कौन थे महात्मा गांधी के आध्यात्मिक मार्गदर्शक?

‘महात्मा के महात्मा’ – सुज्ञान मोदी की पुस्तक का परिचय

अगर आपसे प्रश्न किया जाये कि महात्मा गांधी के आध्यात्मिक मार्गदर्शक कौन थे तो शायद आप  उन शख्सियत का नाम ना ले पाएँ जिनको गांधी जी ने अपने जीवन काल में कई अवसरों पर अपना आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक बताया है। आप इस प्रश्न पर विचार करेंगे तो आपको शायद रस्किन और लियो टाल्स्टोय के नाम तो याद आ जाएंगे किन्तु श्रीमद राजचन्द्र (रायचंद भाई) का नाम आपको भी इस स्तम्भकार की तरह शायद याद ना आए। गांधी जी की आत्मकथा “सत्य के प्रयोग” में उनका ज़िक्र विस्तार से आता है किन्तु इस स्तंभकार ने तो वह कई दशक पहले पढ़ी थी, इसलिए जब यह नाम सामने आया तो जल्दी से कुछ याद ना आया।   

यही उद्देश्य है इस पुस्तक का जिसका परिचय हम यहाँ आपसे करवाने जा रहे हैं। किताबघर जोधपुर द्वारा प्रकाशित ‘महात्मा के महात्मा’ नामक इस पुस्तक के लेखक हैं सुज्ञान मोदी जो अपनी युवावस्था में डॉ राम मनोहर लोहिया और दादा धर्माधिकारी के सान्निध्य में रहे हैं। सुज्ञान मोदी भूमिका में ज़िक्र करते हैं कि उन्होंने गांधी जी पर लिखीं करीब 250 पुस्तकों को खंगाला तो पाया कि इन सब में श्रीमद राजचन्द्र के बारे में बमुश्किल कुछ ही पंक्तियाँ मिलीं। इसलिए उन्होंने तय किया कि वह एक ऐसी पुस्तक प्रकाशित करेंगे जिससे “गांधी जी के बारे में लिखने वालों को, शोधार्थियों को और गांधी जी के बारे में सामान्य जिज्ञासुओं को भी उनके आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक श्रीमद राजचन्द्र जी के बारे में जानकारी मिले।” हालांकि यहाँ यह भी कहना चाहेंगे कि तकनीकी तौर पर सुज्ञान मोदी इस पुस्तक के लेखक नहीं बल्कि संपादक कहे जाने चाहिएँ और या फिर कुछ ऐसा – संचयन एवं सम्पादन : सुज्ञान मोदी”

इस स्तंभकार को जिज्ञासा हुई कि देखें महात्मा गांधी पर सबसे प्रसिद्ध विशद अध्ययन करने वाले इतिहासकार रामचन्द्र गुहा ने इस विषय पर क्या कहा है। गुहा ने अपनी पुस्तक Gandhi – The Years That Changed the World – 1914 -1948” में सिर्फ इतना भर लिखा है कि गांधी जब 1891 में लंदन से बैरिस्टर बनकर लौटे तो वह जैन संत रायचंद भाई के संपर्क में आए और फिर अगले 10 साल तक (जब तक रायचंद भाई जीवित थे) गांधी जी लगातार पत्र-व्यवहार के जरिये उनके संपर्क में रहे। इस जानकारी के अलावा 1100 पृष्ठ की इस भारी-भरकम पुस्तक में इन दोनों के सम्बन्धों का शायद कहीं और ज़िक्र नहीं है।

सुज्ञान मोदी की ये पुस्तक दरअसल एक संकलन है उन प्रसंगों का जहां-जहां गांधी जी ने श्रीमद राजचन्द्र से अपने सम्बन्धों का ज़िक्र किया है। स्वयं गांधीजी ने जिस तरह और जितनी बार इन सम्बन्धों का ज़िक्र किया है, उनके बारे में पढ़कर आश्चर्य होता है कि गांधी जी के इस आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक के बारे में उन्हें भी ज़्यादा क्यों नहीं मालूम जिनकी गांधी जी में रुचि है।

इससे पहले की हम इस पुस्तक के बारे में आगे जानकारी दें, बहुत संक्षेप में श्रीमद राजचन्द्र (जिन्हें गांधीजी एवं उनके अन्य समकालीन रायचंद भाई कहते थे) के बारे में बता दें। रायचंद भाई गांधी जी से आयु में केवल दो वर्ष बड़े थे और महात्मा गांधी से उनकी पहली मुलाकात जुलाई 1891 में मुम्बई में उस समय हुई जब वह  विलायत से वापिस पहुंचे और बैरिस्टर प्राणजीवनदास मेहता के यहाँ ठहरने के लिए पहुंचे। रायचन्द भाई उनके बड़े भाई के दामाद थे। गांधी जी स्वयं इस भेंट के बारे में बताते हुए लिखते हैं – “उन्होंने रायचंद भाई का परिचय ‘कवि’ कहकर दिया और मुझसे कहा – कवि होने के बावजूद ये हमारे साथ व्यापार में हैं; ज्ञानी हैं, शतावधानी हैं”। फिर उन्होंने विस्तार से उस घटना के बारे में लिखा कि किस प्रकार लोगों के कहने पर उन्होंने कुछ बहुत कठिन अंग्रेज़ी और अन्य भिन्न भिन्न भाषाओं के शब्दों की एक सूची बनाई और उसे रायचंद भाई के सामने पढ़ दिया। रायचंद भाई ने धीमी आवाज़ में उन सभी शब्दों को उसी क्रम में दोहरा दिया जिससे गांधी जी बहुत प्रभावित हो गए और उन्हीं के शब्दों में “विलायत के प्रभाव को कम करने के लिए यह अनुभव बहुत अच्छा रहा”। बाद के प्रसंगों में हालांकि ये बताया गया कि श्रीमद ने अपनी शतावधानी शक्तियों का प्रदर्शन जल्दी ही त्याग दिया था।

पुस्तक में श्रीमद के जीवन-वृतांत में बताया गया है कि बहुत छोटी सी आयु से उनमें असाधारण ग्रहणशक्ति थी और उन्होंने 16 वर्ष की आयु में मात्र तीन दिनों में ‘मोक्षमाला’ नामक ग्रंथ की रचना की जिसमें जैन धर्म के गहन सिद्धांतों का रोचक निरूपण किया गया है। फिर स्वाध्याय और साधना चलती रही और तब 1886 में सर्वशास्त्र के सार रूप में ‘श्री आत्मसिद्धि शास्त्र’’ की रचना की। 1901 में मात्र 33 वर्ष और पाँच माह की आयु में उन्होंने देह त्याग किया।

पुस्तक की शुरुआत होती है गांधीजी द्वारा लिखे पाँच संस्मरणों से जिनमें पहले ही प्रकरण में गांधी जी बता देते हैं कि श्रीमद राजचन्द्र उनके लिए कितने महत्वपूर्ण थे। गांधीजी लिखते हैं – “मुझ पर तीन महापुरुषों ने गहरा प्रभाव डाला है। टोल्स्टोय, रस्किन और रायचंद भाई…जिस समय मेरे मन में हिन्दू धर्म के बारे में शंका उत्पन्न हुई, उस समय उसके निवारण में मदद देने वाले रायचंद भाई ही थे।” पुस्तक में दक्षिण अफ्रीका के प्रिटोरिया जेल से गांधी जी द्वारा 26 अप्रैल 1909 को एच. एस. एल. पोलक को लिखा एक पत्र संकलित है जिसमें वह लिखते हैं, “मैं कविश्री के जीवन और उनकी रचनाओं के संबंध में जितना विचार करता हूँ, उतना ही मुझे लगता है कि वे अपने युग के सर्वश्रेष्ठ भारतीय थे। वस्तुतः मैं उनको धार्मिक बोध की दृष्टि से टोल्स्टोय से ऊंचा मानता हूँ”।   

ये सब प्रसंग सम्पूर्ण गांधी वाङ्ग्मय में संकलित हैं और सुज्ञान मोदी ने हर जगह ये बताया है कि उन्होंने अमुक प्रसंग वाङ्ग्मय के किस खंड और पृष्ठ संख्या से उद्धृत किया है। 

महात्मा गांधी जब युवावस्था में विलायत पढ़ने गए थे तो उनका परिचय कई प्रमुख ईसाई परिवारों से हुआ जिनसे उनकी धार्मिक विषयों पर चर्चा होती थी। तभी से उन्हें कई किस्म की धार्मिक और आध्यात्मिक शंकाएँ होने लगीं थीं। 1891 में वापिस आने पर उनकी पहचान श्रीमद से हुई और युवा गांधी इस युवा दार्शनिक के पास लगातार धर्म, दर्शन और अध्यात्म पर चर्चा के लिए जाने लगे। फिर वह 1894 में दक्षिण अफ्रीका चले गए और वहाँ फिर से गांधी जी की चर्चा अन्य धर्मावलम्बियों और जिज्ञासुओं से होने लगी। युवा बैरिस्टर को फिर से अपने मित्रवत मार्गदर्शक की याद आई और उन्होंने 27 प्रश्नों की एक फहरिस्त बनाई और 25 वर्षीय इस युवा बैरिस्टर की इन शंकाओं का बहुत ही सधा हुआ समाधान इस 27 वर्षीय दार्शनिक ने किया है।

युवा गांधी द्वारा पूछे गए ये 27 प्रश्न ऐसे हैं जो किसी भी धर्म जिज्ञासु के हो सकते हैं और इनके उत्तर भी श्रीमद ने इतने उदार मन से दिये हैं कि कहीं भी यह नहीं लगता कि वह अपना धर्म या अपना मत लादने का प्रयास कर रहे हैं। दस पृष्ठों का यह अध्याय इस पुस्तक की ‘हाईलाइट’ कहा जा सकता है। प्रश्नों की बानगी देखिये – आत्मा क्या है, ईश्वर क्या है, मोक्ष क्या है, वेद किसने बनाए हैं, गीता किसने बनाई, पूर्वजन्म तथा पुनर्जन्म का पता किसे चलता है, दुनिया की अंतिम स्थिति क्या होगी, कृष्ण और राम क्या साक्षात ईश्वर थे या उसके अंश थे, उन्हें मानने से मोक्ष मिलता है क्या….इत्यादि। हमें नहीं मालूम कि जब युवा गांधी को जब ऐसे सब प्रश्नों के उत्तर युवा दार्शनिक से प्राप्त हुए होंगे तो उनको कितना संतोष हुआ होगा क्योंकि इसका कोई विवरण नहीं मिलता लेकिन पुस्तक में ये उत्तर पढ़कर हमें एक साधारण पाठक के तौर पर भी यही लगा कि ये सब ‘मैच्योर’ टिप्पणियाँ हैं। बेशक इनसे नए प्रश्न भी उपजते हैं लेकिन बहुत सी शंकाओं का समाधान भी होता है।   

पुस्तक में गांधीजी की रायचंद भाई में श्रद्धा और विश्वास जगह-जगह दिखाई पड़ता है। अहमदाबाद में श्रीमद राजचन्द्र जयंती के अवसर पर 21 नवंबर 1915 को अपने भाषण में गांधी जी कहते हैं, “श्रीमद भारत में आधुनिक काल के सर्वोत्तम धार्मिक दार्शनिक थे। वे किसी भी संकीर्ण मत को नहीं मानते थे। वे समस्त विश्व को अपना घर मानते थे और संसार के किसी भी धर्म पर उनको आपत्ति नहीं थी।“ एक अन्य ऐसे अवसर पर 16 नंबर 1921 को गांधी जी अपने भाषण में कहते हैं- “मैं अनेक बार कह चुका हूँ कि मैंने बहुत सारे व्यक्तियों के जीवन से बहुत-कुछ ग्रहण किया है। लेकिन सबसे अधिक अगर मैंने किसी के जीवन से ग्रहण किया है तो वह कविश्री के जीवन से ही किया है। दयाधर्म भी मैंने उनके जीवन से सीखा है”।

ऐसा लगता है कि गांधी जी ने श्रीमद के अनेक स्मृति भाषणों में हिस्सेदारी की। हर भाषण में वह यह अवश्य बताते थे कि उन्होंने रायचंद भाई के जीवन से क्या-क्या सीखा। एक भाषण जो उन्होंने 31 अक्तूबर 1925 को मांडवी में श्रीमद की स्मृतिसभा में दिया था, गांधी जी कहते हैं, “उनके जीवन से हम चार चीज़ें सीख सकते हैं : शाश्वत वस्तुओं में तन्मयता; सारे संसार के साथ एक समान व्यवहार अर्थात जीवन की सरलता; सत्य और अहिंसामय जीवन।

हालांकि गांधी जी श्रीमद राजचन्द्र को अपना आध्यात्मिक गुरु कहने से तो बचे हैं किन्तु आध्यात्मिक विषयों पर स्पष्टता के लिए वह पूरी तरह उन्हीं पर निर्भर करते थे। गुजरात के एक सज्जन पूँजाभाई को श्रद्धांजलि देते हुए गांधी जी लिखते हैं, “मैं पूँजाभाई की तरह रायचंद भाई को गुरु का पद तो नहीं दे सका पर वे मेरे आध्यात्मिक क्षेत्र में जीवन के मार्गदर्शक, परामर्शक व दार्शनिक, अभिन्न, सर्वश्रेष्ठ, और अनन्य मित्र थे”।

पुस्तक के अन्य हिस्सों की चर्चा करें तो सबसे पहले ये बताना चाहेंगे कि पुस्तक में गांधी जी और श्रीमद के बीच सम्बन्धों की चर्चा (अधिकांशतः गांधी जी के शब्दों में) के अलावा श्रीमद के जीवनचरित पर भी श्रद्धापूर्ण लेख हैं। ‘श्रद्धापूर्ण’ इसलिए कहा कि इनमें श्रीमद की सिद्धियों का भी किसी ना किसी रूप में वर्णन है। इनमें से एक लेख की चर्चा विशेष तौर पर करना चाहेंगे जो किन्हीं फूलचंद शास्त्री का लिखा हुआ है। वह 144 देशों की यात्रा कर चुके हैं और वहाँ श्रीमद राजचन्द्र द्वारा रचित “आत्मसिद्धि शास्त्र” को वहाँ की स्थानीय भाषाओं में अनुवाद करके ‘स्थापित’ (प्रचारित – लाइब्रेरी आदि में देकर) कर चुके हैं। लेखक का मानना है कि वह श्रीमद के अधूरे स्वप्न को पूरा कर रहे हैं क्योंकि उन्होंने वचनामृत में लिखा था – “सम्पूर्ण सृष्टि में पर्यटन करके सत्य धर्म की स्थापना करूंगा”। लेकिन इस पूरे प्रकरण में एक बहुत बड़ा चमत्कार जिसके बारे में फूलचंद जी ने अपने लेख में निस्संकोच बताया है, उसका ज़िक्र इस पुस्तक परिचय में आवश्यक है। वो चमत्कार ये है कि फूलचंद जी उपरोक्त 144 देशों में जहाँ भी उतरते हैं, उन्हें एयरपोर्ट पर उतरते ही वहाँ की भाषा आ जाती है और फिर वह वहीं की भाषा में “आत्मसिद्धि शास्त्र” का अनुवाद करके वहाँ ‘स्थापित’ कर देते हैं। स्वाभाविक है कि इस दावे पर विश्वास नहीं होता लेकिन लेखक जिस आत्मविश्वास से ये बात लिखते हैं, ऐसा लगता है कि ये बात सच भी हो सकती है और ये परा-विज्ञानियों के लिए अध्ययन और जांच का एक विषय हो सकता है।

पुस्तक का अंतिम हिस्सा (करीब 100 पृष्ठों का) गांधी जी पर कुछ लेखों का है जिन्हें अलग-अलग लेखकों ने लिखा है और इन लेखों में से दो-एक को छोड़ कर कोई भी श्रीमद राजचन्द्र से गांधी के सम्बन्धों को लेकर नहीं है। गाँधीजी पर कुछ लेख तो महान विभूतियों के ही लिए गए हैं जैसे विनोबा भावे, जवाहरलाल नेहरू, राधाकृष्णन इत्यादि लेकिन कुछ लेख आधुनिक विचारकों के हैं जिनका परिचय देने की ज़रूरत नहीं समझी गई है। इनमें ज़्यादातर लेखों का स्तर अच्छा है बल्कि एक-आध (जैसे कुमार प्रशांत का लेख) तो उत्कृष्ट हैं लेकिन फिर भी ये तो कहना होगा कि “महात्मा के महात्मा” पुस्तक के फ्रेम में ये लेख फिट नहीं हो रहे। ऐसा लग रहा है कि चूंकि सुज्ञान मोदी “गांधी और विनोबा के आध्यात्मिक विचारों के समर्पित साधक हैं” (जैसा कि उन्होंने अपने परिचय में बताया है) तो उनको गांधी पर लेखों के बिना अधूरापन लग रहा होगा।

पुस्तक के कवर पर आम तौर पर दोनों तरफ पुस्तक का परिचय दिया जाता है। किसी कारण से इस पुस्तक में ऐसा नहीं किया गया है। होता तो पुस्तक को विक्रेता की शेल्फ से उठाने में आसानी होती। कवर पर दिये गए परिचय के अनुसार सुज्ञान मोदी डॉ राममनोहर के सान्निध्य में भी रहे और समाजवादी समागम, स्वराज पीठ और राष्ट्रीय आंदोलन फ्रंट जैसे संगठनों से जुड़े रहे हैं। उनके द्वारा ‘महात्मा से महात्मा’ जैसी पुस्तक का संचयन एवं सम्पादन बहुत महत्वपूर्ण है। हो सकता है कि ये पुस्तक भारतीय राजनीति के प्रगतिशील लोगों के मन में गांधी जी की आध्यात्मिक दृष्टि के बारे में रुचि और उत्सुकता जगाए।

विद्या भूषण अरोरा  

2 COMMENTS

  1. रायचंद भाई और गोखले का जिक्र बापू ने हमेशा बहुत सम्मान से किया है। यह पुस्तक और यह टिप्पणी बड़े अभाव की पूर्ति है।

  2. बढ़िया, जानकारीपूर्ण पुस्तक समीक्षा। रायचंद भाई के बारे में जितनी श्रद्धा और सम्मान से गांधी ने लिखा है उस अनुपात में उनपर बहुत कम जानकारी उपलब्ध है।

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