसा हो रहा हो.
    देखिए, आप ‘एक’ को लेकर चल ही नहीं सकते, कम से कम इंसानों की समझ से. अगर केवल एक हो, तो वह एक नहीं, शून्य होगा. सृष्टि में एक के अलावे कुछ और न हो तो वह शून्य से आगे नहीं बढ़ पाएगी.
    वैसे इस बात को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता कि हो सकता है, सब शून्य ही हो और हमारा दिमाग, हमारा logic, हमारी इन्द्रियाँ – ये सब हमें अनेकता का अनुभव करा रही हों.
    जिस डिजिटल दुनिया की बात आपने शुरू में की, उसमें शून्य के साथ एक न हो तो कंप्यूटर चल ही न पाएं. यह बात और है कि सामान्यतः शून्य और एक से बात नहीं बनती, हमें बीच के shades चाहिए, और यह सृष्टि में हर जगह गोचर होता है, analog दुनिया में भी, digital दुनिया में भी, और quantum की दुनिया में भी.
    मुझे यह भी लगता है कि हमें युग्म या सापेक्षता या द्वंद्व को देखने के पैमाने mix नहीं करने चाहिए. भौतिकी, अध्यात्म, समाज और कविता के अपने-अपने सिद्धांत होते हैं और वे एक दूसरे से बिलकुल अलग चलते हैं. जब हम सबको एक ही पैमाने से देखते हैं तो कोई सार्वभौमिक समीकरण कैसे बनेगा? सच में तो एक विधा के पैमाने भी अलग-अलग अवस्थाओं में बिलकुल अलग हो सकते हैं जैसे कि भौतिकी में क्वांटम और खगोल विज्ञान के पैमाने, उनके सिद्धांत, और अंतिम सत्य के बारे में उनकी समझ बिलकुल मेल नहीं खाते.
    दुनिया को अनेकता में देखने के लिए दर्शन की ज़रूरत नहीं, दो ध्रुवों के बीच के shades को appreciate करने की है. शायद इस appreciation की कमी ही द्वंद्व पैदा करती है. आपके दिए हुए उदाहरणों में दो विपरीत व्यक्तियों या विचारों के बीच जो द्वंद्व दिख रहा है, वह ख़त्म हो जाए अगर दोनों प्रतिद्वंद्वी बीच के shades को भी मान्यता देने को तैयार हो जाएं. प्रकृति में ऐसा नहीं होता कि हर समय हर प्राणी या निष्प्राण पदार्थ एक दूसरे से सीना तान कर खड़ा हो. बहुत साम्य से चलती है सृष्टि, फिर हम सत्य को binary दृष्टि से क्यों देखें?

  2. धन्यवाद मनोज जी. आपने समय निकल कर पढ़ा.
    मैने सिर्फ यह दिखने की कोशिश की है कि दुनिया एक से नही चलती है, दो की आवश्यकता अवश्य पड़ती है. लेकिन दोनों के बीच जब संघर्ष बढ़ जाता है तभी वह appreciation की बात ख़त्म हो जाती है, जो आप कह रहे है. तब हम आमने सामने खड़े हो जाते है. संघर्ष से चिंगारियां निकलती है. माध्यम पन्था कभी उल्लेख मैंने किया है, जो बुद्ध/ एरिस्टोटल का मार्ग भी कहा जाता है. साम्यावस्था न हो तो सृष्टि सच में नहीं चल सकती है.
    बिलकुल ठीक कहा आपने दुनिया दर्शन से नही चलती है, दुनिया अपनी गति से चलती है. दुनिया में साहित्य , संगीत, कला न भी हो तो भी दुनिया चलती है, लेकिन यदि हो तो बेहतर चलेगी.
    बहुत बहुत शुक्रिया टिपण्णी के लिए ‘

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