कृषि कानून – शंकाएँ दूर करे सरकार

आज की बात

कल प्रधानमंत्री मोदी ने रेडियो पर अपने मासिक संभाषण ‘मन की बात’ में करीब छ: मिनट तक कृषि और किसानी की चर्चा की और बताया कि “बरसों से किसानों की जो माँग थी, जिन मांगो को पूरा करने के लिए किसी न किसी समय में हर राजनीतिक दल ने उनसे वायदा किया था, वो मांगे पूरी हुई हैं”। प्रधानमंत्री जी की यही खासियत है कि वो कोई भी बात बहुत आत्मविश्वास से कह देते हैं, कुछ भी और वो आम तौर पर चल भी जाता है। आज जब देश भर में किसान हाल ही में लाये गए कृषि क़ानूनों को लेकर सशंकित है और पंजाब-हरियाणा के साथ कई अन्य राज्यों के किसान भी आंदोलन के रास्ते पर हैं तो मोदी जी कितनी आसानी से कह देते हैं कि उन्होंने नए कृषि कानून लाकर किसानों की बरसों से चली आ रही मांगो को पूरा किया है।

उन्होंने एक और बड़ी बात कही – हम यहाँ जो उन्होंने कहा वह ज्यों का त्यों दे रहे हैं – “काफ़ी विचार विमर्श के बाद भारत की संसद ने कृषि सुधारों को कानूनी स्वरुप दिया”। अब अगर उनका आशय ये था कि विचार-विमर्श कहीं और हुआ और संसद ने इन क़ानूनों को पास कर दिया तो अलग बात है अन्यथा सच तो ये है कि कैसे सभी संसदीय परम्पराओं को ताक पर रखते हुए ये बिल पास किए गए, इसको पूरी दुनिया ने देखा। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में नए क़ानूनों पर चर्चा के लिए संसद से बेहतर कुछ नहीं होता और संसद में इन क़ानूनों पर कोई सार्थक चर्चा नहीं हो सकी। ऐसे दीर्घगामी और महत्वपूर्ण क़ानूनों को संसद की स्थायी समिति के पास भेज जाना चाहिए था कि ताकि इनके हर पहलू पर व्यापक चर्चा होती।

कृषि क्षेत्र में अभी भी देश के लगभग पचास प्रतिशत रोज़गारी जुड़े हैं यानि आप देश के इतने बड़े हिस्से के लिए कानून बना रहे हैं और विचार-विमर्श के लिए उस क्षेत्र के किसान संगठनों से बात तक नहीं कर रहे। यहाँ तक कि सरकार की विचारधारा से जुड़े यानि आरएसएस से संबद्ध भारतीय किसान संघ और स्वदेशी जागरण मंच ने भी कृषि क़ानूनों पर अपना विरोध ज़ाहिर किया है। वैसे एक स्वस्थ लोकतन्त्र में तो संसद के अलावा भी विरोधी दलों से बातचीत की जाती है लेकिन मोदी सरकार की तरफ से ऐसी कोई पहल नहीं की जाती सिवाय उन रिवाज़ी मीटिंगों के जो संसद का सत्र शुरू होने से पहले विरोधी दलों के साथ की जाती हैं। लोकतन्त्र में सरकारी पक्ष को उदार दिखना चाहिए, इसके उलट यहाँ तो सरकार हर मामले में अहंकारी लगती है।

सरकार ने किसानों से बातचीत के लिए तीन दिसंबर मुकर्रर की है हालांकि सरकार ने घोषणा और तारीख के बीच 5-6 दिन का गैप क्यों रखा, ये अभी समझ नहीं आ रहा लेकिन उससे भी बड़ी बात ये है कि प्रधानमंत्री की ‘मन की बात’ सहित सरकारी पक्ष से यही संकेत आ रहे हैं कि सरकार क़ानूनों को वापिस लेना तो दूर, उनमें कोई बदलाव करने को भी राज़ी नहीं होगी। फिर 3 दिसंबर को पता नहीं क्या बातचीत होगी?

इस वैबसाइट पर कृषि बिलों पर एक सामान्य चर्चा (इंग्लिश में) हम इस लेख में (लिंक) कर चुके हैं।  उपरोक्त लेख में हमने ऐसे काफी सारे लेखों का ज़िक्र किया जिन्हें पढ़ने के बाद ये आसानी से समझ आ जाता है कि किसान क्यों अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। वैसे उसमें हमने इन बिलों के समर्थन में आए लेखों के लिंक भी दिये हैं ताकि हमारे पाठकों के सामने पूरी तस्वीर हो।

अब हम वापिस मूल विषय पर आते हैं। सबसे पहली बात हमें यह लगती है कि सरकार ने इन क़ानूनों को संसद से पास करवाने में तो हफड़ा-तफड़ी मचाई, उससे तो चाहे ये कानून किसानों के हित में भी होते तो शक पैदा हो जाता। बहरहाल, अभी तो इन क़ानूनों के किसान हित में होना तभी पता चलेगा जब सरकार आंदोलनकारी किसानों और उनके समर्थक विशेषज्ञों के द्वारा उठाए जा रहे सवालों के जवाब ईमानदारी से दे दे।

आंदोलनकारियों का सबसे बड़ा मुद्दा ये है कि इन क़ानूनों के आने से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कमज़ोर कर दिया गया है और सरकार द्वारा नियंत्रित मंडियों का महत्व समाप्त होने से एमएसपी भी अपने आप समाप्त हो जाएगा। मंडियों में तो छ: प्रतिशत टैक्स लगता है, बाहर जब बिना टैक्स के खरीद हो सकती है तो मंडियों का महत्व तो अपने आप समाप्त हो गया।  आंदोलनकारियों का मानना है कि किसानों को बड़े व्यापारियों यानि की दया पर छोड़ दिया गया है।

ऐसा नहीं है कि आंदोलनकारियों को कोई गुमराह कर रहा है और वो बेचारे अज्ञानतावश ऐसी बातें कर रहे हैं क्योंकि बहुत सारे कृषि विशेषज्ञों ने भी पूरा ज़ोर देकर ये बात कही है। देवेन्द्र शर्मा एक कृषि विज्ञानी हैं जिन्होंने बरसों पत्रकारिता भी की है और कृषि से संबन्धित तमाम अंतर्राष्ट्रीय समझौतों की व्याख्या की है।  देश-विदेश के कई नामचीन विश्वविद्यालयों में मानद प्रोफेसर के तौर पर आमंत्रित किए जाते हैं। उन्हें देश के बहुसंख्यक किसानों की सबल आवाज़ के रूप में जाना जाता है। जिन पाठकों को इन कृषि क़ानूनों और या फिर कृषि और किसानों में रुचि है, उन्हें इस स्तंभकार की सलाह है कि वह देवेन्द्र शर्मा के ब्लॉग पर जा कर उनके लेख पढ़ें और उनके यूट्यूब चैनल पर जाकर उनकी वार्ताएं सुनें – किसानों के लिए उनकी चिंताएँ, देश में कुपोषण और भूख कैसे समाप्त हो, ऐसे विषयों पर उनके विचारों को पढ़-सुनकर ये कतई नहीं लगता कि उनका ऐसी बातें कहने में कोई निहित स्वार्थ होगा या वो किसी विचारधारा के ग़ुलाम हैं। असल में वह स्वयं कृषि सुधारों (agricultural reforms) के खिलाफ नहीं हैं लेकिन उनकी मूल चिंता ये है कि इन रेफ़ोर्म्स के केंद्र में किसान का हित होना चाहिए, कोरपोरेट्स या विदेश कंपनियों का नहीं।

एमएसपी के सवाल पर वह बहुत मज़ेदार ढंग से ये बात रखते हैं कि जब स्वयं सरकार, सब रेफ़ोर्म समर्थक अर्थशास्त्री और बड़े उद्योगपति इस बात पर सहमत हैं कि नए कृषि क़ानूनों से किसान की आय बढ़ जाएगी और उसे एमएसपी से भी बेहतर मूल्य मिलेगा तो फिर सरकार कानून में ये प्रावधान क्यों नहीं ले आती कि एमएसपी से कम दाम पर किसान के किसी उत्पाद कि कोई खरीद नहीं होगी। इसका एक जवाब आता है कि अगर पहले ही यह कह दिया गया तो बड़े निवेशक कृषि में आएंगे ही नहीं तो फिर क्या ये साबित नहीं हो जाता कि किसान और बड़े बिज़नेस दोनों को मालूम है कि एमएसपी जितना दाम किसान को नहीं मिलने वाला।

देवेन्द्र शर्मा चेतावनी देते हैं कि इस व्यवस्था के आने से छोटा किसान कृषि से बाहर हो जाएगा और अगर एक बार हमने बड़े बिज़नेस को ये छूट दे दी कि वो छोटे किसान को कृषि से बाहर निकलने को मजबूर कर दे तो फिर सोचिए कि आप उन्हें कहाँ लेकर जाएंगे। देश में उपलब्ध कुल रोज़गार में पचास प्रतिशत कृषि में ही हैं और इनमें 86% छोटे किसान ही हैं जिनका कृषि से बाहर होने का खतरा बढ़ जाएगा। समस्या का कुछ अंदाज़ हो रहा है ना आपको?

देवेन्द्र शर्मा ने अपने एक ट्वीट में आढ़तियों और बिचौलियों की जगह पर कॉर्पोरेट सैक्टर को नए क़ानूनों द्वारा कृषि क्षेत्र में आने के न्यौते पर तंज कसते हुए कहा – “It is a strange argument. The dhoti-kurta clad small middlemen in the mandis is accused of exploiting farmers. At the same time we have no problem with the big middlemen, wearing a tie and suit. Big middleman in reality is a bigger exploiter. That’s what the global experience is.” यानि ये बहुत अजीब तर्क है कि आपको धोती-कुर्ता पहनने वाला आढ़ती तो किसान का शोषण करने वाला लगता है लेकिन दूसरी तरफ आपको सूट और टाई पहनने वाले बड़े मिडिलमैन से कोई समस्या नहीं है – असल में बड़ा मिडिलमैन ज़्यादा बड़ा शोषक है – यही पूरी दुनिया का अनुभव है।

देवेंद्र शर्मा इसी तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि अगर बड़े बिज़नेस और बाज़ार के खुले खेल का फायदा होता तो वह यूरोप और अमेरिका के किसानों को क्यों नहीं हुआ। वहाँ तो पिछले पाँच-छ:-सात दशक से कृषि क्षेत्र बाज़ार के हवाले है। वहाँ क्या किसान की हालत अच्छी है? क्या आपको मालूम है कि अमेरिका में हर किसान को हर वर्ष साठ से बासठ हज़ार डॉलर की सब्सिडि प्रति वर्ष मिलती है जबकि भारत में करीब 200 डॉलर! अगर सारे खर्चे निकाल कर गणना की जाए तो ये ‘माइनस’ में चली जाती है। इतनी सब्सिडी मिलने के बावजूद अमेरिका में केवल डेढ़ प्रतिशत लोग खेती रह गए हैं। देवेंद्र शर्मा पूछते हैं कि भारत सरकार एक असफल (failed) सिस्टम क्यों लाना चाह रही है जो अमेरिका और यूरोप में पूरी तरह असफल हो चुका है?

एक टीवी इंटरव्यू में किसी अन्य चैनल पर पहले कभी हुए इंटरव्यू का हवाला देते हुए देवेन्द्र शर्मा कहते हैं कि एंकर ने मुझसे पूछा कि (नए कृषि कानून बनने से) मार्केट्स तो इतनी ‘एक्साइटेड’ (excited) हैं तो किसान इतने गुस्से में क्यों हैं तो उन्होंने कहा कि आपके सवाल में ही जवाब छिपा है, मार्केट्स खुश हैं क्योंकि उन्हें फायदा दिख रहा है और किसान गुस्से में हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उन्हें नुकसान होगा। कांट्रैक्ट फ़ार्मिंग के संदर्भ में भी उनका यही कहना है कि अगर सरकार की मंशा सचमुच किसान को फायदा पहुंचाने की है तो उसे प्रावधान करने मे क्या दिक्कत है कि कोई भी कांट्रैक्ट एमएसएपी के नीचे नहीं होगा।

इस लेख के वैबसाइट पर पोस्ट करने के पहले ही प्रधानमंत्री मोदी ने वाराणसी मे एक हाई-वे उदघाटन करते समय फिर एक बार कृषि के इन नए क़ानूनों की चर्चा की और कहा “किसान अगर सरकारों की बातों से कई बार आशंकित रहता है तो उसके पीछे दशकों का या लंबा छल का इतिहास है और दूसरी ये कि जिन्होंने वादे तोड़े, छल किया, उनके लिए ये झूठ फैलाना एक प्रकार से आदत बन गई है”। प्रधानमंत्री का ये वक्तव्य उनकी राजनीति का हिस्सा है और ऐसा कहने में किसी को क्या आपत्ति हो सकती है लेकिन जैसा कि उन्होंने स्वयं कहा – “जिन किसान परिवारों की अभी भी कुछ चिंताएं हैं, कुछ सवाल हैं, तो उनका जवाब भी सरकार निरंतर दे रही है, समाधान करने का भरपूर प्रयास कर रही है” तो उन्हें देवेंद्र शर्मा जैसे बिलकुल साफ नियत वाले विशेषज्ञों द्वारा उठाई गई सभी चिंताओं का समाधान भी कर देना चाहिए क्योंकि ये वही चिंताएँ हैं जो हम आंदोलनकारी किसानों द्वारा भी सुन रहे हैं।

ऐसा लगता है कि किसानों की सबसे बड़ी चिंता एमएसपी को लेकर है तो प्रधानमंत्री जी को ये सरकार के किसी ज़िम्मेवार नुमाइंदे को ये बताना चाहिए कि एमएसपी को कानूनी जामा पहुँचाने में सरकार को आखिर क्या दिक्कत है और अगर कोई दिक्कत है तो फिर कम से कम कोई ऐसा कारगर सिस्टम किसानों के सामने रखना चाहिए कि देखिये, ऐसे हम सुनिश्चित करेंगे कि आपको एमएसपी से कम दाम नहीं मिले। ‘कांट्रैक्ट फ़ार्मिंग’ में भी ये सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि किसान और बड़े व्यापारी के बीच कोई भी करार एमएसपी के नीचे ना हो। सबसे अच्छा तो यही है कि एक चौथा कृषि विधेयक लाया जाए जिसमें ये प्रावधान हो कि एमएसपी से नीचे कोई खरीद-बेच नहीं होगी।

इसके अलावा सरकार की तरफ से ये भी बताया जाये तो अच्छा हो कि जब अमेरिका में बड़े बिजनेस के कृषि क्षेत्र में आने से छोटे किसान खेती से बाहर धकिया दिये गए और आज वहाँ बचे-खुचे डेढ़ प्रतिशत किसानों पर 425 बिलियन डॉलर का कर्ज़ है तो भारत में सरकार छोटे किसानों को कृषि क्षेत्र से बाहर ना धकेले जाना कैसे सुनिश्चित करेगी और यदि नहीं तो क्या फिर छोटे किसान दिहाड़ी मज़दूर बन जाएंगे लेकिन मज़दूरों में तो पहले ही बेरोज़गारी है, क्या सरकार के पास कोई योजना है और या इन सवालों का क्या जवाब है? अगर देवेन्द्र शर्मा द्वारा अपने लगभग हर इंटरव्यू में दिये जाने वाले यूरोप और अमेरिका के ये आंकड़े सही नहीं है तो सरकार इनका खंडन करे और यदि ये आंकड़े सही हैं तो फिर कोई माकूल जवाब आना चाहिए।

सरकार लगे हाथ ये भी बताए तो अच्छा हो कि बिहार में तो मंडी से बाहर खरीदने बेचने की छूट पिछले पंद्रह वर्षों से है तो वहाँ किसान की हालत क्यों ना सुधरी? क्यों वहाँ का किसान आज भी मज़दूरी करने पंजाब की तरफ भागता है? महाराष्ट्र में भी कृषि सुधारों के नाम पर एक प्रदेश कांग्रेस सरकार ने ऐसी कुछ व्यवस्था की थी लेकिन वहाँ भी किसान की स्थिति में कोई सुधार होना तो दूर, कुछ गिरावट ही आई।

सरकार द्वारा नियंत्रित मंडियाँ (APMC) अभी तक कृषि उत्पादों का मूल्य तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। अब जब इन मंडियों के बाहर बिना टैक्स दिये खरीद-बेच होगी तो APMC की मूल्यों का संकेत देने की क्षमता तो खतम हो जाएगी। कृषि विषयों की एक विशेषज्ञ सुधा नारायणन जो इन्दिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ डेव्लपमेंट रिसर्च से जुड़ी हैं, हिन्दू अखबार के साथ हुए अपने इंटरव्यू में कहती हैं कि नए सिस्टम में हम “वन नेशन वन मार्केट” की जगह ऐसे छोटे-छोटे द्वीप बना बैठेंगे जहां कृषि उत्पादों का मूल्य अलग-अलग तय हो रहे होंगे। उनका कहना है कि APMC नियंत्रित मंडियों में तमाम खराबियों के बावजूद आखिरकार कुछ डाटा, कुछ सिस्टम तो होता था – नए सिस्टम में तो आप किसान को पूरी तरह से प्राइवेट प्लेयर्ज़ की दया पर छोड़ रहे हैं और उम्मीद कर रहे हैं कि वो किसानों को उचित दाम दे ही देंगे। सरकार जब किसानों की शंकाओं का समाधान कर रही हो तो उसे इस मुद्दे पर ज़रूर कुछ बताना चाहिए।

आलोचकों द्वारा उठाए जा रहे इन सवालों पर सरकार को कन्नी नहीं काटनी चाहिए बल्कि मन लगाकर खुद भी जवाब खोजने चाहियेँ और किसानों को भी इनके जवाब देने चाहियेँ। अगर सबके मन में किसानों के हितों की चिंता है, सरकार के भी और आलोचकों के भी, तो फिर ये कैसे हो सकता है कि कुछ ना कुछ रास्ता ना निकले? ज़रूर निकलेगा! हालांकि मोदी सरकार का रवैय्या शुरू से ही कुछ ऐसा रहा है कि इससे असहमति जताने का मतलब सरकार से वैर बांधना हो जाता है और सरकार संवाद की बजाय बदला लेने जैसी कार्यवाही करने लगती है।

उम्मीद करनी चाहिए कि कृषि क़ानूनों पर नए सिरे से चर्चा होगी और इसके लिए अच्छा हो कि सरकार कोई गोलमेज़ सम्मेलन कराये जिसमें किसान संगठनों एक अलावा कृषि विशेषज्ञों और इन क़ानूनों के मुखर आलोचकों को बुलाया जाये और दूसरी तरफ ऐसे अर्थशास्त्री जो कृषि सुधार चाहते हैं और बड़े बिज़नेस को कृषि मार्केट में उतरना चाहते हैं, उन्हें भी बुलाया जाए। सरकार खुले मन और खुले दिमाग से चर्चा सुने और उसमें हिस्सा ले और फिर जो भी ज़रूरी बदलाव हों, उन्हें करे। हो सकता है कि ऐसी खुली चर्चा में कुछ ऐसे उपाय भी सामने आयें जिन पर अभी तक सरकार का ध्यान नहीं गया है – उदाहरण के लिए सहकारी खेती को बढ़ावा। देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि जब दूध के क्षेत्र में सहकारिता को अमूल ने ज़बरदस्त सफल करके दिखाया है तो कृषि क्षेत्र में ये सफल क्यों नहीं होगी?

नीचे हम कुछ लिंक दे रहे हैं जिनमें उठाई गई शंकाओं का जवाब सरकारी पक्ष चाहे तो दे सकता है!

  1. Devendra Sharma’s Blog – Ground Reality –  https://devinder-sharma.blogspot.com/
  2. Devendra Sharma’s Youtube Channel https://www.youtube.com/c/DevinderSharmaAgriculture/videos
3.     Why Punjab stands to lose from farmers’ produce trade and commerce ordinance

4.     Why India’s agricultural reforms will do little to boost farmer incomes

5.     Farm Bills Will Create a Vacuum That May Result in Utter Chaos: P. Sainath
6.     Will the farm bills benefit farmers?
7.     Why resurrect a failed policy
8.     Farm bills are seen by farmers to deliver freedom — not to them, but to private capital
9.     The Political Economy of Agricultural Market Reforms: An Analysis of the Farmers’ Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Act
10. “New Farm Bills will benefit the Capitalists”:Interview with Farmer Activist Lingraj Pradhan
11. Interview: ‘A Level-Playing Field for Farmers Can Only Come Through an MSP Regime’
12. The Agrarian Crisis in Punjab and the Making of the Anti-Farm Law Protests

 विद्या भूषण अरोरा