अमलतास, गुलमोहर और गुलज़ार 

ओंकार केडिया*

ओंकार केडिया की कविताओं से आप पहले ही परिचित हैं। इस वेब पत्रिका में प्रकाशित उनकी अनेक कविताओं में से कुछ आप यहाँ, यहाँ,यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं। कविताओं के अलावा वह व्यंग्य भी लिखते हैं। हाल ही में उनकी व्यंग्य रचनाओं की पुस्तक ‘मल्टीप्लेक्सस में पॉपकॉर्न’ भी प्रकाशित हुई है जिसके पुस्तकांश आप उपरोक्त लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं। फेसबुक पर वह काफी सक्रिय हैं और वहाँ वह छोटे-छोटे चुटीले ‘लेख’ पोस्ट करते रहते हैं। ये पोस्ट्स  कभी व्यंग्य के रूप में होती हैं तो कभी हल्के-फुल्के हास्य को लिए होती हैं। अभी एक मुलाक़ात के दौरान उन्होंने दिल्ली की गर्मी पर बात करते समय अमलतास और गुलमोहर की चर्चा की तो हमने अनुरोध किया कि इन बातों को फेसबुक पर पोस्ट करने से  पहले हमारी वेब पत्रिका में प्रकाशन के लिए भेज दीजिए। उसी के प्रत्युत्तर में हमें यह रचना प्राप्त हुई। हर पाठक रचना पढ़ते समय अपनी रचना रचता है – उसी सिद्धांत के अनुसार आप स्वयं तय करें कि ये लेख है या व्यंग्य या फिर कोई कविता ही है। इसके कुछ हिस्से तो कविता लग ही सकते हैं। बहरहाल, रचना पढ़िए।

अमलतास, गुलमोहर और गुलज़ार 

इन दिनों दिल्ली दहक रही है। देर शाम तक लू चलती रहती है। घर से बाहर निकलना मुश्किल है। लोग थोड़ा-बहुत सुबह घूम लेते हैं। बस  यही उनकी आउटिंग है। जिसका भी काम घर में रहकर चल सकता है, वह घर में ही रहना चाहता है।

दिल्ली की गर्मी में कुछ अच्छा लगता है, तो गुलमोहर और अमलतास। ये दोनों गर्मियों में ख़ूब खिलते हैं। दिल्ली के हर कोने पर इनका क़ब्ज़ा है। जब गर्मी चरम पर होती  है, तो इनकी सुंदरता भी चरम पर होती है।

अमलतास और गुलमोहर फूल जितने सुन्दर हैं, इनके नाम भी उतने ही सुन्दर हैं। बड़े आधुनिक से नाम हैं इनके! चंपा, चमेली, गेंदा जैसे पुराने टाइप के नहीं। इनके नाम सुनते ही लगता है कि फूल भी सुंदर ही होंगे।

शेक्सपियर ने कहा था कि नाम  में क्या रखा है! उसने गुलमोहर  और अमलतास जैसे नाम सुने होते, तो शायद कभी ऐसा नहीं कहता।

दुष्यंत कुमार ने अपनी दो पंक्तियों में गुलमोहर पर क्या ख़ूब लिखा है-

‘जिएं तो अपने बग़ीचे में गुलमोहर के तले,

मरें तो ग़ैर की गलियों में गुलमोहर के लिए.’

मुझे आश्चर्य है कि इतने सुंदर नामों का इस्तेमाल हिंदी गानों में कुछ ख़ास नहीं हुआ। चंपा, चमेली, गेंदा, ग़ुलाब- सब हिंदी गानों में घुस आए, पर गुलमोहर और अमलतास चुपचाप बाहर खड़े रहे।

हालांकि गुलज़ार का एक पुराना गाना है जिसमें गुलमोहर को जगह मिल गई।

‘गुलमोहर गर तुम्हारा नाम होता,

मौसम-ए-गुल को हँसाना भी हमारा काम होता.’

मैं गुलज़ार का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ, पर मुझे लगता है कि काव्य की दृष्टि से यह बहुत कमज़ोर गाना है। विशुद्ध तुकबंदी लगता है। हो सकता है कि गुलज़ार को गाने की धुन पसंद नहीं आई हो और उन्होंने बेमन से धुन के मुताबिक कुछ बोल लिख दिए हों। यह भी हो सकता है कि संगीतकार को अगले दिन लम्बे समय के लिए विदेश जाना हो और गाना तुरंत रिकॉर्ड कराना ज़रूरी रहा हो। वैसे भी कोई गीतकार कितना ही अच्छा गीतकार क्यों न हो, कभी-न-कभी तो बुरा गाना लिखता ही है।

कहते हैं कि पहली बार जब यह गाना गुलमोहर ने सुना, तो उसके सारे फूल मुरझा गए। शुक्र है कि गुलज़ार ने ऐसा कोई गाना अमलतास के लिए नहीं लिखा। वह तो वैसे ही डर के मारे पीला पड़ा रहता है।

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*ओंकार केडिया पूर्व सिविल सेवा अधिकारी हैं। भारत सरकार में उच्च पदों पर पदासीन रहने के बाद आजकल वह असम रियल एस्टेट एपिलेट ट्राइब्यूनल के सदस्य हैं और गुवाहाटी में रह रहे हैं। वह अपने ब्लॉग http://betterurlife.blogspot.com/औरhttp://onkarkedia.blogspot.com/ पर वर्षों से कवितायें और ब्लॉग लिख रहे हैं। कुछ माह पूर्व इनका कविता संग्रह इंद्रधनुष आया है जो काफी चर्चित हुआ। अंग्रेजी में इनकी कविताओं का पहला संग्रह Daddy भी हाल ही में आया है।  कोरोना पर कविताओं का एक संग्रह प्रकाशाधीन है और अगले कुछ दिन में उसके आ जाने की उम्मीद है।

डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं और इस वैबसाइट का उनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। यह वैबसाइट लेख में व्यक्त विचारों/सूचनाओं की सच्चाई, तथ्यपरकता और व्यवहारिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।

1 COMMENT

  1. नमस्कार ओंकार जी
    ठीक कहा, अमलतास और गुलमोहर पर गीत क्यों नहीं लिखे गए ? शायद ये नाम साहित्यिक है या लोक में प्रचलित नहीं है या तुकबंदी में ठीक न जमते हो ? बहरहाल जो भी हो, उष्णता में ठंडी बौछारों का काम करते है.

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