शिक्षा के ‘यूरेका क्षण’ – प्राथमिक शिक्षा पर लेखों की तीसरी कड़ी

राजेन्द्र भट्ट*

प्राथमिक शिक्षा पर राजेन्द्र भट्ट का चिंतन-मनन जारी है। इस विषय पर उनके पिछले दो लेख आप यहाँ और यहाँ देख सकते हैं। अपने तीसरे लेख में भी उन्होंने बहुत ज़रूरी सवालों को उठाया है और जैसा कि हमने पहले भी कहा था, इन सवालों में ही अक्सर जवाब भी निहित हैं। कुछ पाठकों ने उनके लेखों के नीचे कमेंट सेक्शन में टिप्पणियाँ की हैं। उस तरह की टिप्पणियों का तो स्वागत है ही, यदि आप भी शिक्षा से जुड़े किन्हीं मुद्दों पर उद्वेलित हैं और अपनी बात कहना चाहते हैं तो अपना लेख हमें विचारार्थ भेज सकते हैं।  

प्राइमरी शिक्षा पर चर्चा के दौरान, पिछली बार शिक्षकों/ शिक्षा-मैनेजरों से ऊन का धागा आगे जोड़ने का वादा किया गया था। पर मन को अगर किस्से-कहानियों की रसीली राह मिले, तो तर्क-वितर्क की रूखी चर्चा कौन करता है – बेशक ऊन कुछ और उलझ जाए।

विवेकपूर्ण-वैज्ञानिक ज्ञान जब अचानक गुत्थियों के अंधेरे से रोशनी के सुलझाव में ले आता है तो आर्कमिडीज़ वाला  उत्तेजना का ‘यूरेका क्षण’ सामने आ जाता है। अगर शिक्षक-शिक्षिकाएँ इन ‘यूरेका क्षणों’ से बच्चों को दो-चार कर सकें, उन्हें विज्ञान और विवेक से नए ज्ञान की किसी रोशनी के छोर को पकड़ने का उल्लास और उत्तेजना दे सकें तो पढ़ाई मजेदार हो जाए – बच्चों की जिज्ञासा और वैज्ञानिक तरीके से समाधान की प्रवृत्ति जग जाए।

चलिए, पहले ‘यूरेका’ किस्से  पर आएँ। बहुत ही प्रवाहपूर्ण हिन्दी में, बच्चों के लिए खूब भावात्मक उतार-चढ़ाव भरी कहानी मैंने प्राइमरी में पढ़ी। शीर्षक था – ‘राखी।‘ अंग्रेजी जानने-समझने के अवसर जीवन में बहुत बाद में आए। और तब पता चला कि ये अंग्रेजी की मशहूर ‘सिंडरेला’ कहानी का रूपांतर  है। कहानी की नायिका गरीब बच्ची को लकड़ियों के गोदाम में रखे जाने से उसका नाम  ‘सिंडरेला’ पड़ा। ‘सिंडर’ यानि जलती-कोयला होती लकड़ियाँ, राख़। तब, अपने हिन्दी के उस अनाम रूपांतरकार की प्रतिभा को समझने का ‘यूरेका’ क्षण आया। ‘सिंडरेला’ की हिन्दी वाली बहन – ‘राखी’- राख़ सी ही बेरंग-बेजान।

शायद दूसरी कक्षा में ऐसी ही एक मज़ेदार कहानी पड़ी- ‘मुन्नी लाल चुन्नी।‘ जो टोकरी में सामान ले कर नानी के घर जा रही थी। रास्ते में मिला धूर्त भेड़िया और अंत में – एक लकड़हारे ने उसे मार दिया। कहानी के साथ बने चित्र में उस ‘नन्ही’ ‘मुन्नी’ का लाल स्कार्फ मुझे अब तक याद है। ‘यूरेका’ क्षण बहुत बाद में आया। यह ‘‘मुन्नी लाल चुन्नी’ ही तो अंग्रेजी वाली मशहूर ‘लिटिल रेड रोबिनहुड’ थी!

अब शिकायत पर आऊँ। ‘सिंडरेला’ के बहाने, ‘शिक्षा-मैनेजर-अफसर’ शिक्षकों को, और वे बच्चों को  बता सकते थे कि यूरोप की भीषण सर्दी में, उस बिना बिजली के दौर में लकड़ी का गोदाम कितना ज़रूरी, पर कितना अंधेरा, गंध-सीलन भरा होता होगा। पर ‘शिक्षा-मैनेजर-अफसर’ में तो इस अनुपम  प्रतिभाशाली रूपांतरकार का परिचय देने की समझ-सहृदयता भी नहीं थी।

तो मास्टर जी ने ‘राखी’ और ‘सिंडरेला’ का संबंध नहीं बताया – शायद उन्हें भी किसी ने नहीं बताया होगा। ऐसा ही मज़ेदार ‘यूरेका’ क्षण मुन्नी लाल चुन्नी में भी था। एक भाषा, भूगोल, संस्कृति, जीवन-शैली और मूल्यों के इको-सिस्टम को बगैर किसी सलवट के दूसरी भाषा और भाव-भूमि के इको-सिस्टम में, रूपांतरित और भावांतरित यानी ‘एडेप्ट’ कर देना (महज अनुवाद नहीं), वह भी बच्चों के लिए, अद्भुत  सौंदर्य का काम था। इस सौन्दर्य से बच्चों की झोली भर देना एक ‘यूरेका’ क्षण होता। ‘ए थिंग ऑफ ब्यूटी इज ए जॉय फॉर एवर।‘ सौन्दर्य की समृद्धि-उसका भरापन – सारी जिंदगी हमें तमाम तरीकों के संकरेपन और काइयांपन से बचाते हैं।  हम, बस हिन्दी पढ़ सकने वाले गाँव के साधनहीन बच्चे अंग्रेजी के बाल-साहित्य, यूरोप की जलवायु और भाव-भाषा और अनाम रूपांतरकार की प्रतिभा और मेहनत जैसे ‘यूरेका’ अनुभवों से वंचित रह गए। शिक्षा रट्टा हो गई, ’यूरेका’ न हुई।

सभी रूपांतरकार ऐसे न थे। ‘संत कबीर’ पर चौथी कक्षा की कुछ पंक्तियाँ मास्टर जी ने ज्यों का त्यों रट लेने और परीक्षा में उलट देने को कहा था, इसलिए काफी कुछ अब भी याद है – ‘कबीर का जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था। लोकापवाद के डर से वह उसे लहरतारा नमक तालाब के किनारे छोड़ आई।‘ यकीन मानिए, गुरुदेव के आदेश को पूरा-पूरा मानते हुए हमारे 9-10 साल के मन में ये सवाल नहीं आए – ‘विधवा’, ‘ब्राह्मणी’ क्या सामान्य  ‘स्त्री’ या इंसान से अलग होती है कि ये खुलासा 9 साल के बच्चे के लिए ज़रूरी था? जिस पीढ़ी और गाँव के बच्चों को स्त्री-पुरुष के फर्क-सी ‘गंदी बात’ भी, नौवीं-दसवीं की जीव विज्ञान की किताब से इशारों में पता चले और उस किताब के भी उन अंशों को बच्चे रसीले उत्साह से पढ़ें, वहाँ इस पाठ में, बच्चे के पैदा होने के लिए ‘गर्भ’ ज़रूरी है – यह बताने की शायद ज़रूरत नहीं थी। और ये – ‘लोकापवाद’! बाप रे, एक तो शब्द इतना भारी, और फिर बच्चों को कैसे समझाएँ कि ‘विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से’ बच्चे के पैदा होने से कैसा भीषण  ‘लोकापवाद’ होता है कि बच्चे को तालाब  के किनारे छोड़ना पड़े! शायद इसीलिए, इस अंश को बिना समझे रट लेने को कहा गया। जिज्ञासा और सवाल करना दिमागी सेहत के लिए अच्छा होता है, यह हमें नहीं बताया गया था। बल्कि, इन्हें अभद्रता ही माना जाता था। और आप जानते ही हैं, शिक्षा का माध्यम हिन्दी और डंडा थे।

इस पाठ और इस भाषा को रचने, पाठ्यपुस्तक में रखने वाले शिक्षा-मैनेजर बाल मनोविज्ञान और शिक्षण (पेडागोजी) के कितने जानकार होंगे?

मेरे एक संजीदा-संवेदनशील मित्र ने अपना अनुभव बताया कि गणित जैसे ‘वैल्यू-न्यूट्रल’ विषय के सवालों में अक्सर  मोहन, राम – उनसे कुछ कम कमला-विमला (जो प्रायः ‘लड़कियों वाली’ ही खरीद-बिक्री की ‘गणित-क्रियाएँ’ करती हैं) खरीद-बिक्री, व्याज-उधार करते हैं, ताकि बच्चे जमा-घटा-गुणा-भाग-ब्याज आदि सीख सकें। लेकिन इनमें अब्दुल, फातिमा, पीटर एकदम गायब हैं। ये उत्तर प्रदेश की बात है जहां अब्दुल, फातिमा, पीटर इतने गायब भी नहीं हैं।

 अब बात एक ‘स्टीरियोटाइप’ की – 50 साल पहले जब कश्मीर भारत की खूबसूरत सैरगाह थी, तब अपनी किताब में कश्मीर का परिचय एक ‘गुल मुहम्मद’ था, उसके भाई-बहन, परिवार – सब नाव चलाते थे, वहीं रहते थे। कुछ लोगों के पास हाउस बोट भी थे। बदलते हिंदुस्तान और नए कश्मीर के गुल मुहम्मद की नाव वाली जिंदगी से आगे की, पढ़ाई-लिखाई-सपनों-उमंगों की  कोई बात नहीं थी।

ऐसे ही, नई सड़क, दिल्ली से प्रकाशित पतली-मरियल सी ‘बाल हिन्दी व्याकरण’ की एक किताब मिली। लेखिका का नाम ‘एक अनुभवी शिक्षिका’ था – संभवतः यह उनका ‘पार्ट टाइम’ कार्य था। किताब में पुल्लिंग-स्त्रीलिंग-नपुंसक लिंग के साथ एक, ‘उभय लिंग’ भी था। बाद में, हमें अंग्रेजी ग्रामर की किताब में ‘कॉमन जेंडर’ मिला। क्या अपना ‘उभय लिंग’  वही था? अगर हैं, तो क्या हिन्दी व्याकरण का मूल अंग्रेजी व्याकरण में है? मेरा विषय नहीं, लेकिन शायद हिन्दी व्याकरण का मूल संस्कृत में होगा। व्याकरण तो भाषा की रीढ़ है। हम पाणिनि के अद्भुत व्याकरण पर गर्व भी करते हैं। तब क्या किसी अंग्रेज़ को, उसकी मानक ‘रेन एंड मार्टिन’ के टक्कर की कोई व्याकरण की मानक किताब बता सकते हैं? क्या अपने समय में हम दावे से, और गर्व से खुद को वैयाकरण कहने वाले आचार्य किशोरीदास वाजपेयी के अलावा कोई नाम ले सकते है? क्या रबीन्द्रनाथ-विद्यासागर ने जैसे प्राइमर लिखी, वैसे ही हिन्दी में कोई कद्दावर लेखक/लेखक-समूह  प्राइमर और फिर ‘रैन एंड मार्टिन’ जैसी व्याकरण की मानक पुस्तक और ऑक्सफोर्ड जैसा मानक, सब को स्वीकार्य शब्दकोश लिखेंगे? या हिन्दी वाले बालक ‘अनुभवी शिक्षिका’ के भरोसे ‘न्यू लाइट इन जनरल इंगलिश’ के अनुवाद वाला हिन्दी व्याकरण सीखेंगे?

अब बात एनसीईआरटी की बहुत मेहनत से, विशेषज्ञों द्वारा तैयार की गई, ‘इंटर एक्टिव’ पाठों वाली किताबों की बात करें। हम इस बात की भी सराहना  करेंगे कि एनसीईआरटी और उसकी राज्य-जिला स्तरीय शाखाएँ/ नेटवर्क शिक्षक-शिक्षिकाओं को इन किताबों के मर्म को समझने के लिए निरंतर वर्कशॉप-प्रशिक्षण करते हैं, ताकि बच्चों  में वैज्ञानिक समझ, जिज्ञासा, तर्कशीलता, स्वस्थ मानव-मूल्य पनपें-मजबूत हों, ‘विधवा ब्राह्मणी के गर्भ’ जैसी गैर-जिम्मेदार पढ़ाई न हो। लेकिन—-

यहाँ भी ‘लेकिन’ जुड़े हैं और ऊन उलझी है। ये शिक्षक-शिक्षिकाएँ अपने घर-स्कूल में यथासंभव एनसीईआरटी की ‘कठिन’ किताबों से बच कर निजी ( शिक्षा की बारीकियों से हीन) निजी किताबों की सिफ़ारिश करती हैं। और जब एनसीईआरटी की किताबें अनिवार्य हो जाएँ तो?

एक किशोर बच्चे की एनसीईआरटी की किताब के पन्ने पेंसिल के सैकड़ों काटने के निशानों से भरी थी। उसने बताया कि टीचर ने सारी फालतू बातें काट कर, उतना ही पड़ने को कहा  है, जितने में ‘प्रशन का आन्सर’ आ जाए और ‘फुल बटा फुल’ आएँ। इसी किताब में मुझे एक ‘यूरेका’ क्षण मिला। उसमें भारत का किसी विदेशी विद्वान का बनाया प्राचीन नक्शा था। मुझे लगा कि उस नक्शे में भारत जैसे उलट गया है- एक उत्तर-दक्षिण ‘मिरर इमेज’ जैसी है। मैंने बच्चे को यह बताया और इस बहाने सही तरह से देखने, ‘परसेप्शन’ की गलतियों, गलत परिणामों और बिना भावुक हुए, बिना पहले से राय रखे, चीजों को देखने-समझने के बारे में चर्चा की। बच्चे की आँखों में मैंने ‘यूरेका मोमेंट’ का उत्साह देखा – एक नये आर्कमिडीज़ की संभावना देखी। उसे स्कूल में यह सब नहीं बताया गया था। वहीं ये सब बातें ‘ध्यान से नहीं पढ़ने’ के लक्षण थे, जिससे फुल नंबर नहीं आएंगे।

पिछले लेख में, मैंने प्राइमरी शिक्षा की महत्वपूर्ण कड़ी – शिक्षक/शिक्षा मैनेजरों के बारे में बात करने का संकेत दिया था। इन प्रसंगों से उस बात के विविध आयाम और चुनौतियाँ सामने आ गई होंगी। लेकिन आखिरी और सबसे ज़रूरी बात – उनकी आलोचना इस लेख का पूरा सच नहीं है।

पूरा सच यह हो सकता है कि प्राइमरी शिक्षा देश के भविष्य की बुनियाद है। लेकिन अगर प्राइमरी शिक्षक होना नौकरी का अंतिम विकल्प हो या प्राइमरी शिक्षिका मध्य-वर्गीय संस्कारी परिवार की इसलिए पसंदीदा हो कि चार पैसे कमाए, दो-ढाई बजे घर लौट कर सुगढ बहू बने, तब तो एनसीईआरटी की पूरी सदिच्छाओं, प्रशिक्षणों के बावजूद हालात बदलेंगे नहीं।   

इसलिए हम प्राइमरी  और माध्यमिक शिक्षकों और उसके मैनेजरों को उच्च शिक्षा के प्रोफेसरों, कुलपतियों के बराबर सम्मानजनक क्यों नहीं मान सकते? क्या एक समग्र शिक्षा सेवा नहीं हो सकती जो दूसरी किसी केंद्रीय सेवा जितने वेतन, अधिकारों और सम्मान वाली हो? और जिसमें भर्ती, उसके बाद का प्रशिक्षण उतना ही प्रतियोगी और चुनौती भरा हो? और इस सेवा का हर अध्यापक-अध्यापिका कुछ साल पढ़ा कर राज्य और देश की राजधानी में शिक्षा-प्रशासक – डाइरेक्टर, जाइंट सेक्रेटरी बनने की अपेक्षा क्यों न करे? शिक्षा के व्यावहारिक अनुभव से हीन लोग प्रशासक और शिक्षक ‘मामूली मुलाजिम’ क्यों बना रहे?  जब तक शिक्षक-शिक्षिका के जीवन में नए-नए ‘यूरेका अवसर’ नहीं होंगे, वे विद्यार्थियों को शिक्षा के, जिज्ञासा के, वैज्ञानिक-विवेकपूर्ण सोच के ‘यूरेका क्षणों’ का जादू और उल्लास नहीं दिला सकेंगे।

कठिन लगता है, शायद सपने जैसा  भी  – पर हर यथार्थ पहले सपनों में ही देखा जाता है।  

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*लंबे समय तक सम्पादन और जन-संचार से जुड़े रहे राजेन्द्र भट्ट अब स्वतंत्र लेखन करते हैं। वह नियमित रूप से इस वेब पत्रिका में लिखते रहे हैं। उनके अनेक लेखों में से कुछ आप यहाँयहाँ और यहाँ देख सकते हैं।

डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं और इस वैबसाइट का उनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। यह वैबसाइट लेख में व्यक्त विचारों/सूचनाओं की सच्चाई, तथ्यपरकता और व्यवहारिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।  

2 COMMENTS

  1. राजेंद्र भट्ट जी के तीनों आलेख कल एक साथ पढ़े. जरूरी होने पर भी शिक्षा ऐसा विषय है जिसपर शिक्षा—जगत से जुड़े लेखकों को छोड़कर बहुत कम लिख पाते हैं, या यूं कहो कि लिखने के लिए समय निकाल पाते हैं या फिर बच ही जाते हैं. अपने लेखों में राजेंद्रजी ने स्थितियों का हवाला दिया है, कमोबेश हम सभी उनके साक्षी रहे हैं. जिन दिनों को वे याद कर रहे हैं तब भाषा, यानी हिंदी अभिव्यक्ति की भाषा होने के साथ—साथ अस्मिता की भाषा भी थी. अब वह स्थिति नहीं रही. इसके लिए जिम्मेदार वही लोग हें जो हिंदी की रोटी खाते हैं. हिंदी लेखकों की ओर से बच्चों के लिए कहानी, कविता, संस्मरण वगैरह पर हर वर्ष हजारों पुस्तकें प्रकाशित की जाती हैं. लेकिन एक भी ऐसी पुस्तक प्रकाशित नहीं की जाती जो मौलिक हो, और बच्चों की पाठ्यपुस्तक का विकल्प और नहीं तो पूरक सामग्री ही बन सके. उन्हें यह गैर—रचनात्मक काम लगता है. यह स्थिति बड़ों के साहित्य के साथ भी है. हिंदी के लेखक, जिन्हें मैं साहित्यकार मानने में संकोच करता हूं, कहानी, कविता जैसी साहित्यिक विधाओं को छोड़कर पुस्तक लिखने में संकोच करते हैं. यही कारण है कि कई विषयों में हिंदी में आज भी कंगाली छाई हुई है. केंद्रीय शिक्षण संस्थान के लिए काम करते हुए बीते वर्षों में कई ऐसे अनुभव हुए जब खास वय के विद्यार्थियों के लिए उपयोगी शिक्षण सामग्री की खोज में हिंदी साहित्य की खूब छान—बीन की गई पर परिणाम अपेक्षा से बहुत कम संतोषजनक थे.
    लेखमाला जारी रहनी चाहिए, इसपर चर्चा भी होनी चाहिए. यह ध्यान रखते हुए कि हालात से तो सभी वाकिफ हैं, सवाल है कि उसे बदला कैसे जाए…

  2. आप जैसे गंभीर अध्येता की टिप्पणी और जुड़ाव बहुत महत्वपूर्ण है।

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