न्यूनतम आय गारंटी योजना की घोषणा से चुनाव-2019 परिदृश्य रोचक बना

आज की बात

आज कॉंग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने घोषणा की है कि यदि उनकी पार्टी सत्ता में आई तो देश में “मिनिमम इन्कम गारंटी” या न्यूनतम आय गारंटी योजना शुरू कर देगी। आपको याद होगा कि कॉंग्रेस ने अपने 2004 के चुनाव घोषणापत्र में राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना की घोषणा की थी और उसे इसका सीधे तौर पर लाभ भी हुआ था।

हो सकता है कि आज की इस घोषणा के पीछे राहुल गांधी की यही मंशा हो कि इस घोषणा से मोदी सरकार द्वारा फरवरी में पेश किए जाने वाले लोक-लुभावन बजट का सामना भी किया जा सकेगा और चुनाव में कॉंग्रेस पार्टी दमदार ढंग से उतर सकेगी।  

न्यूनतम आय गारंटी योजना का स्वरूप क्या होगा, कॉंग्रेस पार्टी के भीतर इस पर क्या मंथन हुआ है और ये किस रूप में लागू होगा, ये सब जानने के लिए पार्टी के घोषणापत्र की प्रतीक्षा करनी होगी। लेकिन उससे पहले इस अवधारणा पर जो जानकारी उपलब्ध है, उसके आधार पर हम कुछ बातें अपने पाठकों के सामने रखना चाहते हैं।

सबसे पहली बात तो ये कि “मिनिमम इंकम गारंटी” कोई नया ‘आइडिया’ या कोई नया विचार नहीं है बल्कि आईएमएफ़ (IMF) जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं काफी समय से ‘यूनिवर्सल बेसिक इन्कम” (यूबीआई-UBI) की पैरोकारी करती रही हैं जो “मिनिमम इंकम गारंटी” का ही दूसरा नाम कहा जा सकता है।

सबसे पहले ये जान लें कि जब आईएमएफ़ (IMF) जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इस पर ज़ोर देती हैं तो उनका इसके पीछे एक ही उद्देश्य होता है कि वो सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं को एक ही छतरी के नीचे लाकर उस पैसे को एक साथ ही लाभार्थी को दे देना चाहती हैं। इस तरह ये एक हाथ से लेकर दूसरे हाथ को देने जैसी बात होती है। इसमें गरीबों को कोई अतिरिक्त लाभ देने की बजाय ज़ोर इस बात पर होता है कि कल्याणकारी योजनाओं पर खर्चा जाने वाला पैसा ज़्यादा कुशल ढंग से बँट जाए और उसमें कोई सेंध ना लगे।

अब अगर कॉंग्रेस को सचमुच ईमानदारी से गरीबों के लिए एक न्यनतम आय सुनिश्चित करनी है तो उसे कम से कम ये दो चीज़ें सुनिश्चित करनी होंगी – पहली तो ये कि गरीबों के लिए यह आय अभी तक मिल रहे लाभों के अतिरिक्त होनी चाहिए ना कि उनके एवज में!

यह तभी संभव है जब सरकार दूसरी बात ये सुनिश्चित करे कि इस न्यूनतम आय को देने के लिए जो आर्थिक संसाधन जुटाये जाएँ, वो नए हों ताकि पहले से चल रही कल्याणकारी योजनाओं पर उनका कोई असर न पड़े। स्वाभाविक है कि इसके लिए सरकार को धनी लोगों पर नए कर लगाने होंगे जिनकी उनको पिछले दो-तीन दशकों से कम ही आदत रह गई है।

मुक्त बाज़ार के पैरोकार उपरोक्त व्यवस्था को आसानी से लागू नहीं होने देते क्यूंकि उनका मानना है कि यदि अमीरों पर नए करों का ‘बोझ’ डाला जाएगा तो देश में पूंजी निवेश को धक्का पहुंचेगा और उससे देश की आर्थिक प्रगति रूक जाएगी।

ऐसी स्थिति में ज़्यादा संभावना आपको किस बात की लग रही है? क्या कॉंग्रेस, जो स्वयम नरसिम्हा राव की अगुवाई में देश में मुक्त बाज़ार की नीतियाँ लाने में अगुआ रही है, कोरपोरेट सेक्टर के कड़े विरोध के बावजूद ऐसा कर पाएगी?

हम उपरोक्त प्रश्न का उत्तर हाँ में देना चाहते हैं क्यूंकि आजकल जिस राहुल गांधी को हम देख रहे हैं और जैसा कि उनके बारे में मित्रों से सुनने में आ रहा है, उसके अनुसार राहुल गांधी आजकल भारतीय समाज की ‘ग्रासरूट’ की समझ बढ़ाने के लिए लगातार समाजकर्मियों से संपर्क में रहते हैं और देश की समस्याओं को अब उनकी निगाह से भी देखते हैं।

इसके दो परिणाम संभावी हैं – पहला तो ये कि राहुल गांधी यदि उनकी सरकार आ जाती है तो वो मुक्त बाज़ार के पैरोकारों, मीडिया और धनी लोगों के कड़े विरोध के बावजूद भी ऐसी योजना लागू कर सकते हैं जिसको लागू करने के संसाधन अमीरों पर नए कर लगाकर जुटाये जाएँ। ये नए कर ‘वैल्थ टेक्स’ या संपत्ति कर के रूप में या फिर कोरपोरेट टेक्स बढ़ाकर और या मुनाफे या टर्नओवर पर टेक्स लगाकर जुटाये जा सकते हैं।

दूसरा परिणाम पहले से जुड़ा है। अर्थात यदि कोरपोरेट सैक्टर को आज की घोषणा से ये लगा कि राहुल गांधी इस बारे में गंभीर हैं तो हो सकता है कि वो चुनाव से पहले ये सुनिश्चित करने के लिए पूरा ज़ोर लगा सकते हैं कि राहुल सत्ता में ही ना आयें।

यदि इस बात में कुछ दम है तो राहुल गांधी ने निश्चित तौर पर ये घोषणा करके एक बड़ा जुआ खेला है। हालांकि ये भी हो सकता है कि कॉंग्रेस के पुराने घाघ नेता कोरपोरेट सैक्टर के दिग्गजों को ये समझाने के काम में लग जाएँ कि ये तो मोदी के 15 लाख की तरह एक जुमला है और इसे ‘सीरियस’ लेने की ज़रूरत नहीं है।

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का ये भी कहना है कि कोरपोरेट सैक्टर चाहता है कि सरकार तो एनडीए की बने किन्तु इस बार मोदी की बजाय नितिन गडकरी जैसे किसी ‘इंडस्ट्री-फ्रेंडली’ व्यक्ति के नेतृत्व में बने क्यूंकि मोदी को अंबानी और अडानी के ज़्यादा निकट समझा जा रहा है जिसमें कोरपोरेट सैक्टर एक बाकी दिग्गज उपेक्षित महसूस करते हैं।

जो भी हो, ये तो कहना होगा कि राफेल में भ्रष्टाचार के मुद्दे को ज़ोर-शोर से उठाने के बाद राहुल गांधी ने अब दूसरा ऐसा शगुफा छोड़ दिया है जो भाजपा से ना तो निगलते बनेगा और ना उगलते। चुनाव-2019 का परिदृश्य हर दिन रोचक होता जा रहा है।

…..विद्या भूषण अरोरा