पारदर्शिता पर खरी नहीं उतरी मोदी सरकार

आखिरी पन्ना

आखिरी पन्ना’ उत्तरांचल पत्रिका के लिए लिखा जाने वाला एक नियमित स्तम्भ है। यह लेख पत्रिका के अगस्त 2019 अंक के लिए लिखा गया।

नरेंद्र मोदी सरकार धाकड़ बहुमत से वापिस आई है लेकिन पारदर्शिता को लेकर उसका रिकॉर्ड ऐसा जा रहा है कि वह अब तक की सबसे ज़्यादा असुरक्षित महसूस करने वाली सरकार लग रही है। पिछले दिनों सूचना के अधिकार में जिस जल्दबाज़ी में संशोधन किए गए, उनको देखकर हर स्वतंत्र विशेषज्ञ ने यही कहा कि सरकार के इस कदम से सूचना का अधिकार कुंद हो जाएगा। उच्चतम न्यायालय ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में इस अधिकार को मौलिक अधिकार जैसा महत्वपूर्ण माना था। इसके बावजूद सरकार ने अफरा-तफरी में संसद से इन संशोधनों को पारित करवा लिया।

इसी तरह पारदर्शिता को लेकर यूपीए शासन की दूसरी पारी में एक बहुत ही महत्वपूर्ण कानून बना था – वो था ‘व्हिसलब्लोअर एक्ट’ जिसे सरकारी हिन्दी में सूचना-प्रदाता अधिनियम कहा गया है। यूपीए की दूसरी पारी के अंत में इस विधेयक को राष्ट्रपति की मंज़ूरी दे दी गई थी और अब इसके बाद सरकार को इसके लागू करने के नियम बनाने थे। चूंकि मई 2014 में मनमोहन सरकार निपट गई और मोदी सरकार ने कार्यभार सम्हाल लिया, इसलिए ये का उस पर आ गया कि वह इस कानून के नियम बना कर इसे लागू करे।

भ्रष्टाचार हटाने और सुशासन लाने की नाम पर बनी मोदी सरकार  की कथनी और करनी में अंतर नहीं होता तो वह तुरंत ‘व्हिसलब्लोअर एक्ट’ के नियम बनाती और इसे लागू करने लायक बनाती। सुप्रीम कोर्ट तक से इसके लिए दबाव था और 2014 के चुनाव प्रचार में भाजपा ने जिस तरह यूपीए के शासन के दौरान भ्रष्टाचार के मुद्दे उठाए थे, उससे ऐसा लगता था कि भाजपा इस कानून को लाना अपनी नैतिक ज़िम्मेवारी मानेगी।

हुआ इसका उलटा ही – सच कहें तो मोदी विरोधियों को भी ये उम्मीद नहीं थी कि वह इतनी रुखाई या बल्कि यूं कहें कि इतनी बेशर्मी से भ्रष्टाचार के खिलाफ बने इस कानून को ठंडे बस्ते में डाल देगी। ऐसा कानून जो खास तौर पर इसलिए बना था कि भ्रष्ट आचरण करने वाले सरकारी या पब्लिक सेक्टर अधिकारियों के बारे में सूचना देने वाले व्यक्तियों की शिकायत की जांच की व्यवस्था की जाएगी और ये भी सुनिश्चित किया जाएगा कि शिकायतकर्ता को ऐसी शिकायत करने के कारण कोई दिक्कत ना हो।

मोदी सरकार ने संसद द्वारा पारित हो चुके और राष्ट्रपति द्वारा हस्ताक्षर हो चुके ‘व्हिसलब्लोअर एक्ट’ के नियम बनाकर उसे लागू करने की बजाय उसमें कुछ ऐसे संशोधन प्रस्तावित कर दिये जिससे इस कानून की धार ही खतम हो गई। इन संशोधनों को लोकसभा में पारित कर दिया गया और राज्य सभा में उस समय पर्याप्त क्षमता ना होने के कारण यह संशोधन विधेयक संसद की ‘सिलैक्ट कमेटी’ को भेज दिया गया। अभी ये शायद उसी समिति के पास है यानि ‘व्हिसलब्लोअर एक्ट’ पूरी तरह निष्प्रभावी होने का इंतज़ार कर रहा है।

यहाँ यह बताना भी अप्रासंगिक ना होगा कि ‘व्हिसलब्लोअर एक्ट’ को लाने के लिए शायद यूपीए सरकार भी कोई बहुत उत्सुक नहीं थी किन्तु बहुत सारे आरटीआई एक्टिविस्ट्स पर जब जानलेवा हमले होने लगे और उनमें से कइयों की मौत भी हो गई तो सुप्रीम कोर्ट से भी बीच बीच में ऐसी टिप्पणियाँ आने लगीं जिनमें ऐसे किसी कानून को बनाने की हिदायत होती थी। ऐसे में किसी को ऐसा नहीं लग रहा था कि एनडीए सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ बने किसी कानून को ऐसे बेरहमी से ठंडे बस्ते में देगी।

अगर आपको देखना हो कि सरकार इस बारे में क्या सोच रही है तो राज्य सभा में ठीक एक वर्ष पहले यानि 2 अगस्त 2018 को पूछे गए प्रश्न संख्या 1864 को देख लीजिये। प्रश्नकर्ता ने 2014 से अब तक कई आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या का ब्यौरा मांगा था और साथ ही ये भी पूछा था कि ‘व्हिसलब्लोअर एक्ट’ या सूचना-प्रदाता अधिनियम जो 2011 में भी बन चुका था, अभी तक लागू क्यों नहीं हो पाया है। इसका उत्तर सरकार ने जिस तरह दिया है, उससे सरकार की ये मंशा साफ हो जाती है कि उसकी ऐसे किसी कानून में कोई रुचि नहीं है।

इन दो उदाहरणों के अलावा पारदर्शिता के सिद्धान्त की धज्जियां एनडीए सरकार ने उड़ाई ‘इलेक्टोरल बोण्ड्स’ के ज़रिए। कई कानूनों में संशोधन करके सरकार ने ‘इलेक्टोरल बोण्ड्स’ का इंतज़ाम किया है जिसमें राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए ‘दानी लोग’ स्टेट बैंक की कुछ चुनी हुई शाखाओं से ये बॉन्ड खरीदते हैं और राजनीतिक दलों को दान दे देते हैं। तमाम विशेषज्ञों ने इस पर घोर आपत्ति जताई और सबसे बड़ी बात तो ये कि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को दिये अपने हलफनामे में इस व्यवस्था को पारदर्शिता के बिलकुल उलट बताया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस तरह हुई फंडिंग का लगभग 95% भाग भाजपा को ही मिला है। क्या ये अनुमान लगाना मुश्किल है कि सैंकड़ों-हजारों करोड़ का दान भाजपा को क्यूँ दिया जा रहा है?

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