तीन कवितायें – ओंकार केडिया

बारिश

बारिश से

बारिश, आज ज़रा जम के बरसना,

उन काँपती बूढ़ी हथेलियों में

थोड़ी देर के लिए ठहर जाना,

बहुत दिन हुए,

उन झुर्रियों को किसी ने छुआ नहीं है.

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फ़ैसला

उसने कहा,

जो भी कहना है,

कम शब्दों में कहो,

मेरे पास समय नहीं है.

मैंने कहना शुरू किया,

उसने फिर टोका,

कहा, ध्यान रखना,

सिर्फ ज़रूरी बात कहना,

मेरे पास समय नहीं है.

उसके पास जितना समय था,

उसने यही कहने में लगा दिया

कि उसके पास समय नहीं है,

मेरा समय पूरा हुआ,

अगला मामला शुरू हो गया,

मेरा फ़ैसला आ गया है,

मैं अब फिर सुनवाई के इंतज़ार में हूँ.

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मेरा गाँव

बहुत बोरिंग है मेरा गाँव,

सोता रहता है अक्सर,

आराम से जागता है,

पर जल्दी में नहीं होता,

दातुन करता है रगड़-रगड़ कर,

लोटे से पानी डालता है

धीरे-धीरे बदन पर.

दिन में पगडंडियों पर घूमता है

या घुसा रहता है खेतों में,

सूरज डूबता नहीं

कि तोड़ने लगता है रोटियाँ,

अँधेरा होता नहीं

कि सो जाता है.

बड़ा बोरिंग है मेरा गाँव,

कोई नहीं आता यहाँ कभी,

पक्की सड़क भी कन्नी काटकर

निकल गई है इसकी बगल से.

बड़ा बोरिंग है मेरा गाँव,

पर क्या करूँ, यही पसंद है मुझे,

सच कहूं, बुरा मत मानना,

तुम्हारे शहर में अब

मेरा मन नहीं लगता.

*Onkar Kedia has been a career Civil Servant who retired from the Central Government Service recently. He has been writing poems in Hindi and English on his blogs http://betterurlife.blogspot.com/ and http://onkarkedia.blogspot.com/

6 COMMENTS

  1. सुंदर रचनाएँ। बधाई कवि महोदय को और विद्याभूषण जी को भी। ऐसा बेबाक मंच आज के दौर में अति आवश्यक है।
    और भी उम्मीदें हैं।

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