उत्तराखंड में भर्ती घोटाले के बहाने से बढ़ती बेरोज़गारी पर एक छोटी सी चर्चा

आखिरी पन्ना उत्तरांचल पत्रिका के लिए लिखा जाने वाला एक नियमित स्तम्भ है। यह लेख पत्रिका के सितंबर 2022 अंक के लिए लिखा गया।

देश में बेरोजगारी कितनी अधिक है, इसका अंदाज़ इस तथ्य से भी लगता है कि आत्महत्या करने वालों में बेरोजगारों और आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे लोगों की संख्या में लगातार वृद्धि हुईहो रही है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि बेरोज़गारी के कष्ट और भी बढ़ जाते हैं जब साथ ही महंगाई लगातार बढ़ रही हो। आप गूगल सर्च करें तो लगातार बढ़ती बेरोज़गारी पर आपको अनंत सामग्री मिल जाएगी। ऊपर से ‘ए आई’ (AI) यानि ‘आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस’ के विभिन्न उद्यमों में इस्तेमाल बढ्ने की संभावनाओं के कारण बेरोज़गारी और भी बढ्ने का खतरा भी मंडरा रहा है अर्थात यदि कोई प्रभावी हस्तक्षेप नहीं हुआ तो रोज़गार बढ़ना तो दूर अब उपलब्ध रोजगारों में भी कमी आने का खतरा है।

सरकारी और सरकारी उपक्रमों की नौकरियों में भी तमाम घोषणाओं के बावजूद नौकरियाँ बढ्ने की कोई संभावनाएं नहीं दिख रहीं बल्कि खाली पड़े पदों को भी अत्यंत धीमी गति से भरा जा रहा है। भारतीय सेना में, जहां किसान का बेटा जाने को लालायित रहता है और उत्सुकता से भर्ती की प्रक्रिया का इंतज़ार करता है, अब अग्निपथ नामक स्कीम आ गई है जिससे युवकों में निराशा हुई है और इस पर  उत्तरांचल पत्रिका के पिछले अंकों में चर्चा हो चुकी है। उत्तराखंड के युवकों को इस निर्णय से और भी निराशा हुई क्योंकि यहाँ के अधिकांश परिवारों से कम से कम एक सदस्य के सेना में भर्ती होने की परंपरा रही है।

ऐसी परिस्थितियों में जब राज्य के युवक मन में अपने भविष्य को लेकर पहले ही अनिश्चय और एक तरह से निराशा की स्थिति हो तो ऐसे समय में उत्तराखंड में विभिन्न भर्तियों में हो रहे घोटालों की खबरों से मेहनत करने वाले युवकों का दिल कैसे टूटा होगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं। हम इस खबर के विस्तार में नहीं जा रहे क्योंकि उत्तराखंड से सरोकार रखने वाले हमारे सुधि पाठकों की नज़र से यह शर्मनाक खबर छूटी नहीं होगी। और भी दुख की बात ये है कि अभियुक्तों से पूछताछ में यह भी पता चला कि यह कोई पहली बार नहीं है जब ऐसा घोटाला हुआ है और पहले भी ऐसा होता रहा है। इस संदर्भ में 2015 में राज्य में दारोगाओं की भर्ती प्रक्रिया के दूषित होने का नाम लिया जा रहा है। उत्तराखंड के इस घोटाले का स्तर मध्यप्रदेश के व्यापम घोटाले जितना बड़ा शायद नहीं है लेकिन इसने उस कुख्यात घोटाले की याद ज़रूर दिला दी है। ऐसे घोटालों में अगर दोषी लोग पकड़े भी जाते हैं तो यह सबको मालूम होता है कि ये लोग तो सिर्फ ‘फ्रंट’ के तौर पर काम कर रहे हैं और भाड़े पर लिए गए लोगों की तरह काम करते हैं और असली दोषी लोग तो इतने शक्तिशाली होते हैं कि साधारणत: उनके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं होती।

एक जुड़ा हुआ सवाल यह भी उठता है कि उत्तराखंड में सिर्फ सरकारी नौकरियों पर ही निर्भरता क्यों है? यह सही है कि सेना और अर्ध-सैनिक बलों या केन्द्रीय पुलिस बलों में जाने के लिए उत्तराखंड के युवक सदैव तत्पर रहे हैं लेकिन इन नौकरियों के अलावा भी दशकों से प्रदेश के युवक पलायन करके लखनऊ, दिल्ली और अन्य बड़े शहरों की ओर भागते रहे हैं। अब तो अलग राज्य बने भी बरसों हो गए हैं लेकिन इस स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं है। प्रदेश में अपने रोज़गार के अवसर पैदा करने के कोई प्रयास नहीं किए गए या उनका कोई असर नहीं दिख रहा।

केंद्र और राज्य सरकार को मिलकर परंपरागत तरीकों से बाहर जाकर इस विषय पर मौलिक चिंतन करना होगा कि राज्य में (सिर्फ उत्तराखंड के लिए नहीं बल्कि हर राज्य के लिए) रोजगार पैदा करने के लिए क्या किया जा सकता है। हर जगह की स्थानीय विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए, हर राज्य की नहीं बल्कि हर ज़िले के लिए अलग-अलग कार्य योजनाएँ बनाई जानी चाहिएँ ताकि उन कार्य-योजनाओं को व्यवहार-रूप में लाने में कोई समस्या नहीं आए। उदाहरण के लिए उत्तराखंड में उधमसिंह नगर और पिथौरागढ़ के लिए या फिर चमोली और हरिद्वार के लिए एक जैसी कार्य-योजनाएँ कैसे बन सकती हैं। इन कार्य-योजनाओं का मुख्य तत्व रोजगार सृजन ही होना चाहिए। इसके लिए यदि स्कूली-स्तर पर सिलेबस आदि में भी बदलाव करने पड़ें तो उन्हें करने में भी ज़रा भी नहीं हिचकिचाना चाहिए! इन कार्य-योजनाओं को बनाते समय स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए, उस इलाके की जो सांझी स्मृतियाँ और सांझे अनुभव हों, उन्हें सरकारी कार्य-योजनाओं में कैसे शामिल किया जाये, इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। ये भी सुनिश्चित करना चाहिए कि इन स्थानिक कार्य-योजनाओं के कार्यान्वयन में मुख्य भूमिका कार्यपालिका की नहीं बल्कि स्थानीय लोगों की अर्थात चुने हुए प्रतिनिधियों की होनी चाहिए। यदि यह संभव हो सका तो ना केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार उत्पन्न होंगे अपितु गांधी जी के ग्राम-स्वराज की कल्पना भी चरितार्थ होगी।

…….विद्या भूषण

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