विभिन्न संयोगों से भरा एक विश्वव्यापी जीवन – परमहंस योगानंद

परमहंस योगानन्द जी की जयंती (5 जनवरी) के अवसर पर विशेष लेख

*अलकेश त्यागी

विश्व व राष्ट्र से जुड़े व्यक्ति के जीवन के कुछ आश्चर्यजनक संयोग व्यक्ति के जीवन को तो अद्भुत बनाते ही हैं साथ ही उस व्यक्तित्व के विश्वव्यापी महत्व को भी रेखांकित करते हैं। ऐसे ही अद्भुत व्यक्तित्व के स्वामी और विश्व पर अपनी छाप छोड़ने वाले परमहंस योगानंदजी जिन्होंने भारत में 1917 में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना की थी, का जीवन आश्चर्यजनक संयोगों से भरा है। जन्म से लेकर देह त्याग करने तक उनका जीवन वृतांत ऐसे ऐसे संयोगों से भरा पड़ा है कि आश्चर्य होता है कि वह मात्र संयोग थे या फिर सुनियोजित घटनायें। कुछ ऐतिहासिक घटनाएं इसका प्रमाण हैं।

पहला संयोग परमहंस योगानंद जी के जन्म को लेकर ही है उनका जन्म 05 जनवरी 1893 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में रह रहे एक बंगाली परिवार में हुआ। उनका बचपन का नाम मुकुंद लाल घोष था। उसी वर्ष लगभग 9 महीने बाद सितंबर में स्वामी विवेकानंद के विश्व विख्यात भाषण ने, जो उन्होंने विश्व की धर्म संसद के मंच से शिकागो में दिया, भारतीय योग और मनीषा के प्रति विश्व भर में जिज्ञासा के बीज बो दिए।

इस सब के बीच एक संयोग घटित हुआ। एक 17 वर्ष का नवयुवक जो अपनी मां के साथ शिकागो की एक मुख्य सड़क पर जा रहा था,उसे 12 वर्ष पूर्व देखे गए प्रकाश जैसा प्रकाश दिखाई दिया। उस समय जब वह मात्र 5 वर्ष का था और खेलते हुए 15 फुट गहरे तालाब में गिर कर डूब रहा था तो डूबते बच्चे को उस प्रकाश में एक पुरुष की अभयदान देती मुस्कुराती आकृति दिखाई दी। और इसके साथ ही पानी के नीचे जाते हुए बच्चे को किसी तरह बचा लिया गया। यह घटना नेब्रास्का राज्य के एक छोटे शहर में घटी थी। बारह वर्ष बाद वैसा ही प्रकाश अब युवा हो चुके उस बच्चे की आंखों के आगे शिकागो की सड़क पर कौंध गया, और उसने उसी पुरुष को कुछ ही कदम की दूरी पर टहलते देखा जो एक सभागृह के दरवाजे में घुसकर अदृश्य हो गया। उसने चीखते हुए अपनी मां से कहा कि यह वही आदमी था जो मुझे डूबते समय दिखा था। मां बेटे ने सभागृह में पहुंच उस आदमी को मंच पर बैठे देखा तो पता चला कि वह भारत के स्वामी विवेकानंद थे। उनके ऐतिहासिक व्याख्यान के बाद वह युवा आगे जाकर उनसे मिला और मन ही मन सोच रहा था कि वह उसके गुरु बनेंगे।

लेकिन स्वामी विवेकानंद ने उसके मन की बात पढ़ ली और कहा “नहीं बेटा, मैं तुम्हारा गुरु नहीं हूं। तुम्हारे गुरु बाद में आएंगे। वह तुम्हें चांदी का गिलास देंगे।”

इस घटना के 32 वर्ष बाद 1925 में अब प्रौढ हो चले उस युवा को परमहंस योगानंद में अपने गुरु मिले। लेकिन ई ई डिकन्सन नाम के इस शिष्य के मन में स्वामी विवेकानंद के शब्द “वे तुम्हें चांदी का गिलास देंगे।” घूमते रहते । ग्यारह वर्ष बाद जब 1936 में परमहंस योगानंद एक वर्ष की भारत यात्रा से वापस अमेरिका लौटे और क्रिसमस पर अपने शिष्यों को भारत से लाए उपहार बांटे तब श्री डिकन्सन ने उस प्रकाश को अपने जीवन में तीसरी बार देखा और साथ ही चांदी के गिलास को भी जिसे स्वामी विवेकानंद ने तैतालिस वर्ष पहले ही देख लिया था।

यह घटना बताती है कि विश्व के रंगमंच पर बालक मुकुंद लाल घोष की भूमिका पहले ही लिखी जा चुकी थी।

दूसरा संयोग है बालक मुकुंद लाल घोष का सन्यास परंपरा में दीक्षित हो योगानंद बनना। वर्ष 1915 में स्नातक की उपाधि अर्जित करते ही जुलाई माह के एक गुरुवार को अपने गुरु स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरी द्वारा सन्यास शिक्षा पाकर वह योगानंद बन गए। उनका जीवन वृतांत बताता है कि उनके परम गुरुओं ने उन्हें पश्चिम में क्रिया योग के प्रचार प्रसार के लिए चुनकर स्वामी श्री युक्तेश्वर गिरि के पास भेजा था। और स्वामी विवेकानंद वाली उक्त घटना भी इसका समर्थन करती प्रतीत होती है।

वर्ष 1920 में योगानंद, अमेरिकन यूनिटेरियन एसोसिएशन के तत्वाधान में बोस्टन में होने वाले धार्मिक उदार वादियों के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व करने पहुंचे। उनके व्याख्यान ‘धर्म का विज्ञान’ ने पश्चिम को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने योगानंद जी को वापस ही नहीं आने दिया। जगह-जगह व्याख्यान देते देते उन्होंने 1925 में वहां एक संस्था सेल्फ – रियलाइजेशन फेलोशिप की स्थापना कर दी जो ईश्वर साक्षात्कार की वैज्ञानिक प्रणाली क्रियायोग के प्रचार प्रसार में आज भी लगी हुई है। पश्चिम में ‘योग के जनक’ कहलाने वाले परमहंस योगानंद के प्रयासों से ही योग शब्द ऑक्सफोर्ड शब्दकोश में शामिल हुआ और संयोग देखें ‘क्रिया योग’ के प्रचार प्रसार के लिए दीक्षित योगानंद के प्रयासों से शुरू हुए सफर का परिणाम, एक शताब्दी बाद वर्ष 2015 में विश्व मंच पर, 21 जून को पहले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में सामने आया।

तीसरा संयोग है। परमहंस योगानंद जी की आत्मकथा का प्रकाशन। वर्ष 1946 के अंत दिसंबर में ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी'(हिन्दी रूपांतर – योगी कथामृत) पुस्तक पहली बार प्रकाशित हुई। इसकी भविष्यवाणी योगानंद जी के परम गुरु लाहिडी महाशय बहुत पहले ही कर चुके थे। उन्होंने कहा था “पश्चिम में योग के प्रति गहरी रूचि पैदा होने के कारण मेरे देह त्याग के 50 वर्ष बाद मेरा एक जीवन चरित्र लिखा जाएगा। योग का संदेश सारे विश्व में फैल जाएगा।” संयोग देखिए 1895 में देह त्याग करने वाले लाहिड़ी महाशय के 1945 में 50 वर्ष पूरे होते ही यह पुस्तक पूरी हुई और वर्ष 1946 के अंत तक छप कर आई जिसमें लाहिडी महाशय को समर्पित एक अध्याय से पहली बार उनके बारे में आम आदमी को जानकारी मिली। इसी के साथ-साथ 1946 के चुनावी नतीजों ने भारत की स्वतंत्रता की मांग मजबूत कर दी। विश्व में स्वतंत्र भारत के उदय के साथ ही ‘ऑटो बायोग्राफी ऑफ योगी’ ने भारतीय योग और मनीषा को विश्व पटल पर पुनर्स्थापित कर दिया। इस वर्ष दोनों ही अपनी ही 75 वीं जयंती मना रहे हैं।

इसके अलावा अमेरिका पहुंचे योगानंद जिन मूल्यों की पश्चिमी सोच में स्थापना कर रहे थे,उन्हीं मूल्यों का प्रयोग भारत लौटे गाँधी जी पश्चिमी शासकों के विरुद्ध राजनीतिक हथियार के रूप में कर पाश्चात्य व पौर्वात्य सोच में सामंजस्य बनाने का प्रयास कर रहे थे।

स्वामी विवेकानंद जी द्वारा 11सितंबर 1893 को की गई भविष्य वाणी, वर्ष 1920 में परमहंस योगानंद के अमेरिका गमन के साथ ही भारत के प्रति बदलते ब्रिटिश रवैए, आधुनिक काल की उपनिषद ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’ का 1946 में प्रकाशन के साथ साथ स्वतंत्रता प्राप्ति, स्वतंत्र भारत के अमेरिका में नियुक्त पहले राजदूत श्री बिनयरंजन सेन के सम्मान में , 7 मार्च 1952 को लॉस एंजिल्स में आयोजित प्रीतिभोज के अवसर पर बोलने के बाद, वहीं मंच पर खड़े खड़े परमहंस योगानंद द्वारा महासमाधि और क्रियायोग के लिए योगानंद जी की 1915 में स्नातक उपाधि के साथ साथ सन्यास दीक्षा के ठीक एक शताब्दी बाद, 2015 में योग को विश्व मान्यता इस बात के पुष्ट प्रमाण है कि संयोग से भरे उनके जीवन की घटनाएं अनायास नहीं बल्कि आध्यात्मिक जगत द्वारा सुनियोजित थीं। ऐसी महान विभूति के जन्म दिवस पर उन्हें शत-शत नमन।

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*अलकेश भारतीय सूचना सेवा की भूतपूर्व अधिकारी हैं और आजकल स्वतंत्र लेखन करती हैं। उनका मानना है कि धर्म व अध्यात्म केवल विश्वास का नहीं बल्कि अभ्यास का भी विषय है। धर्म व अध्यात्म को भी विज्ञान की तरह पढ़ाई और प्रयास की कसौटी पर कसा जाना चाहिए ।

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