आखिर खड़ा हो ही गया मज़बूत विपक्ष

राजकेश्वर सिंह*

लोकसभा चुनाव के बाद केंद्र की नई सरकार में नरेंद्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बन चुके हैं और उनकी सरकार ने कामकाज भी संभाल लिया है, लेकिन भाजपा की हार, राजग की जीत और कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष की बढ़त पर बहस का सिलसिला अब भी जारी है जबकि चुनाव परिणाम घोषित हुए दो सप्ताह से भी ज़्यादा हो चले हैं। ज़ाहिर है कि इस बार के लोकसभा की हार-जीत के मायने और सबक काफी बड़े हैं। शायद यही वजह है कि ऐसा पहली बार होता दिख रहा है, जहां जीतकर सरकार बनाने वालों के चेहरों की चमक फीकी है और हारने वाला विपक्षी इंडिया गठबंधन जैसे हार का ही उत्सव मना रहा है। दरअसल इस बार भी चुनाव शुरू होने के पहले और चुनाव के दौरान भी पहले की ही तरह सत्तारुढ़ भाजपा और देश की मुख्यधारा का मीडिया ‘एक बार फिर-मोदी सरकार’ का नारा बड़े ज़ोर-शोर से लगा रहा था। ऊपरी तौर पर जनमानस में उसका असर भी दिख रहा था। चुनाव संपन्न होने के बाद और असल नतीजों के पहले विभिन्न एजेंसियों के एक्जिट पोल के अनुमानों ने भी ‘एक बार फिर, मोदी सरकार’ की ही तसदीक कर दी तो भाजपा की जीत और पुख्ता मानी जाने लगी, लेकिन मतगणना के बाद सब कुछ उलट-पुलट गया। केंद्र की सत्ता के लिए पूर्व में दो बार लगातार पूर्ण बहुमत पाकर ‘मोदी सरकार’ बना चुकी भाजपा इस बार के (2024) लोकसभा चुनाव में बहुमत से दूर रह गई। उससे ही नई बहस की जमीन तैयार हुई कि आखिर यह सब हुआ कैसे ? कैसे सारे पूर्वानुमान धराशाई हो गये ?

भाजपा की हार, राजग की जीत और कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष की बढ़त पर यह बहस वाजिब ही है, क्योंकि अपने गठबंधन सहयोगियों के साथ भाजपा ने बहुमत के जरूरी आंकड़े पा लिए हैं और केंद्र में ‘मोदी सरकार’ भले न बन पाई हो, लेकिन राजग सरकार तो बन ही गई है। सवाल उठना लाज़िमी है कि आखिर, राजग गठबंधन इससे पहले भी तो अस्तित्व में तो था ही, लेकिन पिछली दो सरकारें ‘मोदी की सरकार’ के नाम से ही जानी गईं। बीते दस वर्षों में राजग का कोई नामलेवा ही नहीं था। तब सारे सरकारी फैसले ‘मोदी सरकार’ ही करती थी। यही वजह है कि नरेंद्र मोदी अब जब तीसरी बार फिर से प्रधानमंत्री बन गये हैं, तब भी उनकी सरकार से ज़्यादा बहस इस बार की चुनावी हार-जीत पर हो रही है। नतीजे आते ही सत्तापक्ष, खासतौर से भाजपा के भीतर समीक्षाओं, आरोपों और प्रत्यारोपों का एक दौर पूरा हो चुका है। भाजपा की मातृ संस्था आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) भी बगैर उसका नाम लिए उसके शीर्ष नेतृत्व की खामियां गिना चुका है। इस मामले में आरएसएस के दाखिल होने के बाद भाजपा और मोदी की चुनावी हार ने बहस के दायरे को और बढ़ाया ही है। यह बहस इसलिए भी ज़्यादा बड़ी हो गई है, क्योंकि चुनाव के दौरान ही भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने एक साक्षात्कार में आरएसएस के साथ के बिना भी भाजपा के अपने दम पर आगे बढ़ने में सक्षम होने की बात कही थी।

दरअसल भाजपा ने इस बार भी चुनाव जीतने के लिए खुलकर हिंदू-मुसलमान और धर्म का नैरेटिव चलाया। हालांकि यह काम वह पहले भी करती थी, लेकिन इस बार उसकी धार ज़्यादा तेज थी। भाजपा की तरफ से विपक्षी नेताओं पर व्यक्तिगत हमले किए गये। एक तरह से विपक्ष का चेहरा बन चुके कांग्रेस नेता राहुल गांधी की नानी तक को भाजपा के शीर्ष नेता ने चुनाव में घसीटा। चुनाव के दौरान उसने अपनी सरकार के कामकाज गिनाने के बजाय कांग्रेस के घोषणा पत्र और विपक्षी नेताओं पर व्यक्तिगत हमले पर सबसे ज़्यादा फोकस किया, वह भी उसके खिलाफ गया। भाजपा यह समझने में नाकाम रही कि लोगों का भरोसा उससे उठने लगा है और चुनाव नतीजों ने साबित किया कि उसके सारे दांव फेल रहे। भाजपा को इस बार 2019 की तुलना में 77 लोकसभा सीटों का नुकसान हुआ। खुद नरेंद्र मोदी अपनी संसदीय सीट वाराणसी से महज डेढ़ लाख वोटों से जीत सके, जबकि 2019 के चुनाव में वह 4.79 लाख वोटों से जीते थे। इतना ही नहीं, भाजपा वाराणसी के आसपास की लगभग दर्जनभर सीटें भी हार गई। मोदी ने चुनाव के मद्देनजर अयोध्या में राम मंदिर निर्माण और उसकी प्राण प्रतिष्ठा को लेकर इसी साल जनवरी से भव्य उत्सव कर देश-दुनिया में उसका प्रचार किया था, लेकिन भाजपा अयोध्या की फैज़ाबाद ही नहीं, बल्कि अगल-बगल की ज़्यादातर सीटें हार गई। भाजपा को अकेले यूपी में ही 29 लोकसभा सीटों का नुकसान हुआ।

देश के दूसरे राज्यों, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में जहां उसने इस बार सीटों में बढ़त की सोची थी, वहां भी उसे बीते वर्षों में शिवसेना और एनसीपी में तोड़फोड़ कराने का भारी नुकसान हुआ। महाराष्ट्र में 2019 में भाजपा को 23 सीटें मिली थीं, इस बार वह महज़ नौ पर सिमट गई, जबकि इंडिया गठबंधन को 30 सीटें मिलीं। इसी तरह पश्चिम बंगाल में भाजपा 18 से 12 सीटों पर आ गई। इस लिहाज़ से देखें तो यह चुनाव और उसके नतीजे बहुत बड़ा सबक हैं, क्योंकि देश के मतदाताओं ने भाजपा को बहुमत से दूर रखकर यह संदेश तो दिया ही है कि उसका भरोसा भाजपा से उठ गया है और उसकी नीतियां और कार्यशैली उसे पसंद नहीं है। हां, इस सबके बाद भी संख्या के अंकगणित से राजग का सरकार बना लेना अलग बात है।

दरअसल इंडिया गठबंधन की शुरू से ही (जब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसके गठन की पहल की थी) कोशिश रही थी कि इस बार भाजपा की सरकार और मोदी प्रधानमंत्री न बन सकें। अब इंडिया गठबंधन इस बात से ही जलसा मनाता दिख रहा है कि मोदी को प्रधानमंत्री बनने से वह भले ही नहीं रोक सका, लेकिन भाजपा को बहुमत से काफी दूर तो कर ही दिया। उसके लिए दूसरी सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि जनता (मतदाताओं) ने न सिर्फ उनकी बात सुनीं, बल्कि उस पर भरोसा भी किया। विपक्षी दल जनता को यह समझाने में कामयाब रहे कि फिर से सरकार में आने पर भाजपा देश का संविधान बदल देगी और जिसके परिणाम स्वरूप पिछड़ों, दलितों का आरक्षण खत्म हो सकता है। भाजपा द्वारा खुलकर हिंदू-मुसलमान और धर्म का नैरेटिव चलाने का भी इस बार कोई असर नहीं हुआ और इसके उलट शायद विपक्ष यह समझाने में कामयाब रहा कि भाजपा धर्म और हिंदू-मुसलमान के नाम पर समाज में बंटवारा कराकर वैमनस्य बढ़ाना चाहती है। इसके अलावा प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर बार-बार लीक होना, बेरोज़गारी की दर 45 सालों में सबसे ऊपर होना और वर्षों से बढ़ रही महंगाई आदि अन्य ऐसे मुद्दे थे जिन्हें इस बार मतदाता ने तवज्जो दी। विपक्ष द्वारा उठाए गए इन मुद्दों पर जनता ने भरोसा किया, यही इंडिया गठबंधन की बड़ी उपलब्धि है। अब देखने वाली बात यह होगी कि चुनाव-परिणाम से विपक्ष को जो ‘मुमेंटम’ (गति) मिला है, उसे वह किस तरह सहेजता है और किस तरह आने वाले विधानसभा चुनावों (हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड) में अपनी इस गति को बनाए रखता है।

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* लेखक राजनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ पत्रकार हैं। राजकेश्वर जी अमूनन हमारी वेब पत्रिका के लिए लिखते रहते हैं। इनके पहले वाले लेखों में से कुछ  आप यहाँयहाँ और यहाँ देख सकते हैं।

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