बेसुरे नक्कारखाने में उम्मीद की तूती की आवाज़

राजेन्द्र भट्ट

लगता है कि हम इस समय एक बड़े नक्कारखाने में हैं जिसमें, सीधे-सीधे कहें तो ‘पोस्ट-ट्रुथ’ का शोर, धोंस-पट्टी और बेसुरापन है। सोशल मीडिया ने सम्पादकीय संस्था तथा तथ्यों की पड़ताल के फिल्टर खत्म कर दिए हैं और अध्ययन, शोध, प्राथमिक-प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर पूर्वाग्रह-मुक्त विश्लेषण, लोकतान्त्रिक उदार विमर्श को गैर-ज़रूरी, बल्कि अक्सर देश-समाज विरोधी करार कर दिया है।

        इस शोर में तथ्यों में मिलावट और झूठ के नए नरेटिव हैं; चिल्लाहट और आतंक है; विवेक की और वंचित आवाज़ों के खिलाफ निर्ममता है और  हूण- मंगोल कबीलों की विद्या-विरोधी हीन भावना उन्मादी नारों में व्यक्त हो रही है। यह नक्कारखाना ‘टोन-डेफ़’ है – सड़कों पर शादी-बारातों और डीजे के फूहड़ ‘संगीत’ की तरह। इसमें कोई भी सुकून भरी, मधुर, समझदारी की आवाज़ नहीं है। कौन सुन पाएगा इस उन्मादी और प्रायोजित शोर में अपनी आवाज़?

          तो फिर क्या किया जाए? इसलिए अपनी विनम्र समझ में जो वैज्ञानिक, विवेकपूर्ण, उदार, जनमुखी, अतीत से भविष्य को बेहतर मानने वाली तूती है – सुर में है – उसे तो बजा ही सकते हैं। नक्कारखाने का शोर तूती की आवाज़ को दबा देगा पर जीवन कर्म है तो जड़ता-निष्क्रियता, हताशा, आत्महत्या विकल्प नहीं है। हो सकता है, अपनी तूती कुछ और बज रही तूतियों को ताकत दे – उनसे ताकत ले। यों ही सुर-विवेक की तूतियों की आवाज़ें जुड़ जाएँ, फिर सुनाई भी दें, प्रभावी हो जाएं।

      और फिर बेसुरे भी आखिर कब तक धींगा-मस्ती कर सकते हैं? कान फोड़ सकते हैं? आखिरकार, जब संगीत की स्वस्थ, मधुर धुनें प्रभावी हो जाएंगी तो अभागे बेसुरों को सुनेगा भी कौन? उनके बेसुरेपन का चरम ही तो उनके यशहीन अंत का संकेत है। अपनी तो परंपरा ही ‘सत्यमेव जयते नानृतं’ की है – सत्य, विवेक, मानवता जीतेगी- यही विश्वास तो जीवन है। और जैसा पहले भी कहा – जीवन ही तो विकल्प है, आत्महत्या नहीं।

    अपनी तूती बजाने के कुछ नियम, कुछ ‘कार्डिनल प्रिंसिपल्स’ तय कर लेते हैं। एक तो, नक्कारखाने के अपढ़ बेसुरों ने चीख-चीख कर एक आधारहीन नरेटिव बुन दिया है कि पढे-लिखे तूती वाले ‘भारतीय संस्कृति और परंपरा’ के खिलाफ हैं, उसे जानते-मानते नहीं। असल में पढे-लिखों से उनकी हीन भावना इतनी कलपती है कि वे ‘हार्वर्ड’ जैसे सम्मानित संस्थान को ‘हार्ड वर्क’ जैसी सतही तुकबंदी से खारिज कर, अपनी वाक-कला पर अपनी ही पीठ ठोंक लेते हैं।

         इस दुष्प्रचार से निबटने के लिए, हम अपनी तूती की आवाज़ में, अपने देश-समाज की परम्पराओं, ग्रन्थों, उनके उदात्त अर्थों को ज्यादा से ज्यादा शामिल करें। चूंकि यह हमारे इको-सिस्टम, संस्कारों, सुपर-स्ट्रक्चर का हिस्सा हैं , इसलिए इनके आधार पर हम ज्यादा आत्मविश्वास और मजबूती के साथ अपनी बात कह सकेंगे। हमें निराला की ‘राम की शक्ति-पूजा’ की तरह ‘शक्ति की मौलिक कल्पना’ करनी होगी। बताना होगा कि गहन मानवीय अर्थों वाले हमारे ग्रन्थों को बिना पढ़े लाल कपड़े में बांध कर धूप-बत्ती दिखा कर हिंसा के प्रतीकों का अमानवीय, उग्र प्रदर्शन भारतीय संस्कृति  नहीं है; उनमें तो सदियों के समग्र अनुभव की मानवीय, भविष्य-मुखी, सहृदय परंपरा है। इसी परंपरा के उदाहरणों को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत कर छिछोरे झूठों का सबल  प्रतिकार  कर सकेंगे।

       दूसरे,  नक्कारखाने के ‘आर्केस्ट्रा’ के शातिर सूत्रधार ‘व्हाट्सप’ झूठों के जरिए प्राचीन ग्रन्थों, इतिहास के तथ्यों का हवाला देकर गलत-सलत ‘मैनुफेक्चर’ करते हैं, तोड़-मरोड़ कर तथ्य-उद्धरण परोसते हैं। ऐसे मामलों का प्रतिकार करते हुए , हमारे पढे-लिखे विवेकवान साथियों को मूल और अन्य प्रामाणिक स्रोतों से सही तथ्य पेश करने चाहिए ताकि धूर्त-अपढ़ कुचक्रों का पर्दाफाश हो सके। साथ ही, हम जब कोई तथ्य अपने लेखन में रखें तो हमेशा उनके साथ मूल, प्रामाणिक स्रोत भी देने की कोशिश करें, ऐसी आदत बना लें।   ताकि ‘पब्लिक स्पेस’ में शालीन -गंभीर शोध की परंपरा  मजबूत  हो और उन्माद-अज्ञान-दुष्प्रचार के कचरे से उपजी  व्हाट्सअप-स्रोत परंपरा  ध्वस्त हो सके।

        जहां अपनी क्षमता से  यह पूरी तरह संभव न हो सके पर तथ्यों को कहीं पढ़ा-सुना हो और उनकी  सचाई के प्रति मन में ईमानदार यकीन हो,  वहाँ इस बात को विनम्रता से स्वीकार करते हुए साथियों/ पाठकों-श्रोताओं से आग्रह करें कि प्रामाणिक स्रोत जुटाने  में मदद करें। अगर कभी अपने तथ्य-निष्कर्ष  गलत लगें तो तुरंत विनम्रता से स्वीकार करें। अगर हम, आजकल  उठाए जा रहे विभिन्न मुद्दों से जुड़े  प्राथमिक, प्रामाणिक संदर्भों  का लगातार ‘पूल’ बनाते चलें; साथ ही मित्रों के जिन लेखों को ऐसे सच्चे संदर्भों से पुष्ट करने की ज़रूरत हो, उनके लेखों के ‘सीक्वल’ के तौर पर ऐसे संदर्भ प्रस्तुत कर दें, तो  तूतियों के इस ‘मल्टिपल-वे-ट्रैफिक’ से जो बात उठेगी, वह दूर तलक जाएगी।

       आम जन को भी यह बुनियादी बात समझानी पढ़ेगी कि हमारे पवित्र माने जाने वाले ग्रन्थों-परम्पराओं  का सबसे बड़ा अपमान, ईश-निंदा ( ब्लेस्फेमी) तो यह है इन शब्दों-श्लोकों-परम्पराओं को गलत-सलत, तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है। दरअसल, पवित्र माने जाने वाले ग्रन्थों  को ‘अपवित्र’ करने का ‘महापाप’ तो ऐसे लोग ही कर रहे हैं। ये भी बताना पढ़ेगा कि हमारी उदात्त, उदार परम्पराओं को संकीर्ण बनाना भी तो  ओछा काम है।

      तीसरे, आजकल दूसरे पंथों-संप्रदायों के पिछड़ेपन, अनुदारता और स्त्रियॉं के प्रति ‘अन्याय’ को लेकर अपना ‘अनपढ़’ समुदाय ज्यादा रिसर्च कर रहा है और द्रवित हो रहा है ! अपने घर को न देखते हुए, ‘पराए’ घरों को ‘ठीक कर देने’ में जुटा है। जाहिर है, इसके पीछे असली मंशा दूसरे समुदायों के वंचितों के हित की  ‘महान भावना’ नहीं, उन्हें डराने-धमकाने, उनके खिलाफ दुष्प्रचार, उनके ‘वोट तोड़ना’ और कुल मिला कर समाज में हिंसा और वैमनस्य का जहर घोलना है।

        ‘हम’ और ‘वे’ के विमर्श से लैस, हाथों में पेट्रोल वाली मशालें लिए, शातिर नेताओं के निर्देश में, अहमक़-उन्मादियों को हम इस समग्र-समावेशी देश को नष्ट नहीं करने  दे सकते। इसलिए हर समुदाय के समझदार लोग, अपने-अपने समुदाय की कमजोरियों को एड्रेस करें, अपने वंचित वर्गों को शोषण-मुक्त करें। इस प्रयास को बल तभी मिलेगा जब हर समुदाय, जाति, पंथ अपनी-अपनी सब्जेक्टीविटी, तंगदिली से ऊपर उठे – अपने-अपने समाजों को विवेक-वैज्ञानिकता-प्रगतिशीलता की दिशा में ले जाए।

       ज़्यादा स्पष्ट शब्दों में, अपने-अपने समुदायों की विकृतियों, अविवेक और पिछड़ेपन को दूर करने में लगा हर मुसलमान, ईसाई या बौद्ध हर प्रगतिशील हिन्दू की लड़ाई को आगे बढ़ाता है। दूसरी ओर, एक तबके की संकीर्णता, दूसरे तबके की संकीर्णता को – खुद नहीं सुधरने का, दूसरे तबके से घृणा करने का – कुतर्क प्रदान करती है। इसलिए हर धर्म-जाति-पंथ-विचार से जुड़ी तूतियों को, अपने-अपने दायरों में, उदारता, आधुनिकता और विवेक लाना है। तभी तो ‘हम’ और ‘वे’ – ‘हम भारत के लोग’ बनेंगे।

       और अंत में, ‘आत्महत्या नहीं, कर्म ही विकल्प है’ के पक्ष में  अपनी ही परंपरा से, संदर्भ सहित एक प्रसंग प्रस्तुत करते हुए, इस आलेख को विराम देते हैं।

   गीता के तीसरे अध्याय – कर्मयोग में यह प्रसंग है और अनुवाद भी किसी ‘बिगड़े पाश्चात्य- शिक्षित  षड्यंत्रकारी’ का  नहीं, घर-घर में विराजी गीताप्रेस की पोथी का है जिसका सारांश यहाँ प्रस्तुत है –   

      कर्तव्य से जी चुराता अर्जुन युद्ध का कर्म नहीं करना चाहता । कृष्ण (श्लोक 16 से 26) अर्जुन को प्रेरित करते हैं कि अपना कोई स्वार्थ न होते हुए भी ज्ञानीजन बिना किसी आसक्ति के कर्म करते हैं क्योंकि श्रेष्ठ जनों के कार्यों  का  ही समाज के बाकी लोग अनुसरण करते हैं। स्वयं भगवान भी कर्म से जुडते हैं जबकि उनके लिए न कोई कर्तव्य है, न उन्हें कुछ हासिल करना है। इसलिए कि उनके निष्क्रिय हो जाने से, अनुसरण में सारी सृष्टि निष्क्रिय हो कर नष्ट हो जाएगी और वह अपनी ही सृष्टि के हत्यारे बन जाएंगे।

    यानि भगवान भी कह रहे हैं कि निष्क्रियता विकल्प नहीं है, स्वयं उनके लिए भी नहीं। यह उदात्त संदेश उस भगवद्गीता का है जो भारतीय होने के नाते हमारे सामूहिक भावनात्मक अस्तित्व का हिस्सा है। हाँ, बिना पढ़े केवल लाल कपड़े में अगर बंद रखेंगे तो सांस्कृतिक उदात्तता से वंचित हो जाएंगे और खतरा ये भी है कि उसी लाल-गेरुए का पटका सिर पर बांध कर – भगवान के नाम पर, दंगा कराने वालों के चक्कर में भी फंस सकते हैं।

       इसलिए – संकीर्णता से बचें; उदार, उदात्त बने रहें। सक्रिय और आशाओं से हरे-भरे रहें। यही तो हमारी परंपरा है, यही ‘धर्म’ है। 

लंबे समय तक सम्पादन और जन-संचार से जुड़े रहे राजेन्द्र भट्ट अब स्वतंत्र लेखन करते हैं।

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