घृणा का ‘टूल-किट’ -1

व्यंग्य रचना

राजेन्द्र भट्ट*

कुछ संयोग कितने खूबसूरत हो जाते हैं। इस साल वसंत पंचमी और वेलेंटाइन डे एक ही दिन पड़ गए और सुबह-सुबह याद ताज़ा हो गई कि ख्वाज़ा साहब की दरगाह में आज रंग खेला जाएगा। अलग-अलग संस्कृतियाँ, रीति-रिवाज – पर प्रेम का, अनुराग और दोस्ती का  चटक रंग सब को जोड़ देता है, सराबोर कर देता है। तभी तो, किसी भाषा में  प्रेम के ढाई अक्षर सब कुछ जानने वाला पंडित बना देते हैं, तो दूसरी भाषा में लफ़्जे-मुहब्बत के सिमटने से दिले-आशिक और फैलने से ज़माना हो जाता है। सबको जोड़ता है प्रेम।

लेकिन चलिए, वक्त और अखबार की (सुर्खियां नहीं) कालिमाओं की भी सुन लें। खबर है कि जोड़ने से, प्रेम से, प्रेम-दिवसों से अनैतिकता, लव-जिहाद वगैरह फैल रहे हैं जिनसे राष्ट्र (की कल्पना) को नुकसान हो रहा है। तो क्यों नहीं हम, जोड़ें नहीं – तोड़ें। और प्रेम की तोड़ निकालने को ‘घृणा दिवस’ मनाएँ – बार-बार मनाएँ। क्या-क्या  करना होगा इसके लिए? आजकल इन कामों के लिए ‘टूल किट’ का इस्तेमाल हो रहा है और इसे अचूक हथियार बताया जा रहा है। तो चलिए, हम भी घृणा दिवस आयोजन का ‘टूल किट’ बनाएँ।

टूल  1: ‘मैं और हम’ महान – बाकी सब नीच-पराये 

घृणा की बेल को सरसब्ज करने के लिए ज़्यादा से ज़्यादा खाद-पानी मिलना चाहिए। इसलिए पहली शर्त तो यह है कि ‘हम’ ज़्यादा से ज़्यादा लोगों से ज़्यादा से ज़्यादा घृणा करें – उन्हें ‘दूसरा’ बनाएँ, ‘पराया’ बनाएँ। अंग्रेजी में कहें तो ‘we’ और ’other’ का माहौल पैदा करें। जितना ‘we’ सिमटता जाएगा, ‘other’ फैलता जाएगा, उतनी ही घृणा बढ़ेगी। जितने लोगों को अछूत-पराया बनाएँगे, उनसे दूरी बनाएँगे  – उतनी ही ‘नैतिकता’ सुरक्षित होगी। 

 हर समाज की परंपरा, मिथकों और ग्रन्थों में प्रेम, सद्भाव और जोड़ने की बातें की गई हैं। अपने यहाँ भी ‘आत्मवत सर्वभूतेषु’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (सभी प्राणियों को अपने जैसा और पूरी धरती के लोगों को परिवार जैसा मानना) की परंपरा है। लेकिन ये क्या ज़रूरी है कि हम प्रेम और जोड़ने की बातों पर विचार करें – हम तोड़-मरोड़ कर, और चुन-चुन कर घृणा को पोषित करने वाले प्रसंग और कथन भी तो ढूंढ सकते हैं। वसंत और विद्या की देवी माँ सरस्वती का हंस पानी अलग करके दूध को ग्रहण करने का विवेक रखता है। हम पानी में से कीचड़ तो बटोर ही सकते हैं। तो आइए, अपने अलावा सभी ‘दूसरों’ के प्रति घृणा, पूर्वाग्रह  और अविश्वास का कीचड़ बटोरने की परंपरा-रिवाज तलाशें, उनकी  ओर लौटें।

बचपन में, संस्कृत की एक प्रसिद्ध पोथी में (नाम इसलिए नहीं दूँगा कि अपनी महानता और दूसरों की नीचता के इस महान राष्ट्रीय अभियान की शुरूआत में ही, खुद घृणा का शिकार न हो जाऊं) पढ़ा था कि किस-किस तरह के नाम वाली, आवाज़ वाली, शारीरिक लक्षणों वाली (भूरी आँखें, शरीर में ज्यादा रोम-कम रोम, नदी-पहाड़ जैसे नाम वाली, वगैरह) लड़की से विवाह नहीं करना चाहिए। यह सूची इतनी लंबी और तन्मयता से बनाई लगती थी कि इसके हिसाब से किसी भी लड़की से विवाह संभव नहीं लगता था। इसी तरह, कई पोथियों में किस-किस इलाके में कन्यादान न करने, किस-किस इलाके के ब्राह्मणों के कम श्रेष्ठ होने के कई प्रसंग हैं।

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पोथियां ही नहीं, हमारे लोक-व्यवहार में भी ऐसे अनेक पूर्वाग्रह और भारी संभावनाएं हैं। आप कश्मीरी, पंजाबी, पहाड़ी, गुजराती, बंगाली, सिंधी, पूर्वोत्तर के सारे ‘चीनी’, पूरे दक्षिण भारत के ‘मद्रासी’,  – यानि किसी भी इलाके  के लोगों के बारे में बचपन से सुने किस्से-कथन-किंवदंतियाँ याद करें कि वे कितने धूर्त, चंट, धोखेबाज, मूर्ख, अनैतिक, जादू कर देने वाले (वालियाँ) होते/होती  हैं। ‘साँप को छोड़ दो, —–को मार दो’ किस्म के समझदार कथन याद करें। बाकी, ‘दूसरे’ धर्म वालों, जाति वालों  की नीचताओं और साज़िशों का तो अंत ही नहीं है -ऐसा तो हम सुनते ही रहते हैं।

हमें इन पूर्वाग्रहों-विचारों को  इतनी बुलंदियों तक ले जाना है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को हम नीच और घटिया मान सकें, और महानता के शिखर पर ‘हम’ ही हों।  इसके लिए, हमारे इतिहास में, इमारतों में, प्रतीकों-प्रदर्शनियों-किताबों-गीतों-कथाओं  में  – ‘दूसरों’ की याद दिलाने वाले सारे उल्लेख, बिम्ब, चित्र मिटा देने हैं। हमें विविधता में एकता नहीं – डरावनी  एकरूपता चाहिए। इस अभियान में किताबों, इमारतों -और हो सके तो इन्सानों को भी- फूँक डालने वाला क्रूर, अनपढ़ उत्साह होना चाहिए, जैसा कभी कबीलों के दौर में होता था। 

भारत जैसे बड़े देश में, साहित्य, संस्कृति, कला की विविधता पर भी भरोसा नहीं कर सकते। इसलिए हमें -पूर्वोत्तर से लेकर काठियावाड़ और कश्मीर से कन्याकुमारी तक की सारी सांस्कृतिक विविधताओं को नष्ट कर – उन्हें एक डंडे से हांक कर – ‘मुख्यधारा’ यानि ‘हमारे वाली’ धारा  में ले आना चाहिए। ‘हमारे’ अलावा ‘दूसरे’ तोड़ने वाले विचार भी नहीं चलने चाहिए। तभी राष्ट्र अखंड रहेगा।   यह  चट्टानी  राष्ट्र-चोटी जितनी नुकीली होगी, जितना अकेला, साँय-साँय करते सन्नाटे वाला यह माउंट एवरेस्ट – नहीं-नहीं गौरीशंकर शिखर –  होगा, उतना ही हमारा देश-समाज-पंथ  – अतीत में, वर्तमान में और भविष्य में महानतम होगा।

लेकिन जीवन और सृष्टि के टिके रहने का तर्क और विवेक तो प्रेम,मेल-मिलाप और जुडने के पक्ष में ही होता है। अपनी परंपरा में तो ईश्वर के बारे में भी कल्पना की गई है कि  वह एक था, उसकी ‘अनेक’ होने की इच्छा हुई (एकोहं बहुश्यामः) तो सृष्टि बनी। इसलिए तरह-तरह के प्राणियों की ‘अनेकता’ में वही ‘एक’ है।  लेकिन घृणा का  अभियान तो ज्यादा से ज्यादा ‘अनेक’ खड़ा करने पर ही सफल होगा। इसलिए झूठ, उन्माद की बुनियाद पर नई विचारधारा बनानी होगी। उसका पहला सिद्धांत होगा –‘एवरीथिंग इज फेयर इन हेट एंड वार।‘ इसलिए विचार, जाति, उपजाति, धर्म,विचार, रुचि, पेशा  – सभी के आधार पर ज्यादा से ज्यादा पराए बनाने होंगे। जितने छोटे से छोटे ‘परायों’ के समूह हम बना सकें, उतना अच्छा। एक बार में एक छोटे ‘पराए’ गुट को निशाना बनाएँ। फिर उसके खिलाफ, उसके अतीत के खिलाफ, उसके ‘खतरनाक’ इरादों-कामों के खिलाफ दुष्प्रचार, ‘फेक न्यूज़’, ट्रोलिंग, मार-पीट,  मुकदमे  वगैरह के अभियान से उसे ‘राष्ट्रीय-सामाजिक’ खलनायक बना कर नष्ट कर दें। हर छोटे ‘पराए’ समूह के खिलाफ बाकी ‘मेजोरिटी’ की ताकत इस्तेमाल करें। हमारे पास ऐसे ‘सफायों’ के अनेक उदाहरण हैं। जिन्हें मारें, उनकी ही हिंसा-षडयंत्रों के बारे में प्रोपेगंडा करें। इस तरह, एक-एक कर ऐसे ‘पराए’ समूहों को नष्ट करते चलें।   

तो हमें अपनी महान परम्पराओं से, ज्यादा से ज्यादा लोगों को ‘पराया’, घटिया और खतरनाक बनाने का खूब सड़ा हुआ कीचड़ जमा करना है ताकि ज्यादा से ज्यादा घृणा की फसल पनप सके। लोगों को समझाना होगा कि देश-समाज को ‘विविधता’ वाली ‘एकता’ (यूनिटी इन डाइवर्सिटी)  नहीं चाहिए, फूलों की नाजुक बहुरंगी बगिया नहीं चाहिए बल्कि हमें  एक पत्थर की चट्टान  (मोनोलिथ) जैसी डरावनी एकरूपता (यूनिफोर्मिटी) चाहिए। कश्मीर से कन्याकुमारी तक सख्ती से एकदम एकरूप लोग, विचार, संस्कृति, साहित्य, कला, विज्ञान बनाने  होंगे -जो इस एकरूपता के  बाहर होगा, वह ‘पराया’ होगा। इससे बेकार की विविधता वाले, देश की एकरूप महानता से विचलित करने वाले  विचारों, साहित्य, कला, इतिहास वगैरह की निगरानी करने में समय और संसाधन कम खर्चने पड़ेंगे। लोग भी भटकेंगे नहीं, भेड़ों  की तरह एक राह चलेंगे और सत्ता को परेशान नहीं करेंगे।  इस तरह, ज्यादा से ज्यादा ‘पराए’ बना सकेंगे, उन्हें घृणा की ताकत से नष्ट कर सकेंगे और एकरूप, आतंक पैदा कर सकने वाला, ताकतवर, गर्व करने योग्य राष्ट्र-समाज बना सकेंगे।

टूल  2: हिंसा के सोये पिशाच को जगाएं

एक पिशाच  हमारे मनों में उनींदा पड़ा होता  है जो समाज के सारे सामाजिक-सांस्कृतिक-वैज्ञानिक विकास को एक झटके में नष्ट कर सकता है।  सभ्य-मानवीय समाज  और विद्वान-विवेकवान नेता-शासक इसे दबा कर रखने के लगातार प्रयास करते हैं पर घृणा फैलाने का अगर महान उद्देश्य हो तो इसे जगा देना  बहुत सटीक हथियार है। यह पिशाच  है – हिंसा की प्रवृत्ति। बड़ा ‘परवर्ट’ पिशाच है – खून, जबर्दस्ती, तड़पना देखने में मजा आता है इसे।

इसे समझाने के लिए मैं अपने बचपन में जाता हूँ। मैं अभाव-ग्रस्त परिवार का किताबी कीड़ा किस्म का बच्चा था और घर में पढ़ने को हिन्दी अनुवाद सहित संस्कृत की पोथियाँ ही  थीं – महाभारत, दुर्गा-सप्तशती, भागवत पुराण, मनुस्मृति वगैरह। मुझे तोते की तरह संस्कृत रटने के साथ-साथ, अनुवाद के जरिए बात समझने की जिज्ञासा भी थी। तो घर के लोग मेरे ‘अध्ययन और धर्मपरायणता’ पर गदगद थे लेकिन मैं, महाभारत के ज्ञान-विज्ञान के अंशों ( महाभारत का करीब तीन चौथाई) को बहुत कम, लेकिन युद्ध वाले हिस्सों को बहुत ज्यादा पढ़ता था। उसकी ‘डीटेलिंग’ में बहुत मज़ा आता था। अर्जुन द्वारा नागों को मार-मार कर आग में जला देने, भीम द्वारा राक्षसों को पटकने-पीटने के मजेदार हिंसक प्रसंगों को पढ़ते और उनके ब्लैक एंड व्हाइट / कलर  चित्रों को निहारते, मैं भीष्म पर्व पर टिकता था जहां महाभारत की असली लड़ाई शुरू होती थी। इसके शुरू के 30-40 पृष्ठ – यानि भगवद्गीता वाले ‘ज्ञान’ के पृष्ठ, मैं जल्दी से पलटता था और सीधे लड़ाई और मरने-मारने की ‘डीटेलिंग’ में बंध जाता था। अर्जुन-भीम-कर्ण-भीष्म  जैसे बड़े ‘स्कोरर’ धनुष पर एक साथ 15-20 बाण चढ़ा कर कइयों की छातियाँ बींध देते, किसी के घोड़े-सारथी मार देते, किसी का सिर उड़ा देते। कोई गदा से हाथी का सिर फोड़ देता तो कहीं हाथी लोगों को कुचलते चले जाते।

हिंसा के पिशाच को सुलाए रखने या फिर जगा देने के द्वंद्व का एक मार्मिक प्रसंग वाल्मीकि रामायण (अरण्य कांड, सर्ग 9-10) में है। राम का पंचवटी प्रवास शुरू होने पर दंडकारण्य के ऋषि-मुनि उनसे आग्रह करते हैं कि वे उस इलाके से राक्षसों को मार भगाएँ।  राम जब धनुष-बाण ले कर इस अभियान पर निकलते हैं तो सीता उन्हें टोकती हैं कि ‘बिना वैर के (बेमतलब) दूसरों के प्रति क्रूरता (हिंसा) बड़ा पाप है।‘ सीता कहती हैं कि धनुष-बाण,  ‘क्षत्रियों’ के हाथ में आते ही उनके बल को ईंधन की तरह भड़का देता है इसलिए राम को बेमतलब हिंसा नहीं करनी चाहिए और अपना वनवास का समय शांति से बिताना चाहिए। सीता उन्हें एक प्रसंग सुनाती हैं कि किसी तपस्वी की तपस्या भंग करने के लिए, इंद्र ने उनके पास एक तलवार रख छोड़ी। अब तो तपस्वी सब जगह तलवार हाथ में लिए घूमते। हाथ में तलवार आने से धीरे-धीरे उनकी हिंसक प्रवृतियाँ भड़क उठीं और पूजा-पाठ, भलाई की आदतें छूट गईं। बहरहाल, राम इस सलाह  को नामंज़ूर करते हुए कहते हैं कि ऋषि-मुनियों की रक्षा की प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए वह अपने प्राण तथा  लक्ष्मण और सीता को भी छोड़ सकते हैं।

तो वेलेंटाइन, वसंत, प्रेम-अनुराग, अपनी मर्जी से विवाह, साथ रहने – इन सब बातों का घृणा से मुक़ाबला करने  का दूसरा साधन है कि अपने अंदर के हिंसा के पिशाच को जगाएँ; हथियार उठा कर उन्माद और नशे की हालत में आ जाएँ; प्रेम, अहिंसा और विवेक की सीता माता की, स्त्रियों की आवाज को पूरी मर्दानगी से अनसुनी कर दें   – तभी जाति-धर्म बचेगा – महानता की खुमारी आएगी। तभी हम बार-बार घृणा दिवस मना सकेंगे। 

घृणा और बरबादी के उन्माद-पथ पर चलने के बाकी ‘टूलों’ का जायजा अगली कड़ी में –

लंबे समय तक सम्पादन और जन-संचार से जुड़े रहे राजेन्द्र भट्ट अब स्वतंत्र लेखन करते हैं।

शीर्षक चित्र : किशन रतनानी

डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं और इस वैबसाइट का उनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। यह वैबसाइट लेख में व्यक्त विचारों/सूचनाओं की सच्चाई, तथ्यपरकता और व्यवहारिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।  

5 COMMENTS

  1. यह व्यंग्य रचना नहीं हैं बहुत गंभीर है

  2. बहुत सुंदर।आज का समाज दिशाहीन हो चला है और भेड़ की तरह चल रहा है जिसका अन्त है सामाजिक अव्यवस्था और तदुपरांत अनचाहे मौत।सही दिशा देने वाला कोई है नहीं।आदमी की सोच बदल चुकी है।नकारात्मक सोच का बोल बाला है क्योंकि बढती बेरोजगारी ने सोचने की शक्ति खत्म कर दी है।दो टाईम की रोटी जुटाने में सारा समय और शक्ति का दोहन करता है इन्सान, फिर इस अनचाहे बोये गये घृणा की फसल भी काटनी है उसको।इन्सान की सोचने की शक्ति इस हद तक क्यों खत्म हो गई?या कर दी गई ताकि उसमें सही का विवेक ही खो जाये।झूठ सिसोण के झाल की तरह पनप रहा है।किन्तु इसकी उम्र जादा नहीँ है।ऐसा मेरा विश्वास है।सत्य होता तो दूब की तरह हमेशा ही हरा रहता।नफरत और झूठ अत्यंत अस्थाई हैं।

  3. बहुत सुंदर, हालातों को लेकर लेखक जैसी व्यग्रता सभी युवाओं में हैं। पर आत्मविश्लेषण न कर पाने की क्षमता का फायदा उठा कर उन्हें उलझाए रखा जा रहा है। स्थिति जरूर बदलेगी।

  4. बहुत ही प्रासंगिक। यह एक ऐसा टूलकिट है जिसके प्रयोग पर न जेल जाने का ख़तरा, न बेल माँगने का झंझट। अगली कड़ी की प्रतीक्षा रहेगी।

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