मिल कर बजाओ ढाक-ढोल….प्राथमिक शिक्षा पर एक नज़र

राजेन्द्र भट्ट*

अपने देश में शिक्षा से जुड़े सवालों पर लिखना चाहता हूँ पर सीमाएं बहुत हैं। एक तो शिक्षाविद नहीं हूँ, दूसरे विषय ऐसा है कि ऊन का गोला बनाना है और मुद्दे धागों की तरह  उलझे हैं। एक धागे से भटक कर दूसरे में फंस जाने और फिर गांठ बांध जाने से कहीं भी न पहुँच  पाने की निराशा तो होगी ही। तो थोड़ा छोटा लक्ष्य रखते हैं – जिस देखे-परखे मुद्दे वाला धागा हाथ लग जाए, अपनी यादों-सवालों  और अनुभवों की अंगुलियों से उसे समझने-सुलझाने की कोशिश करता हूँ। मुमकिन है, अगले  छोर आपके – अपनों के पास हों –फिर हम कम से कम सीधे-सुलझे  धागों को लेकर, मिलकर एक सहृदय, न्यायपूर्ण  और विवेकपूर्ण शिक्षा का सुलझा हुआ समग्र गोला बना सकें।

तो शुरू करूँ अपने बचपन से – मेरे  प्रथम गुरु, मेरे  बाबूजी  ने मुझे हिन्दी वर्णमाला कुछ ऐसे सिखाई –

क – कमल ताल में फूला भाई।

ख – खल में घोटी जाए दवाई।

ग – गधा लात मार कर भागा।

घ- घट में चोंच डुबाता कागा।

बस, चार वर्णों में चार-पाँच साल के बच्चे के ‘विजुअलाइज’ करने की क्षमता के विस्तार के  लिए, जैसे जीवन और प्रकृति की किताब खुल गई। ताल है, कमल-दल हैं, दवाई घुट रही है तो ‘अपने’ रोगी के लिए ‘एंपैथी’ भी है; गधे की दुलत्ती में हिंसा नहीं है, बच्चे के मुंह पर मुस्कान लाने वाला हास्य-बिम्ब है और उद्यमी, समझदार कौवा – आगे पढ़ी जाने वाली घड़े में कंकड़ डालने वाले  कौवे की धैर्य और बुद्धि-कथा का ‘प्रोटोटाइप’ भी है। और पहली पंक्ति में सह-भाव से आया  ‘भाई’ तो बस, अपनेपन के सम्बोधन की सौम्यता का पाठ है। ( आजकल के धर्म-जाति-धर्म पर मर मिटने वाले ‘भाई’ लोग भी  दो ठंडी सांसें ले कर – ऐसे ‘भाई’ बोलेंगे तो एकदम उनका टेम्प्रेचर 98 पर आ जाएगा, बड़ा सुकून मिलेगा।) तो सब कुछ अपने आसपास- प्रकृति, जीवन और अपनेपन की खुली किताब- दस नए शब्द सीखे – दस नई स्थितियाँ महसूस की और मीठी तुकबंदी – जो अब तक याद है।

बाबूजी – एकदम अंग्रेजों के जमाने में -1920 से 1930 के दशक में प्राइमरी में पढ़ते होंगे। पता नहीं, न कांग्रेस, न लीग, न संघ के ‘नेक’ इरादों के बावजूद – इतना बढ़िया, इको-सिस्टम से इतना जुड़ा पाठ्यक्रम किसने बनाया, जो चालीस साल बाद मेरे लिए भी ताज़ा था- आज भी है। पता नहीं, बचपन में उन्हें सचित्र पुस्तक, जिसमें वह मोहक ‘राइम’ थी, नसीब हुई होगी या नहीं – होगी भी तो रंगीन तो कतई नहीं होगी।

लेकिन मेरे अध्यापकों ने मुझे ऐसे  नहीं सिखाया। मेरे स्कूल के दर्जा दो के अध्यापक मुझे सबसे ज़्यादा याद हैं – वह शायद दौरों संबंधी रोग से ग्रस्त थे और सहज रूप में भी काफी उत्तेजना में बोलते  थे और स्वाभाविक था कि हम सब उनसे डरते थे। उनका ज़िक्र इस रूप में इसलिए करना पड़ रहा है कि स्कूल आने के बाद पिताजी वाली ‘राइम’- कमलदल, सौन्दर्य, दवा – सब गायब हो गए थे। अध्यापकों को शायद कम वेतन मिलता था – वो हमसे ईंधन के लिए लकड़ी, सब्जी वगैरह मंगाते थे – और अपने  चाय-पानी के लिए पाँच-पाँच पैसे ‘गेम फीस’ जमा करते थे। वैसे शिक्षा निशुल्क थी और गाँव के दो कमरे-एक बरामदा-एक ऑफिस के स्कूल में कोई गेम या मैदान की सुविधा नहीं थी। मैं यह उल्लेख इसलिए कर रहा हूँ कि ऊन का एक धागा शिक्षकों की स्थिति भी है, उसे भी  सुलझा कर समाज को सुघढ़ गोले का हिस्सा बनाना है। 

आज़ाद भारत ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण वाले, विवेकपूर्ण, जाति-धर्म-वर्ण-लिंग की  समता-युक्त  समाज बनाने वाला संविधान अपना लिया था। इस संविधान में कोई राजा-मालिक-हाकिम नहीं था – इसे भारत के लोगों ने, भारत के लोगों के लिए, अपने आप को समर्पित किया था। यानि ‘लोक’ ही इस ‘तंत्र’ में मालिक था। और हाँ, एक जाति,धर्म को महान मानने वाले, उसके लिए लड़ने-भिड़ने के मूढ़ उन्माद में हमने नुकसान उठाते-उठाते, ताजा-ताजा भारी हिंसा के बाद, अपने  ही देश के दो टुकड़े करवा लिए थे। अब दोष देने को अंग्रेज़ भी नहीं थे। हमें ही अपने विवेकपूर्ण संविधान की भावना के अनुरूप चलना था। हमें ही सावधान रहना था।

और इसके लिए हमारी शिक्षा को संविधान के जीवन के, समता-न्याय के मूल्य हमें घुट्टी में पिलाने थे। हमें मौलिक, आधुनिक, सौम्य और विवेकशील, मानवीय और वैज्ञानिक सोच वाला  बनाना था। और इस काम में शिक्षा – उसमें भी प्राइमरी शिक्षा की बड़ी भूमिका होनी थी।

लेकिन मेरी पाठ्य-पुस्तकों और प्राइमरी की पढ़ाई में यह सब कुछ कर पाने की कोई योजना मुझे याद नहीं आती। उत्तराखंड के कुमाऊँ क्षेत्र का मेरा गाँव तब उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा था। तो जिन पुस्तकों और स्थितियों का मैं उल्लेख कर रहा हूँ, वो सब साठ के दशक का उत्तरप्रदेश समझिए। अध्यापकों  की दशा-दिशा, स्वार्थों-मजबूरियों का संक्षिप्त उल्लेख कर चुका हूँ। अब बताऊँ, मेरा भाषा से लिखित परिचय कैसे हुआ। मेरे समय  में वर्ण माला की पतली-सी,  रंगीन सचित्र ‘प्राइमर’ थी – किसी निजी प्रकाशक की। उसमें ‘क्ष’ से ‘क्षत्रिय’ था- सिर पर सोने का तीन-चार किलो का (खासा असुविधाजनक) टोपे-नुमा मुकुट, भोंके जाने को तैयार चमकता भाला था। ये कवच-भाला-मुकुट कमलदल-ताल-कौवे-गधे-दवा  की तरह मेरे या किसी बच्चे की मधुर-मानवीय  स्मृति के, हमारे आस-पास के इको-सिस्टम का  हिस्सा नहीं थे। ये हमारी रोज़मर्रा की भाषा के शब्द भी नहीं थे, हालांकि यह ‘क्षत्रिय’ उन्हें हमारी भाषा में जबरन घुसा रहा था। हमारी पुरानी पीढ़ी ने हिंसा, थोथे जाति-धर्म गौरव का दंश झेला था, फिर भी  हमारे आस-पास ना-मौजूद, यह अकड़ी गर्दन वाला कल्पना का ‘क्षत्रिय’ हमारी शिक्षा में चला आ रहा था।  जाहिर है, यह प्राइमर किसी शिक्षा-शास्त्री ने नहीं, शायद इरादतन भी नहीं, तैयार की थी। बस, सदियों के संस्कार थे, जो स्वतंत्र भारत के प्रथम पीढ़ी के शिक्षा मैनेजरों के अवचेतन में रह रहे थे और उनकी काहिली कहें या नासमझी, की वजह से हम तक पहुँच  चुके थे।

ऐसे ही, ‘ज्ञ’ से  ‘ज्ञानी’ था जिसके साथ के चित्र में भाभा-राधाकृष्णन-गांधी-आंबेडकर-नेहरू-पटेल-आचार्य काणे-मेघनाद साहा जैसे मेरे समय के ज्ञान-विवेक के प्रभावानों को दिखाया जा सकता था। लेकिन प्राइमर में  ऊपर नंगे बदन – बस एक केसरी शाल ओढ़े, धोती पहने, लंबी दाढ़ी वाला  व्यक्ति था, जो मुझ बच्चे के आस-पास कहीं नहीं होता था। ‘औ’ से ‘औरत’ एकदम दीन-हीन स्त्री-असमानता का साइन-बोर्ड सी थी। ऐसे ही, मुझ से, मेरी आस-पास की दुनिया से कटे दूसरे शब्द थे।

आगे -पोस्टरों, किताबों, किस्सों-कहानियों में, ज़्यादातर शायद अनजाने में,  शिक्षा वह सब मजबूत करती रही जिसकी काई हमारे अंतर्मनों में थी और  जिस काई की  वजह से हम उन तमाम मूल्यों-आदर्शों को ठीक से नहीं देख पाते थे, अब भी नहीं देख पाते जो, संक्षेप में, ‘हम भारत के लोगों’ ने 1950 में हमको ही दिए थे।

मेरे सीधे-सरल बाबूजी मुझे वर्णमाला के साथ-साथ, दिलचस्प तरीके से, खुली आँखों और निर्मल-सौम्य  मन से अपने देश-समाज को देखने  वाला बनाना चाहते थे।  लेकिन बहुत से बड़े कैनवास, बड़ी करुणा और बड़ी बुद्धि वाले प्रतिभावान भी निरंतर ऐसे ही प्रयासों में जुटे रहे – एक नहीं, अनेक बच्चों  के लिए।  बांग्ला में ‘विद्या-बुद्धि और विनम्रता  के सागर’ ईश्वरचंद विद्यासागर ने, बच्चों को अक्षर और भाषा-ज्ञान कराने के लिए, डेढ़ सौ साल से भी ज्यादा पहले, 1855 में, ‘वर्ण परिचय’ लिखा। इसी तरह, कविगुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने   ‘सहज पाठ’ लिखा,  जिसके लिए चित्र बनाए- महान चित्रकार नन्दलाल बसु ने। बंगाल के भाग्यवान बच्चों को जीवंत, सौम्य चित्रों से सजे ‘सहज पाठ’  के साथ जो प्यारी सी तुकबंदियाँ मिलती हैं, उसका थोड़ा आनंद लीजिए  –    

छोटो खोखा बोले अ आ

शेखे नी से कथा कोवा

(छोटा बच्चा, अ-आ कहता है। अभी उसे (ठीक से) बोलना नहीं आता।)

हृस्व इ दीर्घ ई

बोसे खाए खीर खोई

(हृस्व इ दीर्घ ई – बैठ कर खीर और खील खा)

हृस्व उ दीर्घ ऊ

डाक छड़े घेऊ घेऊ

(हृस्व उ दीर्घ ऊ – (कुत्ता) भौंक रहा है।)

क ख ग घ

क ख ग घ गान गेये

जेले ड़िंगे चोले बेये

(क ख ग घ गाते हैं। मछुआरा नदी के किनारे-किनारे (नाव में) जा रहा है।)

च छ ज झ डोले डोले

बोझा निये हाटे चोले

(च छ ज झ मिल कर बोझा (सामान) लेकर बाज़ार जाते हैं।)

ट ठ ड ढ कोरे गोल

कांधे निये ढाक ढ़ोल

(ट ठ ड ढ गोल करते हैं। उनके कंधों पर ढाक ढ़ोल (संगीत वाले वाद्य) हैं।)

त थ द ध बोले भाई

आम पाड़ी चोलो जाई

(त थ द ध बोलते हैं – भाई, आम तोड़ने चलते हैं।)

ये सारे बिम्ब असली भाषा, असली जीवन, प्यारे जीवन, अहंकार-स्वार्थ मुक्त सच्चे जीवन के हैं। ये बच्चे को – बच्चे से, नाव-नदी  और मछुआरे से, बाज़ार से साथ-साथ सामान लाते दोस्तों से , फुटबॉल खेलते-गोल करते-(दुर्गापूजा के) ढाक-ढोल बजाते युवाओं से,  आम तोड़ते-खाते मित्रों से जोड़ता है। यह सामंजस्य-सद्भावना के उल्लास से भरा समाज है, जिससे शिक्षक-शिक्षिका को बच्चे को परिचित कराना है – उसके रोम-रोम, सांस-सांस में बसाना है ताकि  उसे सारे लोग – एक ही स्नेहिल प्रकृति माँ की सन्तानें – उसी का विस्तार लगें। सब समरस, ‘अपने’ लगें।  तभी तो देश समाज का ‘सॉफ्टवेयर-हार्डवेयर’ समृद्ध-उर्वर-मजबूत होगा और  उस पर अहंकार, अविवेक, ‘परायों’ के प्रति शक, शंकाओं और घृणा का ‘वायरस’ न लग पाए। सब के प्रति  ‘एंपैथी’ का  कवच उसे ऐसे स्वार्थ-अशिक्षा-अज्ञान के वायरसों से बचाए।

आज़ादी के बाद, हमारे दृष्टि-सम्पन्न नेताओं ने इस्पात, बिजली और इंजीनियरी-चिकित्सा  के ‘हार्डवेयर’ के निर्माण के लिए ‘आधुनिक भारत के तीर्थ’ बनाए; तीस  सालों से हम ‘सॉफ्टवेयर’  के जरिए देश की तकदीर गढ़ रहे हैं। लेकिन इस ‘सॉफ्टवेयर’ और ‘हार्डवेयर’ को गढ़ने वाले हमारे बच्चों को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य देने वाली शिक्षा को हमने नासमझ लोगों के हाथ अनाथ क्यों छोड़ दिया? इस ‘सॉफ्टवेयर’ और ‘हार्डवेयर’ पर अवैज्ञानिकता, मूढ़ता, उन्माद और विवेकहीन शिक्षा  का वायरस और जंग लग जाएगा तो सब कुछ बर्बाद हो जाएगा, यह हमने क्यों नहीं सोचा? क्या बचपन से ही स्वस्थ, विवेकवान शिक्षा देना – इस्पात और आईटी की भी बुनियाद नहीं है? ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाले प्रेरक-यशस्वी  शिक्षक ऐसे दयनीय या फिर संवेदनशून्य द्रोणाचार्य कैसे हो गए कि हर पल निर्मल-निस्स्वार्थ शिक्षा का अंगूठा काटने को तैयार बैठे रहे! पाँच पैसे की गेम फीस से आगे बढ़कर गुरुजन  अखबारों में ‘फलां सर की क्लास’ से ‘श्योर सक्सेस’ के पीले-गुलाबी पर्चे डालने लगे – ताकीद करने लगे कि पाठ्य-पुस्तक में  आठवीं से पंद्रहवीं और फिर बाईसवीं से अटटाइसवीं पंक्ति तक ही पढ़ो – बाकी पढ़ने में  वक्त बर्बाद न करो – इसी में से सवाल आएगा, और ‘फुल मार्क्स’ आएंगे।  

तब फिर, हमने विद्यासागर-रवीन्द्रनाथ न सही, इनसे अनुप्राणित होने वाले, सुपठित, विवेकवान, प्रतिभाशाली शिक्षक और शिक्षक-मैनेजर क्यों नहीं रखे? क्यों उन्हें अच्छा प्रशिक्षण, अच्छी  सामाजिक प्रतिष्ठा, अच्छा वेतन-प्रमोशन क्यों नहीं दिया? क्या इसके लिए हमें आईएएस-आईपीएस जैसी परीक्षा, प्रशिक्षण और अधिकार-क्षमताएँ – और सबसे बढ़ कर दृष्टि की ज़रूरत नहीं थी?  हमने शिक्षा – खास कर प्राइमरी शिक्षा को इतना उपेक्षित, इतना अकेला क्यों छोड़ दिया?

और हाँ, सच्ची भाषाओं की पढ़ाई  सब को, खास कर बच्चों को सच्चे  संदेश देती है कि भाई, ताल है, कमल-दल हैं – देखो तो जरा। ज़रूरतमन्द को दवाई दो। झूठी  मारा-मारी क्या है, खीर खाओ, आम चुनो।

अकड़ी गर्दन, ओछे   मूछों-भालों-कंटोपों  वाले संदेश देने वाली भाषाएँ नकली होती हैं। नुकसान  पहुंचाती हैं। ऐसे  नमूने बच्चों को दिख भी जाएँ तो उन्हें तुरंत बताना चाहिए  कि ये मूँछ-भाले-कंटोप गत्ते के हैं, नकली हैं और इन्हें पहनने वाले अकड़ू सीता-स्वयंवर के बेवकूफ राजाओं जैसे छिछोरे होते हैं – इन पर हंसो और आगे बढ़ो।

समाज को बेहतर, टिकाऊ बनाने के लिए बच्चों को मिल कर कमल-दल देखने और खीर खाने, ढोल-ढाक बजाने वाली  पढ़ाई  कराना सब की – खास तौर से – माता-पिता और शिक्षक-शिक्षिकाओं की बड़ी ज़िम्मेदारी है। कच्ची मिट्टी जैसे बच्चों को लगातार वैज्ञानिक, विवेकशील और मानवीय थपकी दे कर ढालना-सुडौल-मजबूत बनाना है। ये बड़ा काम है – इसे देश के कारखानों-कॉलेजों में ‘सॉफ्टवेयर-हार्डवेयर बनाने से भी पहले किया जाना है। 

शिक्षा से जुड़े उलझे ऊन के धागे खोलने का क्रम – हम और आप – जारी रखेंगे।

 (‘सहज पाठ’ का पाठ, अर्थ, उच्चारण धैर्य से  समझाने के लिए मित्र शांतनु भट्टाचार्य का धन्यवाद। अगर गलती कुछ रह गई हो तो मेरी है।)

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*लंबे समय तक सम्पादन और जन-संचार से जुड़े रहे राजेन्द्र भट्ट अब स्वतंत्र लेखन करते हैं। वह नियमित रूप से इस वेब पत्रिका में लिखते रहे हैं। उनके अनेक लेखों में से कुछ आप यहाँ, यहाँ और यहाँ देख सकते हैं।

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7 COMMENTS

  1. सटीक.
    कुछ दिन पहले कुमार विश्वास का एक भाषण सुना. उनका कहना है कि बहुत मेहनत और विमर्श के बाद उन्होंने class 1-8 के लिए ऐसे बिम्बों वाली पुस्तकें लिखी हैं जो सहज तो हैं ही, उनका प्रयास है कि ये बिम्ब नन्हे बच्चों पर भारतीय मूल्यों की छाप छोड़ें
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  2. बहुत सुंदर लेख भट्ट जी…बेहतरीन👍🙏🙏

    • बहुत आभार। आप भाषा की गहरी समझ रखती हैं। इसलिए आपकी टिप्पणी महत्वपूर्ण है।

  3. सही मुद्दा उठाया,
    यही पुस्तक सरकारी स्कूल में अब भी देखी जा सकती हैं, काश प्राथमिक स्कूल में किताब होती ही नही,
    पहले तीन साल तोह किताबो की जगह पर्यावरण, सफाई, और दूसरे सामाजिक मूल्यों की बातें खेल खेल में बच्चों को बतायी जाती तोह बेहतर आदमी की नीव डलती.
    क ख ग.. और पहाड़ें तो रटने के लिये बहुत साल होते हैं

    • धन्यवाद, नरेश। अपने पहाड़ के जन-कवि और जन-कलाकार गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’ की सुंदर कविता है- ऐसा हो स्कूल हमारा। यू ट्यूब पर मिल जाएगी। आपकी बात का ही विस्तार है।

  4. किसी से सुना था कि तत्कालीन यूएसएसआर में प्राथमिक शिक्षक के तौर पर सबसे योग्य व्यक्तियों को, पीएचडी आदि की डिग्री लिए व्यक्ति की बहाली होती थी। प्राथमिक शिक्षा के दूरगामी और जीवन पर्यन्त पड़ने वाले प्रभावों को देख सनझकर ही टैगोर जैसे लोगों ने वर्णमाला बनायी। इस आलेख में भट्ट जी ने बड़े ही सहज ढंग से गहरे प्रश्नों को उभारा है।
    दूसरी ओर ऐसे लोग भी हैं जो इस बात के महत्व को समझते हैं और बचपन से ही बालमन पर नफ़रत और हिंसा का लेप चढ़ाने के लिए सैकड़ों हज़ारों स्कूल चलाते हैं। एक हद तक कुछ मदरसे भी यही काम कर रहे हैं।

  5. बहुत धन्यवाद। आपका यह इनपुट आगे काम आएगा।
    अकसर आपसे भी बात हुई है, उनके शिक्षा (घृणा)मंदिर , मदरसों की टक्कर में विवेकवान मित्र विवेक विद्यालय अगर बना पाते तो ये हालात न होते। वे स्कूलों से ही घरों के अन्तःपुरों तक पहुंचे हैं।

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