मृग-तृष्णा का दानव

क्या खूँटी पर लटके दिन देखे तुमने

या फिर बिस्तर पर लेटी रातें

करवटें बदलते पहर और घंटे

या फिर तुमने देखे 

दर्द से कराहाते पल?

इतना सब नहीं भी दिखा तो

ज़रूर नज़र में आईं होगी

खून से सनी वो चांदनी रातें

जब दो फिकरों के लोग टकराए होंगे

बेजुबान तलवारों के साथ

उस तंग गली में जिसके मुहाने पर

बरगद के बूढ़े पेड़ तले

हज़ारों प्रेम – कहानियां पत्तों की तरह बिखरीं हैं!

देखा नहीं तो सुना होगा तुमने

तलवारों के टकराने का शोर

और घनी काली आँधियों में

बेतहाशा भागतीं उन पत्तियों की सरसराहट

जो असंख्यों प्रेम कहानियों को

अपने कमजोर कन्धों पर लादे

अनजान राहों पर भटकने को मजबूर थीं !

अगर तुम वो हो जो

कुछ देखना-सुनना नहीं चाहते तो

फिर अपनी आशंकित आँखों से टकटकी लगाकर

इंतज़ार करना उस रात का

जब कोई मृग-मरीचिका

अपना नकली लिबास उतारकर

तुम्हारे गले तक आ पहुंचे और

तब तुम

जो आज कुछ देखना-सुनना नहीं चाहते 

चीख-चीख कर उसे अपनी बेगुनाही बयाँ करो !

वो नीला-लाल चाँद जिसे तुम

अपने सबसे ऊँचे चौबारे पर चढ़कर देखते थे 

उस रात चुप ही रहेगा और

मृग-तृष्णा का दानव

हम सब पर अपना दांव चला चुका होगा !

विद्या भूषण अरोरा