सबको सम्मान से निशुल्क शिक्षा – प्राथमिक शिक्षा पर दूसरी किश्त

राजेन्द्र भट्ट*

प्राथमिक शिक्षा पर राजेंद्र भट्ट के पिछले लेख ने कई महत्वपूर्ण प्रश्नों को उठाया और जवाब तलाशने की कोशिश भी की। इस विषय पर उनका चिंतन-मनन जारी है। प्रस्तुत लेख में उन्होंने कई प्रश्नों को छुआ है। कहीं-कहीं प्रश्नों में ही जवाब भी निहित हैं। हम चाहते हैं कि राजेन्द्र तो इस विषय पर बिना थके लिखते ही रहें, यदि कोई और मित्र भी इस चर्चा में शामिल होना चाहें तो उनका स्वागत है – कमेंट सेक्शन में भी लिख सकते हैं और यदि कुछ ज़्यादा कहना है तो लेख की शक्ल में भी।

सबको सम्मान से निशुल्क शिक्षा

मिल कर ढाक-ढोल बजाने, कमल-दल देखने से ही मिलकर गोल भी कर पाओगे – ऐसी ही प्राथमिक शिक्षा बेहतर समाज बनाने वाली बच्चों को तैयार कर पाएगी। शिक्षा के उलझे मुद्दों की ऊन का एक धागा हमने पिछले लेख में खोलने की कोशिश की।

ऐसी शिक्षा जब मातृभाषा में दी जाती है तो अपनेपन की, उदारता और उल्लास की, जन-मन की उम्मीदों-उदासियों-टीसों-अपेक्षाओं का पूरा विस्तार खोल देती है। यहीं से बच्चे (बच्चे का मतलब हर हाल में बच्चियाँ भी है, जिनका सम्मान किए बिना बच्चा अधूरा ही रहेगा) की इतिहास, भूगोल, विज्ञान,गणित – और  वैज्ञानिक मनोवृत्ति तथा कलात्मक कल्पना के  सुंदर संयोग की राह खुलती है। विस्तार में न जा कर, अगर प्रतिनिधि प्रतीकों में बात करें तो आशीर्वाद की इसी भाषा के एक छोर पर भरतनाट्यम है तो दूसरे में गिद्दा-भांगड़ा; एक में लोक तो दूसरे में वेद; एक क्लासिक, दूसरा लोक; एक भौतिकी, दूसरा साहित्य और ललित कला। भविष्य का कितना सुंदर सपना – कि नज़र न  लग जाए। ( बल्कि लग ही तो गई है!)

लेकिन, जैसा कहा था, शिक्षा की ऊन के धागों में – जरा ध्यान भटका तो गांठ पड़ जाती है। मेरे ऊन में भी संशय-अनिश्चय की गांठ पड़ गई है।

मुझे ख्याल आया कि मैं शिक्षा की दुनिया में कदम तो हिन्दी का हाथ थामे चल रहा था, लेकिन मेरी मां – मेरी ‘मातृभाषा’ तो कुमाऊँनी थी। (बल्कि कुमाऊँनी तो ‘मातृभाषा’ जैसे संस्कृत-आच्छादित शब्द के बजाय, सीधे माँ की गोद और मां के दूध जैसी मेरी ‘दुधबोली’ थी। ( क्या इस शब्द की व्याख्या की ज़रूरत है? क्या व्याख्या संभव भी है?) तो मुझे तो शिक्षा के संसार का पहला परिचय कुमाऊँनी से मिलना चाहिए था।

अब इस धागे को सुलझाता हूँ। दरअसल, ‘दुधबोली’ कुमाऊँनी के परिवेश में – आज से पचास साल पहले ‘फर-फर’ हिन्दी बोलना उतनी ही शान की बात थी, जैसा आज हिन्दी के परिवेश में– बिना मातृभाषा माँ का दूध पिए, ‘फर-फर’ अंग्रेजी बोलना- यहाँ तक कि अंग्रेजी की एकदम चकाचक  गालियां बोल लेना है। और जैसे, आज भी हिन्दी को लेकर साधन-सम्पन्न, नेता लोग भावुक हो जाते हैं, हम कुमाऊँनी को देख कर हो जाते हैं। हम चाहते हैं कि कुमाऊँनी को लेकर आंदोलन हों, युवा-जन त्याग-बलिदान करें, कुमाऊँ में रहें, उस पर गर्व करें, हो सके तो लड़ मरें  – ताकि अपनी संस्कृति-भाषा-परंपरा बनी रहे। लेकिन खुद मैंने ऐसा नहीं किया।

बचपन में, मेरी विपन्न, झेंपू ‘दुधबोली’ की तुलना में,  हिन्दी मेरे लिए आत्मविश्वास, संभ्रांतता  और अवसरों  की -आगे निकलने की भाषा थी। मेरे पिता लंबे समय तक ‘देश’ ( मैदानी इलाके ) में ठीक-ठाक स्थितियों में रहे थे, इसलिए मेरी हिन्दी, साथी ‘पहाड़ियों’ की तुलना में ‘फ़्लालेस’ (दोषरहित) थी।

विस्तार में जाए बिना, आप मेरा मंतव्य समझ रह होंगे कि मातृभाषा के ज़रिए आप अपने परिवेश-परंपरा से जुडते हैं, उससे ‘एमपैथी’ रख पाते हैं। लेकिन क्या जब समाज का एक वर्ग-जाति ‘अवसरों की (बेशक, सामाजिक विषमता की भी)  भाषा अंग्रेजी को प्राथमिक शिक्षा, बल्कि मेटरनिटी अस्पताल से ही अपना कर आगे बढ़ जाता हो, फिर ‘लेवल प्लेईंग फील्ड’ की धज्जियां उड़ाते – प्राथमिक शिक्षा से ही आधा ट्रैक आगे दौड़ते हुए –  उस वर्ग के बच्चे विदेश के शानदार संस्थानों में पढ़ कर अपने लिए शिखर सुनिश्चित कर लें। दूसरी तरफ उन बच्चों के राजनेता-ब्यूरोक्रेट-कॉर्पोरेट आदि अभिभावक – नेतृत्व संभालते- भावुक भाषण देते बाकी बच्चों को मातृभाषाओं के लिए बलिहारी जाने का ज्ञान दें! क्या मातृभाषाएँ, भावुक सेवक जनों, दरी बिछाने-दंगे कराने वाले- और फिर मर-मिटने वाले अविवेकियों की भाषा बनें जो किसी के लिए सीढी – मंत्रमुग्ध, दिग्भ्रमित पीढ़ी बनें!

शायद यही कड़वापन थी कि सामाजिक समता के आकांक्षी, खास तौर से अनेक दलित चिंतकों ने,  इसी असमानता पर आधारित भावुकता के प्रतिरोध में, बचपन से ही अवसरों-आत्मविश्वास की भाषा अंग्रेजी में, सभी को  शिक्षा दिए जाने की वकालत की। इन लोगों के लिए, और काफी हद तक यह सही भी लगता है, अंग्रेजी का इको-सिस्टम अवसरों के साथ – पीढ़ियों के अपमान के सिलसिले को तोड़कर  – आत्म-सम्मान और समता का इको-सिस्टम प्रदान करता  है।

यह एक दूसरा धागा उलझ रहा है, जिसमें आगे न उलझते हुए मैं बच्चों के शिक्षण के अकादमिक धागे पर लौटता हूँ। विश्व भर में यही माना जाता है कि बच्चों के सर्वांगीण विकास, उन्हें ‘रट्टू-स्वार्थी-घमंडी तोता’ न बनाते हुए, अपने परिवेश से जुड़े स्वस्थ विकास के लिए तो मातृभाषा में ही प्राइमरी तक पढ़ाई होनी चाहिए – ऐसी पढ़ाई – जिसमें कमल-ताल हों, दवाई, ढाक-ढोल, खीर और फुटबॉल हों -समता हो -जैसा पिछले लेख में कहा है। जहां तक हिन्दी-कुमाऊँनी अथवा  किसी भी भाषा या उसकी बोली का प्रश्न है, अपनी बोली को जिंदा रखना, घरों  में पूरे अपनेपन और विनम्रता से, बिना शरमाये  उसे बोलना तो निश्चय ही बढ़िया है, पर स्कूली भाषा होने के लिए बोली में हिन्दी की तरह मानक भाषा-व्याकरण-शब्दावली होनी चाहिए- यह एक अलग ऊन का धागा है, जिसे हम यहीं छोड़ते हैं।

साथ ही, इस देश की सर्वाधिक विस्तार वाली हिन्दी की अंग्रेजी से तुलना इसलिए भी नहीं की जा सकती क्योंकि भाषा केवल ‘अवसर’ नहीं, ‘आधार’ और ‘पहचान’ भी है। हिन्दी और भारतीय भाषाओं की इसी मिट्टी, इसी आधार से, आप देश की तमाम भाषाओं-बोलियों=जीवन-संस्कृति और उल्लास-विषाद-आकांक्षाओं से बच्चे को जोड़ते हैं, जो उसे भारतीय पहचान, भारतीय भावात्मक सहारा देते हैं – जो सात-समंदर पार की विदेशी भाषा नहीं दे सकती।

तब कैसे संभव हो कि हम हिन्दी और मातृभाषाओं में प्राइमरी शिक्षा भी दे सकें और देश के सभी बच्चों के लिए न्याय-पूर्ण ‘लेवल प्लेईंग फील्ड’ भी बना सकें – और उन्हें स्नेहशील-उदार-विवेकवान भी बना सकें?

इस पर चर्चा करने से पहले एक सीधा प्रश्न – क्या हम देश की सेना को कुछ कॉर्पोरेट कंपनियों को देकर ‘भाड़े की सेना’ (मर्सीनरी फोर्स) से काम चला सकते हैं? ( भगवान न करे, ऐसा भी हो जाए – आजकल बहुत कुछ हो रहा है – बिक रहा है!) किसी भी विवेकवान  समाज के लिए देश की सुरक्षा जितना  ही महत्वपूर्ण देश के बच्चों की पुख्ता और बुनियादी शिक्षा तथा देश के हर नागरिक को गरिमा और सुविधा के साथ स्वास्थ्य-सेवाएँ सुलभ होना है। कोई भी, सही मायने में सभ्य लोकतन्त्र प्राइमरी-सेकेन्डरी शिक्षा और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराता है और उसे मुनाफा-कमाऊ निर्लज्ज-निष्ठुर-छिछोरी दुकानों से मुक्त रखता है। चूंकि हमें उदाहरण के लिए पश्चिम की तरफ देखने की आदत पड़ी है, इसलिए यूरोप के तमाम देशों, ऑस्ट्रेलिया -न्यूजीलैंड और काफी हद तक अमेरिका महाद्वीप को भी देख लें, ज़्यादातर हिस्सों में प्राथमिक-सेकेन्डरी शिक्षा मुफ्त है, सरकारी स्कूल प्राइवेट स्कूलों से बेहतर हैं और वहाँ पढ़ने पर बच्चों को शर्म नहीं झेलनी पड़ती।

अगर हमें टिकाऊ, प्रतिभा का सम्मान करने वाला समाज बनाना है, अगर हमें देश भर में, देश की विविधता को आत्मसात करते हुए सार्वभौम वैज्ञानिकता, मानवीयता, उदारता के मूल्यों वाली पीढ़ी तैयार करनी है,  अगर हमें इन मूल्यों को मजबूत करने वाले पाठ्यक्रम बनाने हैं, और सबसे बढ़ कर लोकतन्त्र की कसौटी पर खरा समता और न्याय-मूलक ‘लेवल प्लेईंग फील्ड’ बनाना है – तो हमें ऐसा करना ही होगा। और हाँ, यह देश की सेना (भाड़े की नहीं)  की तरह हमारे- हमारे  समाज के अस्तित्व के लिए भी ज़रूरी होगा।

लेकिन क्या कभी हमने, समाज के लिए इतनी ज़रूरी शिक्षा के बारे में वाकई गंभीरता से सोचा है। मैं आंकड़े लेकर नहीं बैठा हूँ। मैं उलझना नहीं चाहता। स्मृतियों में जो था, उसे ही फिर जांचा-परखा है।

1964-66 में बने कोठारी शिक्षा आयोग ने शिक्षा पर जीडीपी का 6 प्रतिशत खर्च करने की सिफ़ारिश की थी। पिछले 60 साल में, आकड़ों की तमाम कलाबाजी-भाषणों के मधुर वचनों के बावजूद यह नहीं हो पाया है। पिछले लेख में शिक्षा को समाज का ‘सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर’ कहा गया है। 2020-21 और 2021-22 के बजट अनुमानों के अनुसार शिक्षा पर व्यय जीडीपी  का 3.1% बताया गया  है – इससे पहले यह 3% से कम था। और यहाँ भी पेंच है। दरअसल, यह आबंटन  भी ’इतना ज्यादा’ हो जाता है कि सरकारें बिना पूरा खर्च किए इसे लौटा देती हैं। इसमें भी प्राइमरी-सेकेन्डरी  शिक्षा का हिस्सा तो और भी घट जाता है। केरल और मेघालय राज्यों ने फिर भी प्राइमरी शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया है।

मेरे स्मृति में, हवा के अनेक ताजा झोंकों (हालांकि वे भी मलय  बयार नहीं बन सके) 1987 में युवा प्रधान मंत्री राजीव गांधी के दौर में यह 6% वाली बात फिर याद दिलाई गई। एक और सुंदर, व्यावहारिक शब्द आया –‘ऑपरेशन ब्लैक बोर्ड’। इसमें बड़ी नहीं, गहरी बातें की गई थीं – प्राइमरी स्कूल में कम से कम हर कक्षा/ सेक्शन के लिए एक कमरा हो; हैडमास्टर का कमरा/ऑफिस हो; पढ़ाई / सिखाने का सामान और  पुस्तकालय हो; मामूली तोड़-फोड़ नुकसान के लिए तुरंत खर्च करने को आपात फंड हो; शिक्षक/शिक्षिकाओं के लिए, बदलते वक्त के साथ, प्रशिक्षण की व्यवस्था हो; पढ़ाई का सामान स्थानीय जरूरतों के अनुसार हो – इस मामले में शिक्षकों को पूरी छूट रहे; वगैरह।

एक ऐसी ही बहुत अच्छी, बहुत ज़रूरी बात 2002 में हुई जब संविधान में 86वां संशोधन कर के अनुच्छेद 21-ए जोड़ा गया और 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को संतोषजनक, एक निर्धारित  स्तर की शिक्षा  हासिल करने को मूलभूत अधिकारों में शामिल कर लिया गया। इसके बाद इससे जुड़े कानून भी बने।  

मेरा मन आंकड़ों में नहीं रम रहा क्योंकि मुझे और आप को मालूम है कि जब तक दून-डीपीएस का महिमामंडन रहेगा, हमारी काम वाली बाई अपनी मेहनत की गाढ़ी कमाई किसी सेंट सरस्वती/वीनस/शिवदयाल स्कूल के – शिक्षा के मुनाफाखोर परचूनियों पर खर्च करेगी; हम भी किसी मिठाई वाले की बढ़िया बिल्डिंग के लिए लाख रुपए लगाएंगे – क्योंकि सरकारी स्कूल  – अपमानों की जनश्रुति में, सरकार की उपेक्षा में और आस्थाहीन निस्तेज शिक्षकों के प्रेरणाहीन व्यक्तित्व में पड़ा होगा।

इसलिए, ज़रूरी है कि प्राइमरी-सेकेन्डरी स्तर पर आत्म-विश्वास, सरकार के आस्थावान-ईमानदार समर्थन के साथ – सरकारी स्कूल हाशिये से, पूरे आत्म-विश्वास के साथ केंद्र में आएँ; ‘डिफ़ौल्ट सैटिंग’ बनें। निजी स्कूल पढ़ने के तरीकों, पाठ्यक्रम में उनकी नकल  करें।  यह शिक्षा समतामूलक,विवेकपूर्ण और निशुल्क हो, बल्कि बच्चों को स्कूल में, इज्जत से खेल और खाने को मिले; गरीबी माता-पिता और बच्चे के लिए अपमानजनक और राह रोकने वाली न हो;  शिक्षा और स्वास्थ्य -सेना जितने महत्वपूर्ण माने जाएँ; जैसा कि दुनिया के आगे बढ़े, सभ्य देशों में होता है – अपवाद नहीं, नियम से होता है। 

लेकिन यह  ‘यूटोपिया’ जैसा सीधा लगता धागा भी इतना सीधा नहीं है – इसके सूत्रों में एक सूत्र बहुत मजबूत होना ज़रूरी है – पर है नहीं। और वही सारा ‘परशेप्सन’, सारे प्रयास को बिगाड़ सकता है। उस सूत्र में हैं – शिक्षक-शिक्षिकाएँ और शिक्षा  मैनेजर। उनके बारे में – अगली बार। 

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*लंबे समय तक सम्पादन और जन-संचार से जुड़े रहे राजेन्द्र भट्ट अब स्वतंत्र लेखन करते हैं। वह नियमित रूप से इस वेब पत्रिका में लिखते रहे हैं। उनके अनेक लेखों में से कुछ आप यहाँयहाँ और यहाँ देख सकते हैं।

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4 COMMENTS

  1. बढ़िया लेख है। अगली किश्तों का इंतज़ार रहेगा।

  2. विचारोत्तेजक और मर्म स्पर्शी आलेख।
    लेखक बन्धु साधुवाद के पात्र हैं।

  3. यह एक ज़रूरी लेखमाला है जो हैम सबके मन की बात कह रही है। इसे उन लोगों को पढ़ना ज़रूर चाहिए जो शिक्षा को कमाऊ उद्योग बनाकर भ्रष्ट कर रहे हैं।

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