आर.के. नारायण की ‘लॉली रोड’ का पुनर्पठन

……..अनुवाद – राजेंद्र भट्ट

2018 का वर्ष अपने हिसाब से इतिहास में तोड़-मरोड़, देशद्रोह और देशभक्ति के सर्टिफिकेट देने और बड़ी-बड़ी प्रतिमाएं बनाने के गौरव-यशोगान में पिछले वर्षों के रिकॉर्ड तोड़ता रहा है। अंग्रेज़ी साहित्य में विश्व भर में नाम कमाने वाले आर. के. नारायण को देश के हालात यहां तक पहुंचने की उम्मीद तो नहीं होगी, लेकिन उनकी एक कहानी बताती है कि देशभक्ति, इतिहास गढ़ने-बिगाड़ने के बौद्धिक हल्केपन और राजनैतिक धूर्तता का सिलसिला पुराना है।

नारायण की इस कहानी का नाम है ‘लॉली रोड’ और वही हम आज आपको सुनाना चाहते हैं। ‘लॉली रोड’ की आबो-हवा में भीड़ और भीड़ के आकाओं की वाणी और कर्म में सांप्रदायिक ज़हर, कानून हाथ में ले लेने और आतंक फैलाने का उन्माद नहीं है – बस, फायदा उठाने का चातुर्य है जिसमें ह्यूमर है, व्यंग्य है, हल्की मुस्कान भी है।

‘लॉली रोड’ की भीड़ महज़ धरना-प्रदर्शन करती है। लेकिन आजकल की भीड़ और उसके आकाओं के चेहरे वीभत्स, अपढ़, गुस्सैल और धमकी भरे हैं। यह नफरत, डर, उन्माद और ‘लिंचिंग’ वाली तरक्की हमने पिछले कुछ सालों में हासिल की है।

इस दिलचस्प कहानी को हमारे मित्र राजेन्द्र भट्ट ने राग-दिल्ली के लिए खास तौर पर अनुवाद किया है। नाम और इतिहास बदलने के मौजूदा दौर में इस कहानी को दोहराया जाना इसलिए भी ज़रूरी है कि हमें याद रहे कि निराश होने की ज़रूरत नहीं क्योंकि क्षुद्रता (टुच्चापन कहना कुछ लोगों को बुरा लगेगा) हमारे दौर में ही नहीं उस जमाने में भी थी जब आज़ादी मिलने के तुरंत बाद हम उच्च आदर्शों के साथ रहना चाह रहे थे।

‘लॉली रोड’

मालगुडी में कई सालों तक लोगों को पता भी नहीं था कि यहां कोई नगरपालिका भी है। नगरपालिका के सक्रिय नहीं होने से कोई फर्क भी नहीं पड़ रहा था। बीमारियां फैलती थीं तो अपनी मियाद पूरी होने पर समाप्त भी हो जाती थीं। आखिर बीमारियों को तो खत्म होना ही होता है। धूल-धक्कड़ और कूड़ा हवा चलने से नज़र से दूर चले जाते थे। नाले अपने आप ही सूखते थे और उफनते भी थे – उनसे जुड़ी दिक्कतें भी अपने आप ही खत्म भी हो जाती थीं। नगरपालिका तो महज़ पृष्ठभूमि में रहती थीं।

            ये हालात तब तक बने रहे जब पंद्रह अगस्त उन्नीस सौ सैंतालीस को देश आज़ाद हो गया। उस दिन कश्मीर से कन्याकुमारी तक जिस पैमाने पर खुशियां मनाई गई, इतिहास में ऐसे वाकये बिरले ही आते हैं। हमारी नगरपालिका को भी इससे प्रेरणा मिली। उसने सड़कों-गलियों की सफाई करवाई, नाले साफ करवाए गए और जगह-जगह झंडे फहराए गए। जब कस्बे की गलियों-रास्तों से होकर झंडों और गाने-बजाने के साथ जुलूस निकले तो सबके दिल बाग-बाग हो गए।

            नगरपालिका के अध्यक्ष बड़े शालीन तरीके से अपनी बालकनी से नीचे देखते हुए बुदबुदाए, “हमने भी इस महान अवसर पर अपना कर्तव्य निभा दिया,‘‘ मुझे यकीन है, उनके साथ खड़े पालिका के एक-दो सदस्यों ने उनकी आंसुओं से डबडबाई आंखें ज़रूर देखीं होंगी। दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने सेना को कंबलों की सप्लाई कर खूब पैसे बनाए थे। फिर नगरपालिका का अध्यक्ष बनने के लिए भी उन्होंने खासे पैसे लुटाये। कमाई और पैसे लुटाने की यह अपने आप में महागाथा है, जिसका इस किस्से से कोई मतलब नहीं है। आज की कहानी तो दूसरी है।

            लेकिन अध्यक्ष जी को आज़ादी के आयोजनों से थोड़े दिन ही तसल्ली रह सकी। एक सप्ताह में जब सारे झंडे-डंडे उतार गए, वह काफी उदास हो गए। मैं उस समय एक कस्बाई अखबार के रिपोर्टर के तौर पर खबरें लगाता था और मुझे हर छपी खबर पर दो रुपये प्रति इंच के हिसाब से भुगतान होता था। यही मेरी रोजी-रोटी थी। इस सिलसिले में मेरा करीब-करीब रोज़ ही अध्यक्ष जी के पास आना-जाना होता था।

हर महीने, मैं करीब दस इंच खबरें उस अखबार में लगा लेता था जिसमें ज़्यादातर नगरपालिका के काम-काज की तारीफ करने वाली खबरें होती थीं। इससे मुझे नगरपालिका में काफी पसंद किया जाता था। मैं अध्यक्ष जी के दफ्तर में जाता ही रहता था। उनकी उदासी देखकर मैंने उनसे पूछा, “अध्यक्ष जी, क्या समस्या आ गई?”

            “लगता है हमने पर्याप्त काम नहीं किया,” उन्होंने जवाब दिया।

            “कैसा पर्याप्त?” मैंने पूछा।

            “इस महान अवसर के अनुरूप कुछ बड़ा काम नहीं किया।“ उन्होंने सोचते हुए आगे कहा, “चलो अब कुछ बड़ा करता हूं।“

            उन्होंने नगरपालिका की असाधारण बैठक बुलाई; जोशीला भाषण देकर उन्होंने प्रेरित किया; और वे तुरंत ही इस बात के लिए राज़ी हो गए कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के सम्मान में सभी गलियों-सड़कों, पार्कों के नाम राष्ट्रीय नेताओं के नाम पर रख दिये जाएं।

            शुरुआत मार्केट एसक्वायर के पार्क से हुई। उसे कोरोनेशन (राज्याभिषेक) पार्क कहा जाता था। राम ही जाने किसके राज्याभिषेक पर इस पार्क का नाम रखा गया- वह महारानी विक्टोरिया भी हो सकती थी, सम्राट अशोक भी। अब तक किसी ने इस बारे में सोचने की ज़हमत भी नहीं उठाई थी। लेकिन अब तो बात ही दूसरी थी। पुराना बोर्ड उखाड़ कर फेंक दिया गया और वहां यह घोषित करता नया चमचमाता साइन-बोर्ड लगा दिया गया कि अब से यह ‘हमारा हिंदुस्तान पार्क’ कहा जाएगा।

            बाकी परिवर्तन इतने आसान नहीं रहे। सबसे ज्यादा मांग महात्मा गांधी रोड की थी। आठ वार्डों के सभासद (म्यूनिसिपल काउंसलर) यह नाम चाहते थे। छः अन्य काउंसलर अपने घर के पास की सड़क का नाम नेहरू रोड या नेताजी सुभाष रोड रखवाना चाहते थे। नामों को लेकर गर्मा-गर्मी होने लगी और मार-पीट की आशंका होने लगी। आखिर ऐसी हालत हो गई कि मुझे लगा कि नगरपालिका के लोग पागल हो गए हैं। उन्होंने चार सड़कों को एक ही नाम दे डाला।

            जनाब, सबसे महान लोकतांत्रिक और देशभक्त शहर में भी एक नाम की दो सड़कें होना व्यावहारिक नहीं है। सप्ताह भर में ही नतीजे सामने आने लगे। नये नामों ने शहर के इलाकों की पहचान ही मिटा दी। मार्केट रोड, नॉर्थ रोड, चित्रा रोड, विनायक मुदाली स्ट्रीट वगैरह का तो ज़माना ही चला गया। अब तो चार-चार जगहों पर सभी मंत्रियों-उपमंत्रियों और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्यों के नाम नज़र आने लगे।

ज़ाहिर है, इससे मुसीबतें बढ़ गईं। चिट्ठियां गलत जगह पहुंचने लगीं, लोगों के लिए यह बताना मुश्किल हो गया कि वे कहां रहते हैं। किसी को रास्ता बताना भी मुश्किल हो गया। शहर की सारी जानी-पहचानी जगहों की पहचान गायब होने से अफरा-तफरी मच गयी।

            लेकिन अध्यक्ष जी अपने इस महान कार्य से गद्गद थे। लेकिन उनकी यह भाव-विह्वलता भी ज्यादा दिन नहीं चली। वह फिर बेचैन हो गए कि अब क्या नया काम करें।

            लॉली एक्सटेंशन और मार्केट के बीच एक प्रतिमा लगी थी। लोग उसके रोज़ाना नज़र आने के इतने आदी हो गए थे कि उन्होंने कभी सोचा और पूछा भी नहीं कि यह किसकी प्रतिमा थी। यहां तक कि लोग उसे मुंह उठा कर देखते भी नहीं थे। आमतौर पर उस पर पक्षी बैठे रहते थे।

अध्यक्ष जी को अचानक याद आया कि यह तो सर फ्रेडरिक लॉली की प्रतिमा है और इलाके का नाम उसके नाम पर पड़ा था। अब तो इसका नाम गांधी नगर हो गया था इसलिए लॉली के पुतले के वहां बने रहने का तो कोई औचित्य ही नहीं था। बस, नगरपालिका ने तुरंत पुतले को वहां से हटाने का प्रस्ताव पारित कर दिया।

अध्यक्ष जी और नगरपालिका के सदस्य अगले दिन शान से निकले और प्रतिमा का एक चक्कर लगाया। अब उन्हें अपनी गलती पता चली। बीस फुट ऊंची यह प्रतिमा पिघले शीशे के आधार पर खड़ी थी। उन्होंने तो सोचा था कि उनके जोशीले प्रस्ताव के पारित होते ही इस अंग्रेज़ सरदार का पुतला ज़मीन पर ओंधे मुह गिर पड़ेगा। लेकिन अब उन्हें पता चला कि यह तो किसी पर्वत सा मजबूत है। अब उन्हें पता चला कि ब्रिटेन का राज यहां किसी कच्ची बुनियाद पर नहीं टिका था। लेकिन इससे उनका संकल्प और मज़बूत हो गया। अगर इस काम के लिए उन्हें शहर के इस इलाके को विस्फोट से उड़ा देना पड़े, तो वे ऐसा भी कर गुजरेंगे।

उन्होंने सर फ्रेडरिक लॉली के बारे में पूरा इतिहास ही खोद निकाला। वह यूरोप को कंपाने वाले हूण अतीला और नादिर शाह जैसा बर्बर और मैकियावेली जैसा धूर्त था। उसने तलवार की धार पर हिंदुस्तानियों को गुलाम बनाया और जहां से भी विरोध की तनिक भी आवाज़ आई, उन गांवों को धूल में मिला दिया। भारतीयों की तो वह तब तक शक्ल तक नहीं देखना चाहता था जब तक वे घुटने टेककर उसके सामने न गिड़गिड़ाएं।

लोग अपने काम-धंधे छोड़कर प्रतिमा के आस-पास जमा होने लगे – उन्हें अब ताज्जुब होने लगा था कि अब तक उन्होंने इस प्रतिमा को बरदाश्त कैसे कर लिया। उन्हें लगने लगा कि अकड़ कर दोनों हाथ पीछे की तरफ मोड़ते हुए, कमर पर बंधी पेटी से कटार लटकाए यह इंसान उनकी तौहीन करते हुए हमारे राष्ट्र पर हंस रहा है। इस बात में कोई शक नहीं कि वह अब तक का सबसे बर्बर तानाशाह था। अपनी ब्रीचेज, विग, सफेद वास्कट और सख्त-घमंडी नज़र के साथ वह भारत में ब्रिटिश गुलामी के तमाम घृणित और सुपरिचित लक्षणों का प्रतीक बन गया था। लोग इस बात को सोच कर ही कांपने लगते कि उनके पूर्वजों को इस इंसान के कैसे-कैसे अत्याचार झेलने पड़े होंगे।

अब नगरपालिका ने टेंडर जारी किए। करीब एक दर्जन ठेकेदारों ने एस्टीमेट भेजे। प्रतिमा को हटाने और इसे नगरपालिका तक पहुंचाने के लिए सबसे कम रकम का टेंडर पचास हजार रुपए का था। नगरपालिका के लोग भी पशोपेश में थे कि आखिर प्रतिमा को रखा कहां जाए। अध्यक्ष जी ने भी इस बारे में सोचा। उन्होंने मुझसे पूछा, “तुम क्यों नहीं इस प्रतिमा को ले लेते? अगर तुम बिना कोई पैसे लिए इस प्रतिमा को हटा लो तो मैं तुम्हें यह प्रतिमा मुफ्त में दिलवा दूंगा।”

अब तक मैं सोचता था कि नगरपालिका के मेरे दोस्त पागल हैं लेकिन अब मुझे लगा कि मैं भी उन जैसा पागल हो सकता हूं। मैंने पूरे मामले को पूरी तरह धंधे की तरह से देखना शुरू किया। अगर इस प्रतिमा को हटाने में मेरे पांच हजार रुपए लग जाएं (मैं जानता था कि ठेकेदार ज्यादा रकम का एस्टीमेट दे रहे हैं) और मैं इसकी धातु को छह हजार रुपए में बेच दूं… तीन टन धातु की कुछ भी कीमत मिल सकती है। ये भी हो सकता है कि मैं इस प्रतिमा को वेस्टमिंस्टर एबे में बेच पाऊं। मुझे लगा कि मेरे कस्बे के अखबार में काम करने के दिन अब खत्म होने वाले है।

मुझे प्रतिमा ले जाने की अनुमति देने का प्रस्ताव पारित करने में नगरपालिका को कोई अड़चन नहीं हुई। मैंने इस काम के लिए पुख्ता इंतजाम किए। मैंने अपने ससुर जी को बहुत बढ़िया ब्याज देने का वादा करते हुए पैसे उधार लिए। मैंने प्रतिमा को आधार से काटने के लिए पचास कुली लगाए। मैं गुलामों के मालिक की तरह खड़ा हो गया और उन्हें चिल्ला-चिल्लाकर निर्देश देता रहा। उन्होंने शाम छह बजे तक जमकर काम किया और सवेरे-सवेरे फिर काम पर आ गए। वो कोप्पल इलाके से खास तौर से लाए गए मजदूर थे जहां के आदमियों के बाजू मैम्पी के जंगलों में पीढ़ियों से सागौन की लकड़ियां काटते-काटते फौलादी हो गए थे।

हमने दस दिन तक कटाई जारी रखी पर प्रतिमा का आधार भले ही कहीं-कहीं छिल भले हो गया हो, इसके कटने की उम्मीद नज़र नहीं आई। मुझे लगा कि इस तरह फालतू में मजदूरी चुकाते तो मैं एक पखवाड़े में कंगाल हो जाऊंगा। मैंने जिला मजिस्ट्रेट से डाइनामाइट की कुछ छड़ें हासिल करने की अनुमति ली, प्रतिमा के आस-पास के इलाके की रस्सियों से घेराबंदी कर दी और डाइनामाइट में आग लगा दी। इसी तरह मैं प्रतिमा को खरोंच तक लगे बगैर उसे आधार से उखाड़ पाया।

फिर प्रतिमा को अपने घर तक ले जाने में मुझे तीन दिन लगे। प्रतिमा को खास तौर पर बनाई गई गाड़ी को कई बैल खींच रहे थे। मार्केट रोड पर इस गाड़ी के गुजरते समय खासी अफरा-तफरी थी। मैं लगातार चिल्लाता गाड़ीवान को निर्देश दे रहा था और लोग मजाक बना रहे थे। धूप कड़ी थी और हर संकरे मोड़ पर सर फ्रेडरिक की गाड़ी अटक जाती थी – न आगे बढ़ पाती थी, न पीछे खिसक पाती थी। सब तरफ का ट्रैफिक अटक जाता और मेरे घर तक प्रतिमा के पहुंचाने से बहुत पहले ही शाम हो जाती।

मुझ पर तो जैसे खासी मुसीबत ही पड़ गई थी। पूरी रात मैं प्रतिमा के पास पहरा देता और प्रतिमा जैसे खुली आंखों से आसमान के तारों को ताकती रहती। मुझे प्रतिमा पर तरस भी आता और मैं कहता, “ठीक है भाई, तुम्हारे जैसे घमंडी साम्राज्यवादी का यही हस्र होना था। अंत बुरे का बुरा।” खैर, जैसे-तैसे तीन दिनों में प्रतिमा मेरे घर पर पहुंच ही गई। उसका सिर और कंधे तो मेरे छोटे से घर के बाहरी हॉल में थे तो बाकी शरीर दरवाजे से होते हुए बाहर की गली में विराजमान था। कबीर लेन के मेरे उदार पड़ोसियों ने इस परेशानी को, बिना चिढ़े झेल लिया।

नगरपालिका ने मेरी सेवाओं के लिए धन्यवाद प्रस्ताव पारित किया मैंने अपने अखबारको इस सारे वाकये की दस इंच की खबर भिजवा दी। एक सप्ताह बाद, अध्यक्ष जी मेरे घर आ पहुंचे। वह काफी बेचैन नज़र आ रहे थे। मैंने उन्हें तानाशाह (की प्रतिमा) की छाती पर बिठा दिया। वह बोले, “बुरी खबर है। तुम्हें शायद प्रतिमा के बारे में रिपोर्ट अपने अखबार को नहीं भेजनी चाहिए थी। अब यह देखो…….”

उन्होंने टेलीग्रामों का एक पुलिंदा निकाला। ये टेलीग्राम इतिहास से जुड़े संस्थानों के थे। ये सभी प्रतिमा हटाए जाने का विरोध कर रही थीं। हमें सर फ्रेडरिक के बारे में गलत जानकारी दी गई थी। वह सारा इतिहास तो वारेन हेस्टिंग्स के ज़माने के किसी और लॉली के बारे में था।

प्रतिमा वाले फ्रेडरिक तो एक मिलिट्री गवर्नर थे जो अठारह सौ सत्तावन के गदर के बाद मालगुडी में बस गए थे। उन्होंने इस इलाके में जंगल साफ करवाए – एक तरह से मालगुडी कस्बा उन्होंने ही बसाया। उन्होंने ही यहां भारत की पहली सहकारी समिति की स्थापना की। उन्होंने ही सरयू नदी के पानी को नहरों के जरिए यहां लाने की व्यवस्था की जिससे हजारों एकड़ ज़मीन की सिंचाई संभव हो सकी, जबकि इससे पहले यह नदी सूखने की स्थिति में थी। उन्होंने फलां काम किया और सरयू नदी में बाड़ के दौरान इसके किनारे बसे लोगों को बचाने के दौरान उनका निधन हो गया।

वह पहले ऐसे अंग्रेज़ थे जिन्होंने ब्रिटिश संसद को भारत से जुड़े मुद्दों में ज्यादा से ज्यादा भारतीयों को शामिल करने का सुझाव दिया। कहते हैं कि अपने एक डिस्पैच में उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा, “ब्रिटेन को, अपनी ही भलाई के लिए, एक दिन भारत छोड़ना पड़ेगा।“

अध्यक्ष जी ने बताया, “सरकार ने हमें प्रतिमा को फिर से लगाने का आदेश दिया है।“ “असंभव!” मैं चिल्लाया, “अब यह प्रतिमा मेरी है- मैं इसे अपने पास ही रखूंगा। मैं राष्ट्रीय नेताओं की प्रतिमाएं जमा करना चाहता हूं।“

            लेकिन मेरी इस राष्ट्रीय भावना का किसी पर असर नहीं पड़ा। एक ही हफ्ते के अंदर सारे अखबारों में सर फ्रेडरिक लॉली छा गए। लोग जोश से भरे हुए थे। वे मेरे घर के सामने नारेबाज़ी करने लगे। मैंने पेशकश की कि अगर नगरपालिका कम से कम प्रतिमा को यहां तक लाने के मेरे खर्च की भरपाई कर दे, तो मैं प्रतिमा छोड़ दूंगा। जनता ने मुझे अपना दुश्मन समझा।

लोग कहने लगे, “यह आदमी इस प्रतिमा की भी कालाबाज़ारी करना चाहता है।” उनकी बातों से चिढ़ कर मैंने अपने दरवाजे पर नोटिस लगा दिया – “प्रतिमा बिक्री के लिए। ढाई टन मज़बूत धातु का तोहफा। किसी देशभक्त मित्र के लिए आदर्श उपहार। दस हज़ार रुपये से ज्यादा की बोली ही स्वीकार की जाएगी।“

            इस नोटिस से तो लोग गुस्से से उबल पड़े। वे मुझे लात-घूंसे मारना चाहते थे लेकिन चूंकि वे अहिंसा की परंपरा में पले-बढ़े थे, इसलिए उन्होंने मेरे घर के बाहर धरना दे डाला। वे बारी-बारी से मेरे घर के सामने जमा होते थे और नारेबाजी करते थे। मैंने अपनी पत्नी और बच्चों को गांव भेज दिया ताकि मेरे घर में प्रतिमा की जगह बन सके। इसलिए मुझ पर उनके धरने का कोई असर नहीं पड़ा। बस, मुझे ज्यादातर घर के पिछले दरवाज़े से आना-जाना पड़ता था।

नगरपालिका ने मुझे एनशिएंट मौन्यूमेंट एक्ट (प्राचीन स्मारक कानून) के तहत मुकदमे का नोटिस भेजा। मैंने उसका माकूल जवाब दे दिया। अब मेरे और नगरपालिका के वकील के बीच कानूनी दांव-पेंचों की लड़ाई शुरू हो गई। बस, इसमें एक ही दिक्कत आई कि मेरे पहले से ही प्रतिमा से अटे घर में कागजात के ढेर जमा हो गए।

मैंने भी प्रतिमा पर कब्जा जमाए रखा। हालांकि मन ही मन मैं भी हताश था कि आखिर कब तक यह सिलसिला ज़ारी रहेगा। कब वो दिन आएगा जब मेरे घर से प्रतिमा और कागजात का यह अंबार हटेगा और मैं खुले-खुले घर में सुकून से रह सकूंगा।

आखिर छह महीने बाद मुक्ति की राह खुली। सरकार ने नगरपालिका से प्रतिमा तथा दूसरी अनियमितताओं के बारे में रिपोर्ट मांगी और पूछा कि क्यों नहीं इनके मद्देनजर वर्तमान नगरपालिका को भंग कर दिया जाए और नये चुनाव कराए जाएं।

मैं अध्यक्ष जी के पास गया और उन्हें सुझाव दिया, “अब आपको कोई शानदार काम दिखाना होगा। क्यों नहीं आप मेरे घर को राष्ट्रीय स्मारक के रूप में खरीद लेते?”

“मैं भला ऐसा क्यों करूं?” उन्होंने पूछा।

            मैंने बात साफ की, “क्योंकि यहां सर एफ. विराजमान हैं। आप उन्हें उनकी पुरानी जगह पर ले जा नहीं सकते। ये जनता के पैसे की बरबादी मानी जाएगी। क्यों नहीं आप उन्हें यहीं स्थापित करवा देते। आखिर वह काफी वक्त दूसरी जगहों पर रह चुके हैं। मैं आपको वाजिब कीमत पर अपना घर बेच सकता हूं।“

            “नगरपालिका के पास इसके लिए फंड नहीं है।“ उन्होंने कहा।

“मुझे पता है, आपके पास पैसों की कमी नहीं है। आपको नगरपालिका के फंड की ज़रूरत क्या है? सर एफ. की यहां स्थापना अपनी तरफ से करने को आपका महान कार्य समझा जाएगा। देश भर में इसे मिसाल माना जाएगा…”

            मैंने उन्हें सुझाया कि उन्होंने (विश्व युद्ध के दौरान) कंबलों के कारोबार में खासा कमाया है। अब थोड़ा जेब ढीली करें। मैंने उन्हें आगाह किया, “आखिर अगर नगरपालिका भंग होती है तो फिर से चुनाव लड़ने में आपका कितना ज्यादा खर्च होगा!”

            बात उनकी समझ में आ गई। हमने मकान की कीमत तय कर ली।

            कुछ दिन बाद अखबारों में यह खबर पढ़कर उन्हें बेहद खुशी हुई –

“मालगुडी नगरपालिका के अध्यक्ष ने बड़े प्रयासों के बाद सर फ्रेडरिक लॉली की प्रतिमा स्वयं खरीद ली है। यह राष्ट्र के लिए उनका उपहार होगा। उन्होंने इस प्रतिमा की स्थापना के लिए एक मकान भी खरीद लिया है। इसे गिराकर यहां जल्दी ही एक पार्क बनाया जाएगा जिसमें प्रतिमा स्थापित की जाएगी। नगरपालिका ने प्रस्ताव पारित किया है कि कबीर लेन का नाम अब लॉली रोड कर दिया जाएगा।“