पारुल बंसल की कुछ नई कविताएं

क्षणिकाएं


१- एक पंक्ति जब मचाती है
अंतर्द्वंद मध्यरात्रि
भोर तक उसका
दम घुट चुका होता है

२-बड़ी बेचैन थी वो पंक्ति
खुद को पन्ने पर
न्योछावर करने को
और अपनी काया पर
चित्रकारी पाने को

३-पंक्तियों का पंक्तिबद्ध ना होना
अर्थ के अनर्थ का मूल कारण है

४-मैंने देखी है सभी पंक्तियां
कविता की
और मनुष्यों की भी

कुछ और रचनाएँ

लंबे सफर को निकले अरसे बाद 

शब्द मेरे मुसाफिर हो गए

 यायावरी कर हर जुबां को

 सुकूं दे रहे

*प्रेम की हर इबारत का आखर
लाल लिखती रही
काश! तुम स्त्री होते
तो तुम्हें पता चलता
कि मैं भी करना जानती हूं
हुकूमत
अपने से निर्बल पर

*पहली छोड़ दूसरी से
विवाह रचाया
तभी उसकी बेहतरी का
प्रमाण -पत्र हाथ आया


* शोर है फिज़ाओं में
कि गुलाबों की सुरभि ने
भंवरों को मदहोश कर दिया है
गुलाबों को कटघरे में लाया गया है
मुजरिम करार दिया जा रहा है

तभी वकील ने दलील पेश की
हुजूर प्यासा कुएं के पास आया है….

*तुम्हारा मेरे

 सुर से सुर मिलाना

 और उसका

 अनंत काल तक अनुरणन (गूंजना)

समस्त सृष्टि का

 दूसरा एवं

 परिष्कृत जन्म होगा…..

*पारुल हर्ष बंसल मूलत: वृन्दावन से हैं और आजकल कासगंज में हैं। इनकी कवितायें स्थानीय पत्र-पत्रिकाओं और वेब पोर्टल्स पर प्रकाशित होती रही हैं। स्त्री-अस्मिता पर कविताएं लिखना इनको विशेष प्रिय है। इनकी कवितायें पहले भी इस वेबपत्रिका में पढ़ चुके हैं। इस पोर्टल पर प्रकाशित कविताओं में से कुछ आप यहाँयहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं।

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