कितनी कामयाब होगी पीएम किसान योजना के तहत वोटों की खेती?

The Prime Minister, Shri Narendra Modi during the launch of the PMKISAN scheme, at Gorakhpur, in Uttar Pradesh on February 24, 2019. The Union Minister for Agriculture and Farmers Welfare, Shri Radha Mohan Singh is also seen.

पार्थिव कुमार*

भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं में प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना को लेकर जबर्दस्त उत्साह है। अगले आम चुनावों से कुछ महीने पहले लागू की गयी इस योजना के तहत देश के तकरीबन 12 करोड़ गरीब किसान परिवारों को हर साल छह हजार रुपये की आर्थिक सहायता मुहैया करायी जायेगी। घोर आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहे किसान लंबे अरसे से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार से काफी खफा हैं।

भाजपा को उम्मीद है कि 2000 रुपये की पहली किस्त अपने बैंक खातों में पहुंच जाने के बाद मोदी सरकार से इन किसानों की नाराजगी दूर हो जायेगी। अगर भाजपा इस योजना से किसानों का दिल जीत कर अगले चुनावों में उनके वोट ले पाती है तो निस्संदेह उसके लिये यह एक बड़ी कामयाबी होगी। लेकिन दीगर सवाल यह है कि यह योजना कृषि क्षेत्र के दीर्घकालिक संकट को दूर करने में किस हद तक मददगार साबित होगी।

खेतिहर मजदूर योजना में शामिल नहीं

गौरतलब है कि ग्रामीण भारत के निर्धनतम परिवार पीएम किसान योजना के लाभार्थियों में शामिल नहीं हैं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था के सबसे निचले पायदान पर वे खेतिहर मजदूर हैं जिनके पास अपनी कोई जमीन नहीं है। वे दूसरों के खेतों पर मजदूरी कर अपनी आजीविका चलाते हैं।

सरकार ने 2017 और 2018 में किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े मुहैया नहीं कराये हैं। लेकिन इससे पहले के आंकड़ों के मुताबिक 2016 में आत्महत्या करने वाले 11370 किसानों में 44 फीसदी से अधिक यानी कुल 5019 लोग खेतिहर मजदूर थे। वर्ष 2014 में 12360 किसानों ने आत्महत्या की थी जिनमें 54 फीसदी यानी 6710 खेतिहर मजदूर थे। इसी तरह 2015 में भी आत्महत्या करने वाले 12602 किसानों में से 36 फीसदी से अधिक यानी 4595 खेतिहर मजदूर थे। सरकारी सहायता की सबसे ज्यादा दरकार इसी ग्रामीण तबके को है।

मगर सालाना 75000 करोड़ रुपये के खर्च से चलायी जा रही पीएम किसान योजना में इस तबके को  शामिल करना मुनासिब नहीं समझा गया। यह योजना जमीन के मालिक उन किसानों के लिये है जिनके पास पांच एकड़ या इससे कम खेत हैं।

पैसा खेती-इतर जरूरतों पर खर्च होगा

पीएम किसान योजना के तहत सहायता का भुगतान 2000 रुपये की तीन किस्तों में किसानों के बैंक खातों में किया जायेगा। इस रकम के इस्तेमाल पर कोई शर्त नहीं है। लिहाजा इसे खेती से जुड़े कामकाज के बजाय निजी आवश्यकताओं को पूरा करने पर भी खर्च किया जा सकता है। चूंकि सालाना 6000 रुपये की पूरी रकम एकमुश्त और कृषि की आवश्यकता के समय नहीं दी जा रही इसलिये इसका इस्तेमाल अन्य जरूरतों पर होने की संभावना ही अधिक है। बेशक यह जरूरत जियो सिम के रिचार्ज की या टाटा स्काई का कनेक्शन लेकर अपनी जिंदगी को ‘जिंगालाला’ बनाने की ही क्यों नहीं हो।

प्रधानमंत्री ने 24 फरवरी को गोरखपुर में पीएम किसान योजना की शुरुआत करते हुए कहा, ‘‘मैं भी चुनावों से पहले कर्ज माफी की रेवड़ी बांट सकता था। यह कोई मुश्किल काम नहीं है मगर मैं इस पाप के बारे में नहीं सोच सकता। कर्ज माफी का फायदा बैंकों से ऋण लेने वाले मुट्ठी भर बड़े किसानों को ही मिलता है। अन्य स्रोतों से कर्ज लेने वाले करोड़ों गरीब किसानों को इसका कोई लाभ नहीं मिलता। पीएम किसान योजना इन करोड़ों किसानों को राहत पहुंचाने के अलावा ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिये निवेश का भी काम करेगी।  

श्री मोदी का यह बयान उनकी सरकार से एक अहम सवाल के जवाब की मांग करता है। सवाल यह कि कर्ज के लिये बैंकों तक किसानों की पहुंच बढ़ाने के वास्ते उनकी सरकार ने पिछले लगभग पांच बरसों के अपने शासन में क्या किया। आखिर क्यों अब भी लगभग 80 प्रतिशत किसानों को कर्ज की अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिये अनियंत्रित शोषण की बुनियाद पर टिके असंगठित क्षेत्र का मुंह देखना पड़ता है?

पीएम किसान योजना किसी भी तरह से खेती के लिये कर्ज लेने की किसानों की मजबूरी का अंत नहीं करती। इस योजना के लागू होने के बाद भी किसान बीज, खाद, कीटनाशक और खेती के अन्य साजोसामान के लिये ऋण पर निर्भर होंगे। कृषि ऋण के लिये उन्हें फिर उसी असंगठित क्षेत्र के पास जाना होगा जिसके चंगुल से निकल पाना उनके लिये मुश्किल है। क्या यह  अच्छा नहीं होता कि ऋण के लिये असंगठित क्षेत्र पर किसानों की निर्भरता घटाने के ठोस प्रयास किये जाते ताकि वे महाजनों, आढ़तियों और व्यापारियों के इस जाल से बच सकें?

कर्ज़ माफी और नकद सहायता में क्या बेहतर

बेशक नकद सहायता और कर्ज माफी दोनों ही कृषि के संकट को घटाने के नकारात्मक प्रयास हैं। आप किसी भी आर्थिक सहायता को खर्च पर कोई निगरानी लगाये बिना लंबे समय तक जारी नहीं रख सकते। इसी तरह कर्ज माफी पर होने वाले विशाल खर्च को साल-दर-साल जारी रखना भी मुमकिन नहीं है। मगर इन दोनों में एक बड़ा फर्क है। उपज खराब होने या उसकी वाजिब कीमत नहीं मिलने की दशा में कर्ज माफी किसानों को अगली फसल के लिये ऋण लेने में सक्षम बनाती है ताकि वे पिछले नुकसान से उबर सकें। दूसरी ओर पीएम किसान योजना जैसी नकद सहायता योजनाएं कृषि को लाभकारी बनाने में कोई प्रत्यक्ष योगदान नहीं करतीं।

प्रधानमंत्री की दलील के हिसाब से सोचें तो सरकार को फसलों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित करने की भी कोई जरूरत नहीं है। खाद्य फसलों के पुनर्गठन पर एक सरकारी समिति की रिपोर्ट के अनुसार देश में सिर्फ छह फीसदी किसान अपनी फसलों को एमएसपी पर बेच पाते हैं। बाकी 94 फीसदी किसानों में से एक बड़ी तादाद को खेती की लागत के बराबर भी कीमत नहीं मिल पाती। मंडियों में खास तौर पर छोटे और सीमांत किसानों के साथ की जा रही ठगी से सरकार भी भली-भांति वाकिफ है। ऐसे में एमएसपी को फसल की लागत से डेढ़ गुना किये जाने पर सरकार का अपनी पीठ थपथपाना कहां तक वाजिब है?

सरकार की ओर से गांवों में नकदी पहुंचाया जाना अच्छी बात है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में कुछ हद तक जीवंतता आयेगी। लेकिन हमें समझना होगा कि पीएम किसान योजना जैसी नकदी हस्तांतरण योजनाओं का लाभ बेहद सीमित है। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के लिये इससे काफी आगे बढ़ कर एक बहु-आयामी नीति अपनाने की दरकार है।

इस नीति का मकसद कृषि उत्पादकता और उत्पादन को बढ़ाना, खेती की लागत को घटाना तथा किसानों को उपज की वाजिब कीमत मुहैया कराना होना चाहिये। बागवानी, पशुपालन और हस्तशिल्प जैसी वैकल्पिक आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मददगार साबित होगा। कृषि में लगी अतिरिक्त श्रम शक्ति को खेती से उद्योगों की ओर ले जाना भी वक्त की जरूरत है।

किसानों को बीज, खाद, कीटनाशक, बिजली, पानी और खेती के अन्य साधनों पर रियायत देने से उपज की लागत में कमी आती है। इससे उत्पादन और उत्पादकता बढ़ने के अलावा किसानों की आमदनी में भी इजाफा होता है। कृषि उत्पाद विपणन समितियों (एपीएमसी) के कामकाज में सुधार कर किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य सुनिश्चित करना भी जरूरी है। कृषोन्नति योजना के तहत चलाये जा रहे विभिन्न कार्यक्रमों और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जैसे उपायों को ईमानदारी से लागू किया जाता तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को पीएम किसान सम्मान और कर्ज माफी जैसे कदमों की जरूरत ही नहीं पड़ती।

क्या नगद सहायता से सम्मान बढ़ेगा?

प्रधानमंत्री का यह कहना भी गले नहीं उतरता की पीएम किसान योजना के धन से गरीब किसानों का ग्रामीण समाज में सम्मान बढ़ेगा। समाज में सम्मान सरकारी आर्थिक सहायता से नहीं बल्कि हाथों को रोजगार मिलने से बढ़ता है। इस लिहाज से राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को अधिक विस्तार देना ज्यादा उपयोगी साबित हो सकता है। यह योजना ग्रामीणों को रोजगार और धन मुहैया कराने के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में ढांचागत सुविधाओं के विस्तार में भी बहुत सहायक साबित हुई है।

यह कहना भी अतिश्योक्ति है कि धन लाभार्थियों के खातों में भेजे जाने की वजह से पीएम किसान योजना में गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं होगी। राज्य सरकारें इस योजना के लिये लाभार्थियों की पहचान उनकी स्वघोषणा के आधार पर करेंगी। लाभार्थी के गांव में निवास नहीं करने की स्थिति में यह घोषणा परिवार का कोई भी दूसरा बालिग सदस्य कर सकेगा। ज्यादातर राज्यों में भूमि रिकार्डों के व्यवस्थित नहीं होने के कारण स्वघोषणा पर आधारित प्रमाणन की यह व्यवस्था भ्रष्टाचार के लिये असीमित संभावनाएं पैदा करती है।

क्या मिलेगा भाजपा को इसका लाभ?

और अब आखिरी सवाल। भाजपा को आने वाले आम चुनावों में पीएम किसान योजना का कितना लाभ मिल सकेगा? खास कर वैसी हालत में जब यह योजना ग्रामीण समाज में विभाजन का एक नया आधार मुहैया कराती है।

इस विभाजन में एक तरफ वे किसान होंगे जिन्हें पांच एकड़ से ज्यादा खेती योग्य जमीन का मालिक होने के कारण योजना का लाभ नहीं मिल सकेगा। दूसरी ओर वे छोटे किसान होंगे जो इस योजना के तहत मासिक 500 रुपये की सहायता पा सकेंगे। इन दोनों से अलग खेतिहर मजदूरों का एक तबका भी होगा जिसे सबसे ज्यादा गरीब होने के बावजूद इस योजना का फायदा नहीं मिल सकेगा। कुछ मामले ऐसे भी हो सकते हैं जिनमें खेत मालिक तो गरीबों के नाम पर चलायी जा रही इस योजना का लाभ लेगा मगर उसकी जमीन पर खेती करने वाला गरीब इससे वंचित रहेगा।

 ऐसी जटिल सामाजिक-आर्थिक स्थिति में पीएम किसान योजना के तहत वोटों की खेती लाभ का सौदा होगी या नहीं यह सिर्फ वक्त ही बता सकता है।

*पार्थिव लंबे समय तक यूएनआई से जुड़े रहने के बाद अब स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं।  

ईमेलः kr.parthiv@gmail.com

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