मरुभूमि की कविताएं – अजंता देव* की कविता शृंखला

आश्चर्य होता है कि कविता अपना रस, अपना पोषण कहाँ-कहाँ से ढूँढ निकालती है। कवि की नज़र अनछुई, अनजानी जगहों में जैसे बेखौफ घुस जाती है और लगभग एक जासूस की तरह कोने में दुबकी महत्वहीन और साधारण लगने वाली चीज़ों को भी देखने-परखने की ताक़त रखती है। अजन्ता देव की यह कविता शृंखला बिल्कुल यही काम करती है। तीन हज़ार वर्ष पहले की तमिल संगम कविता के अनूठे शिल्प को आज की संवेदना से जोड़ कर एक माया सी रचती हैं ये कविताएँ। अपने बिम्बों में ये रेगिस्तान की कविताएं हैं  क्योंकि अजन्ता राजस्थान की हैं और  गहरे में ये भारतीय स्त्री मन की कथा है, जो हज़ारों साल से दुख और वेदना की एक कड़ी सी जोड़ती है। यह कविताएँ विरह से एक संवाद करती हैं।

सोनमाछरी जैसी कौंधती रेत पर

आना चुपचाप
मेरे पाजेब खो दूंगी एक दिन पहले
पानी लेने जाऊँगी तब
किवाड़ों  की जोड़ पे चुपड़ दूंगी कड़वा तेल
माचे की तनी कस दूंगी आज
जूती और लाठी कब से डूबे हैं तेल में
आज धूप में छोड़ना है
बंशीधर पंचांग में अगली अमावस को घेर दिया है काजल की तीली से
तुमने भी वो ही घेरा है ना ,जाँच लो
ऊँट के खुर बाँध के आना
वो खोजेंगे पार देस
अपन निकल जायेंगे लखपत की ओर
वैसे भी किसे पड़ी है मेरी
सोने की बिस्कुट तो ना है
कि कोई इतनी मेहनत करेगा तस्करी पे
सोचेंगे बापू और हाथ से रेत झाड़ के छाछ पी लेंगे दो गिलास ।
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चिट्ठी,जो लड़की ने प्रेमी के लिए सहेली को लिखवाई 

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ऊँट सवार निकलता है काळी ए कलायन गाता
उसे लगता है वह  अब नहीं रहा बालक
पर जब ब्याह कर आई थी मैं
इसके दूधदाँत भी ना गिरे थे
किस देस में आ पड़ी
जहाँ गधे को भी साँड का मुग़ालता
जहाँ टींगर भी मर्द
पर बूढ़ी  भी छोरी
“रहना नई देस बिराना है “
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तंग आई वृद्धा ने कपाल पीट कर उलाहना दिया, जिसे अचरज से युवा स्त्री ने सुना

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अगर फूल सा ही हो मेरा जीवन
जैसा आशीर्वाद मिलता रहा बरसों
फिर होगा ज़रूर ही बबूल का
छोटा, पीला और काँटो भरा
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जैसा युवती ने बूढ़ी स्त्री का पाँव छूकर सोचा, फिर सहेली को बताया ।

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इस गाँव के अलावा
दूर दूर तक पानी पड़ा है
हुसनसर की बावड़ी लबालब है
ठंडी भीगी बायरिया मधरी मधरी चल रही है
क्या दोष पड़ा है कुंडली में
यहां से बिन बरसे फनफना के निकलते जाते हैं बादल
तू समझ रही है मेरा मतलब
तेरी ससुराल में तो सावन ही सावन है
पूछेगी ना बादल से अबके जब घटा लूमेगी ?
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युवती  ने सहेली से दुःख कहा ,जो प्रेमी के मित्र ने सुना

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मत रोक जाने वाले को
और रोकना मत आने वाले को
खेजड़ी ख़ाली नहीं हो जाती सांगरी उतारने से
अगले मौसम में फिर लग जाती हैं फलियाँ
तू तो पेड़ पूजती है
देखा ही होगा ये ब्यौपार हर साल ।
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जैसा सहेली ने उदास सखी को समझाया ।

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दूध का दही जमाती है रात भर
सवेरे मथ कर बिलोती है मक्खन  आने तक
तुम्हारे घर तो मवेशियों की रेवड़ है
जानते ही हो
घी तो रखा जाएगा मर्तबान में
पर छाछ तो ताज़ी ही पी जाती है दोस्त ।
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प्रेमी को मित्र की सलाह, जो सहेली ने सुनी ।

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उससे प्रेम करने का उपाय था मेरे पास
ठौर मर जाना
फिर जन्म लेना उसकी गली में
मगर प्रेम ने ही रोक लिया प्रेम करने से ।
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जैसा कहा एक प्रौढ़ा ने अपनी सहेली को एक युवा घुड़सवार को देख कर ।

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रेत पर ऊँट की तरह दौड़ गया मेरा प्रेमी
छल  छल पानी की ओर
मेरा बादला अभी आधा भरा था
मैंने उसे ढुलका दिया फोग की जड़ों में ।
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त्याग दी गई स्त्री की सहेली ने प्रेमी को  जो संदेश दिया ।

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अजन्ता देव हिन्दी कविता जगत की एक सुपरिचित नाम हैं। लगभग चालीस वर्षों से लगातार लिख रहीं हैं । उनके चार कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं – राख का किला, एक नगरवधू की आत्मकथा, घोड़े की आँख में आँसू और बेतरतीब। अभी कविता शृंखलाओं पर काम कर रहीं हैं।

7 COMMENTS

  1. स्वागत , अजंता जी। आप शब्दों को छूती हैं, तो वे जागृत बिम्ब बन जाते हैं।

  2. स्त्रीयों के मन का ,स्थिति अनुरूप अद्भुत चित्रण

  3. ओस से भीगी सुबह की रेत जैसी कविताएं!

  4. परंपराओं और जीवन की सच्चाईयों को अपना लेती स्त्री के अंतर्मन के भारी, कड़ुए, दर्द भरे और मीठे भावों का मार्मिक चित्रण!

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