लोकतन्त्र – समाजवादी कार्यकर्ताओं के साथ एक विमर्श (21 वर्ष पूर्व का एक दस्तावेज़)

विजय प्रताप*

भारत में लोकतन्त्र पर विजय प्रताप* के दो काफी पुराने लेख हमें कुछ माह पूर्व प्राप्त हुए हैं। उनमें से पहला लेख जो 32 वर्ष पूर्व ‘लोकायन समीक्षा’ नामक पत्रिका के सम्पादकीय के तौर पर लिखा गया था, हम 31 अगस्त को यहाँ प्रकाशित कर चुके हैं। जहां पिछला लेख लोकतन्त्र और लोकतन्त्र में राजनैतिक दलों के विभिन्न आयामों को समेटता है, वहीं यह लेख जो लगभग 21 वर्ष पहले लिखा गया था, समाजवादियों साथियों से लोकतन्त्र पर एक विमर्श जैसा है। प्रस्तुत लेख सामयिक वार्ता नामक पत्रिका के विशेषांक (जुलाई-अगस्त 2000) के सम्पादकीय के तौर पर प्रकाशित हुआ था। उस समय सामयिक वार्ता के सम्पादक प्रबुद्ध समाजवादी चिंतक किशन पटनायक थे लेकिन इस अंक के अतिथि सम्पादक विजय प्रताप थे। पाठकों को स्मरण करवा दें कि जिस समय यह लेख लिखा गया था, उस समय वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ताज़ा-ताज़ा पुनः सत्ता में आई थी और कांग्रेस एक बार फिर गांधी परिवार की छाया में आ गई थी। यह समय था जब भारतीय राजनीति में पिछड़े वर्ग से आए नेतृत्व का पदार्पण हो चुका था और राजनीति एक नई करवट ले रही थी। इस दौर के बारे में विजय प्रताप एक स्थान पर लिखते हैं “सामाजिक क्रांति के हिसाब से देखा जाये, तो कुछ मायनों में यह भारत के लोकतंत्र का स्वर्णिम युग है। इतने बड़े पैमाने पर दलित, पिछड़े, शोषित तबकों ने देश के राजकाज में साझीदार का, सत्ता में भागीदार बनने का सपना कभी नहीं देखा होगा जितना आज के दौर में देखा है”। एक स्पष्टीकरण यह कि नीचे दिया गया लेख वार्ता में प्रकाशित लेख से एक-दो स्थानों पर थोड़ा भिन्न है क्योंकि हमें मूल लेख का रफ ड्राफ्ट भी उपलब्ध हो गया था और जहां ऐसा लगा कि स्पष्टता की कमी है तो हमने मूल लेख की मदद से यथोचित परिवर्तन करने की स्वतन्त्रता ले ली।

सामयिक वार्ता का लोकतंत्र समीक्षा विशेषांक आपके हाथ में है। हम राजनीति एवं समाज परिवर्तन के ऐसे दौर में से गुजर रहे हैं जहां हर विचारधारा अपने भीतरी संकट से गुजर रही है। यह संकट हर विचारधारा को मांजने का एक अवसर भी है। इस अंक में हमने लोकतंत्र के मूल विचार या उसके औपचारिक ढांचे की समीक्षा करने की कोशिश नहीं की है। न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका लोकतांत्रिक राज्य के तीनों अंगों के बारे में बहस के अतिरिक्त देश में मीडिया की क्या भूमिका है, आंदोलन समूहों की क्या भूमिका है, एनजीओ की भूमिका पर क्या विमर्श चल रहा है, बौद्धिक वर्ग किस तरह की भूमिका निभा रहा है, सामाजिक तबकों के हिसाब के देखें तो दलित, पिछड़ें, औरत के लिए लोकतंत्र के क्या मायने हैं – इन सब सवालों पर कुछ सामग्री तो आप इस अंक में पाएंगे लेकिन लोकतंत्र का कैनवस इतना व्यापक है कि उसको एक अंक में समेटना मुश्किल काम है।

    यह अंक कार्यकर्ताओं का एक आपसी विमर्श है। इसमें समाजवादी संगठनों में सक्रिय और समाजवादी विचारधारा को अभी भी प्रासंगिक मानने वाले साथियों से लिखवाने की कोशिश की गई है। समाजवादियों के  अतिरिक्त मार्क्सवाद से प्रेरित कई महत्वपूर्ण साथियों ने भी इस अंक में लिखा है। भाकपा (माले-लिबरनेशन) के महासचिव श्री दीपांकर भट्टाचार्य के हम विशेष रूप से आभारी हैं। हमने तमाम मित्रों से कहा था कि लोकतंत्र के जिस पहलू पर वे पिछले दस-बीस वर्षों से शिद्त से सोच रहे हों और जिस पर ज़्यादा काम किया हो, उसी को खूंटा बनाकर अपनी बात लिखें। हमारा मानना है कि अभी एक बंधे-बंधाऐ अकादमिक ढांचे में लोकतंत्र पर विमर्श संभव नहीं है। हालांकि इस वस्तुस्थिति को नकारा नहीं जा सकता कि लोकतंत्र की सोच में बहुत जटिलता तथा विविधता आयी है। देश की बहुस्तरीय और बहुआयामी सांस्कृतिक और राजनैतिक विविधता के मद्देनज़र हर अंचल की अलग-अलग राजनैतिक ज़रूरतें हर तबके के अलग-अलग सपने और अलग-अलग राजनैतिक आकांक्षाएँ हैं। इसको लोकतंत्र के सपने का विखंडन भी कह सकते है और मंथन का अभूतपूर्व दौर भी।

    सामयिक वार्ता मूलतः सामाजिक राजनैतिक कार्यकर्ताओं की पत्रिका है। हमारी कोशिश है कि इस विमर्श के माध्यम से हम जनता के बीच लोकतंत्र के काम के लिये एक साझे सपने के साथ जा सकें। सपने एकरूप न भी हों लेकिन एक-दूसरे के सपने एवं उसके तर्क को जिस हद तक हम समग्र रुप में पहचानेंगे, उस हद तक हमारी साझी पहचान ज़्यादा सशक्त दिखेगी क्योंकि अलग-अलग घेरे में, अलग-अलग भौगोलिक अंचल में काम करने की वजह से हम लोग अलग-अलग कामों में लगे हुए हैं। उसका संगठन के स्तर पर और समाज के स्तर पर जो कुछ असर होना चाहिये, वह काफी छितरा हुआ है। जब समाज में राजनीति को ही लेकर तरह-तरह की शंकाएं पैदा की जा रही हों, राजनीति और लोकतंत्र दोनों पर ही देशज बाज़ार, अंतरराष्ट्रीय ताकतों, साम्प्रदायिक और फासीवादी ताकतों का हमला हो, वैसे में लोकतंत्रवादी जमातों को एक साझे सपने के लिये राष्ट्रीय स्तर पर ठोस और असरदार ढंग से हस्तक्षेप की राह खोजनी होगी। इसलिये इस अंक के माध्यम से वार्ता के कार्यकर्ताओं से विशेष अपील करना चाहता हूं कि वे इस अंक पर अपनी टिप्पणी ज़रूर भेजें।

    लोकतंत्र के विमर्श के संदर्भ में कार्यकर्ताओं की महती भूमिका है। आज कार्यकर्ताओं का सामाजिक आधार काफी विविध है। सामाजिक क्रांति के हिसाब से देखा जाये, तो कुछ मायनों में यह भारत के लोकतंत्र का स्वर्णिम युग है। इतने बड़े पैमाने पर दलित, पिछड़े, शोषित तबकों ने देश के राजकाज में साझीदार का, सत्ता में भागीदार बनने का सपना कभी नहीं देखा होगा जितना आज के दौर में देखा है। देश का बहुजन आज यह सोच सकता है कि उन्हीं में से निकला हुआ कोई व्यक्ति राज्य का मुख्यमंत्री होगा, जिला बोर्ड का अध्यक्ष होगा, देश का राष्ट्रपति होगा। देश के शासक गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी को अपना अध्यक्ष भी एक दलित को ही बनाना पड़ा है। यह बात सोचकर रोमांच पैदा होता है कि ब्राह्मणवाद को, मजबूरी में ही सही, एक दलित को अपना नेता मानना पड़ा। इसमें भी लोकतंत्रवादियों का, सामाजिक समतावादियों का योगदान है। पिछड़ी जातियों की हाल-हाल तक समाज में उपस्थिति भी नहीं मानी जाती थी, किसी गाँव के बारे में कहा जाता था कि ठाकुरों का गाँव है, या ब्राह्मणों का गाँव है, चाहे उस गाँव में वे संख्या बल के आधार पर थोड़े ही क्यों न हो। पूछिए कि यह किसका गाँव है, तो जो आधिपत्य वाली जाति होगी, वह उसे अपना बता देगी। लेकिन अब यह संभव नहीं है; कम से कम वोट के मामले में अब दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक खुद निर्णय करने  स्थिति में है। उन पर किसी का दबाव पहले जैसा नहीं रहा है। हालांकि बात सीधी-सरल भी नहीं है कि दलित अपने फैसले खुद ही करता है। उसके मानस पर विभिन्न दबावों से इनकार नहीं किया जा सकता जो व्यवस्थावादी प्रचारतंत्र है, वह दलितों में एक ऐसा अस्मिता का भाव पैदा करता है ताकि दलित वर्ग हित की बहस कमज़ोर पड़ जाये और एक खोखली दलित अस्मिता, एकांगी दलित अस्मिता पैदा हो और उसके नाम पर दलित किसी एक राजनैतिक दल से, पिछड़ा दूसरे राजनैतिक दल से और गरीब अगड़ा तीसरे राजनैतिक दल से अपना संबंध बना ले। अस्मितावाद के जिस दौर में हम हैं उसमें अंध-अस्मितावाद की एक आंधी-सी चल पड़ी है। जो फैसला दलित खुद करता दिख रहा है वह दरअसल इस आंधी के चलते जो मानस बनता है, उसी के कारण होता है। इसलिये संपूर्णता में यह फैसला लोकतांत्रिक नहीं है। एक अर्थ में इसमें लोकतंत्र का संभ्रम है तो दूसरे अर्थ में यह संभावना भी कि आज दलित नेतृत्व के मामले में स्वावलंबी हो गया है। इस स्थिति को हम केवल एक आदर्श और सपने की कसौटी पर जाँचते हैं तो यही नतीजा निकलता है कि लोकतंत्र का अनीतिवादी, अंध-अस्मितावादी दौर है जिसमें जनता के वास्तविक सवाल मौन हो गये हैं। हालाँकि अतीत में दलितों और पिछड़ों की स्थिति के बरक्स आज जिस पैमाने पर सत्ता में उनकी भागीदारी हुई हैं, वह अपने आपमें किसी बड़ी क्रांति से कम नहीं है। और यह क्रांति किसी खून-खराबे के बिना हुई है। मार्क्सवादी जो आर्थिक वर्ग संघर्ष के आधार पर ही क्रांति को परिभाषित करते थे उन्होंने समाज की जातिगत विद्रूपताओं को नज़रअंदाज़ किया था। इसलिये आज वे इस क्रांति का सही-सही आकलन नहीं कर पा रहे है। लेकिन समाजवादी विरासत को मानने वाले कार्यकर्ता भी इस क्रांति को अनदेखा करें तो यह विडंबना ही कही जाएगी।

    लोकतंत्र के इस विमर्श को आगे बढ़ाने से पहले एक बात साफ कर देना ज़रुरी है। अभी हमारे बौद्धिक समुदाय का जो सामाजिक आधार है, वह आम तौर से अगड़ी जातियों का है और उसमें भी ब्राह्मण-बहुल मध्यम वर्ग का है। और जो सामाजिक क्रांति हुई है, उससे जीवन के कई क्षेत्रों खासकर बौद्धिक कार्यकलाप में इन वर्गों का एकाधिकार टूटा है या टूटता जा रहा है। इस लोकतांत्रिक क्रांति की वजह से बहुत-सी अवधारणाओं को चुनौती दी जा रही है। ध्यान रखने योग्य बात यह है कि लोकतंत्र के विमर्श में कार्यकर्ताओं की, खासकर जो अब तब दबाकर रखे गये तबके हैं, उनके चिंतनशील कार्यकर्ताओं की विशेष भूमिका है। उनको अपना अनुभव, चिंतन और सपने वैचारिक बहसों में जरूर मुखरित करने होंगे। उनका अभिव्यक्ति से ही नए परिप्रेक्ष्य में, समाजवाद व लोकतंत्र की पुनर्परिभाषा की जा सकेगी।

यहाँ मैंने समाजवाद का भी जिक्र किया है। यह साफ कर देना ज़रूरी है कि भारतीय समाजवादी आंदोलन ने लोकतंत्र और समता को एक ही सिक्के का दो पहलू माना है। यानी लोकतंत्र और समता अविभाज्य हैं। अगर समग्र किस्म का लोकतंत्र आएगा तो उसमें सभी तरह के समत्व के भाव के बारे में सोचना होगा और उसे मूर्त रुप देने के लिए नई संस्थाएँ स्थापित करनी होंगी। पुरानी संस्थाओं, जैसे जाति की संस्थाओं के क्षरण को समझ कर नए संदर्भों में नई सामुदायिकता, समत्व, साझेदारी वाले प्रत्यक्ष लोकतंत्र के मूल्य को आत्मसात करते हुए, व्यक्ति स्वतंत्रता एवं समूह-धर्म की नई मर्यादाएं गढ़नी होंगी। समाजवादी आंदोलन में ऐसी तड़प थी।

    यहाँ हम समाजवादी आंदोलन का मूल्यांकन नहीं कर रहे हैं लेकिन समाजवादी आंदोलन की जो वैचारिक दिशा रही है, उसके बारे में कहीं कोई भूल-चूक या हीनता-बोध नहीं होना चाहिये। स्वतंत्रता आंदोलन के समय की कांग्रेस को छोड़ दें तो समाजवादी धारा ही ऐसी धारा है जिसने देसज मुहावरे व देसज सोच के आधार पर आम लोगों की भागीदारी से लोकतंत्र को बहुआयामी व बहुस्तरीय बनाने की कोशिश की है। धार्मिक-विविधता वाले भारत जैसे विस्तृत देश में यह केवल अकादमिक लोगों के वश का नहीं है। उनको यूरोप-अमेरिका के बौद्धिक फैशनों की भी चिंता करनी होती है। अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि और अकादमिक सीमाओं के कारण राजनीति शास्त्र लोकतंत्र को समग्र रुप में समझने के लिए अधूरा शास्त्र है। इसलिये राजनीतिशास्त्रियों और अकादमिक लोगों के योगदान से लोकतंत्र पर एक समग्र किस्म का चिंतन विकसित नहीं हो सकता। इसलिये लोकतन्त्र के तमाम जो नये एक्टर्स हैं, नये भागीदार तबक़े हैं उनके बारे में उदारता से सोच पाना एक वस्तुपरक भाव से सोच पाना यह सामान्य बौद्धिक के वश का नहीं है। इसलिये राजनीति शास्त्री अपनी सामाजिक पृष्ठभूमि के चलते, विशेष तौर पर भारतीय तंत्र में, एक अधूरा शास्त्री है। इसलिये लोकतन्त्र के विमर्श के लिये राजनीति शास्त्रियों और अकादमिक लोगों के योगदान से एक समग्र किस्म का चिंतन नहीं खड़ा हो सकता। यह बात सामान्य तौर पर भी सच है कि क्रांति का दर्शन तो उसके कार्यकर्ता ही गढ़ते हैं। लोकतंत्र किसी क्रांति से कम नहीं है। इसके दर्शन को गढ़ने के लिये अकादमिक लोगों की जो ट्रेनिंग है, उसकी मदद लेनी है, उनसे संवाद करना है। लेकिन राजनीति शास्त्र की हमारी जाति व्यवस्था के कारण जो विशिष्ट सीमाएँ बनती हैं उनको भी ध्यान में रखना है।

यहां अपने आपको एक चेतावनी देना जरूरी है। बौद्धिक लोग सच के जिस कोने को पकड़ पाएंगे, हम लोग शायद नहीं पकड़ पाएंगे। अधिकांश बौद्धिक, विचारों को लेकर चली रही क्रियाओं–प्रतिक्रियाओं का अच्छा हिसाब रखते है। जैसे एक ईमानदार मुंशी पैसे-पाई का बहुत अच्छा हिसाब-किताब रखता है। लेकिन जो स्वप्नशील व्यक्ति होता है वह अपने पैसे का भी ठीक से हिसाब किताब नहीं रखता। राजनैतिक कार्यकर्ता स्वप्नशील कार्यकर्ता होते हैं, उनका एक सपना होता है समाज के बारे में वह आमतौर से अपने सपने द्वारा ज़्यादा प्रेरित होते हैं। जैसे सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है, वैसे ही राजनैतिक कार्यकर्ता का कोई भी घटना हो, कोई भी मुद्दा उठे, उसमें कैसे उसको अपने सपने के अनुरुप ढ़ालना है, कैसे यह तो उसके सपने को सही साबित करने वाला प्रमाण मिला – इसी ढ़ंग से उसका दिमाग काम करता है। तो हम सब लोग सत्य के जिस कोने को पकड़ते हैं, उसमें हमारे सपने की प्रेरणा कई बार ज्यादा रहती है और वस्तुगत स्थिति कई ऐसे तथ्य, कई ऐसी परिस्थितियां जो हमारे सपने के अनुरूप नहीं पड़ती हैं या हमारी परिस्थिति को कठिन बनाती हैं, उनको हम अवचेतन मन से अनदेखा कर देना चाहते हैं। इसलिये लोकतन्त्र के विमर्श के बारे में जहां हम लोगों की एक विशिष्ट भूमिका है, उसी तरह से विचारधारा से प्रतिबद्ध लोगों की भी एक विशिष्ट सीमा है। इसलिए चाहे हम अकादमिक लोगों को किसी स्वप्न के लिये बहुत सघनता से न जुड़े हुऐ लोग भी मानें, चाहे उनको हिसाब किताब रखने वाला मुंशी भर भी मानें, पर अपने वैचारिक प्रशिक्षण से जो काम एक अकादमिक व्यक्ति कर सकता है, वह हम नहीं कर सकते और जो हम कर सकते हैं, वह सब बौद्धिक लोग नहीं कर सकते। इसलिये एक विनम्रता का भाव, एक संपूरकता का भाव, आपसी संवाद का भाव – ऐसे भावों से, आपसी संवाद से ही लोकतन्त्र के बारे में एक समग्र विमर्श हो सकता है। इस बात को हमारे कार्यकर्ताओं को और हम सभी को ध्यान में रखना चाहिये।

    लोकतंत्र विमर्श पर असर डालने वाली एक और विडंबना की चर्चा जरुरी है। 19-वीं सदी के अंत और 20-वीं सदी के प्रारम्भ से अनेक विचारधाराएँ आईं – उदारपंथ, मार्क्सवाद, समाजवाद या फिर भारतीय संदर्भ में देखें तो एक देसज लोकशक्तिकरण का एजेंडा जो गांधी जी ने ‘हिन्द स्वराज’ से शुरु किया और उसको अलग-अलग पड़ावों के जरिए बहुत आगे तक बढ़ाया गया है। लेकिन विडंबना यह है कि इन सब विचारधाराओं को मानने वाले या उन पर प्रयोग करने वाले लोग आज राजनीति के केंद्रीय मंच से नदारद हैं जबकि आज जैसा राजकाज के तंत्र से जुड़ने का, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री बनने का सपना इतने बड़े पैमाने पर शायद ही  कभी मुल्क में देखा गया हो। ऐसा नहीं है कि उन तबकों से, जिन्हें आज हम दलित या पिछड़ा कहते है, इससे पहले शासक नही हुए। लेकिन यह कैसी  विडंबना है कि जब शासन आया तो अन्य जातियों और तबकों ने अपने को राजकाज से अलग कर लिया। आज नागरिक होने मात्र से आपको राजकाज में भागीदारी का अधिकार मिल जाता है और मतदान उसकी पहली सीढ़ी है। लेकिन जिन विचारधाराओं, जिन सपनों की जम़ीन पर खड़े होकर पिछले सौ-डेढ़ सौ वर्षों में संघर्ष किए गए और जिन संघर्षों से अनोखी लोकतांत्रिक क्रांति संभव हो पाई, उन नेताओं, उन विचारकों के प्रति  उदासीनता, संशय व तिरस्कार का भाव देखने को मिलता है।

    लोकतंत्र की क्रांति एक और आयाम है लोगों में ठहराव का टूटना!  डॉ. राममनोहर लोहिया के भाषणों का केंद्रीय सरोकार रहा है कि भारतीय समाज की जड़ता कैसे तोड़ी जाए। उन्होंने नारा दिया कि ‘जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं’, ‘जीना है तो मरना सीखो, अपने हक पर लड़ना सीखो’ वगैरह। ये नारे जे. पी. आंदोलन में भी काफी लोकप्रिय हुए। लोहिया जी ने ‘विल टू पावर’ में हमें सत्ता के लिए संकल्पवान होना सिखाया। ‘सात साल में हम हिन्दुस्तान की सत्ता बदल देंगे’, जैसी बातें लोहियावादियों के बीच चर्चा में ही रही हैं। अब तो दो तीन साल में हिन्दुस्तान की सत्ता बदल रही है। तो भारतीय राजनीति की जड़ता का इस तरह टूटना अपने आप में लोकतंत्र की एक उपलब्धि है। कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई यह दूसरी बड़ी उपलब्धि है। और इन उपलब्धियों में समाजवादियों की एक सक्रिय भूमिका रही है। लेकिन विडंबना यह है कि समाजवादी दलित और पिछड़ों में सत्ता की आकांक्षा के लिए विस्फोट व लोकतांत्रिक क्रांति की बाढ़ संजो नहीं पाए – अपनी वैचारिक और अपने नेतृत्व की थकान के चलते, आपसी झगड़ों के चलते। जैसे बाढ़ आने पर चारों तरफ पानी ही पानी दिखता है लेकिन प्यास बुझाने के लिए पानी नहीं मिलता, वैसे ही आज लोकतंत्र का चारों तरफ विस्फोट है। लोकतांत्रिक अभिव्यक्तियों का जैसे बाँध टूट गया है। हर व्यक्ति कुछ न कुछ कहना चाह रहा है, हर वर्ग में एक घबराहट है, चिंता है, कुछ करने की इच्छा है, कुछ रास्ता खोजने की कोशिश है जो बने-बनाए रास्ते थे, बनी-बनाई विचारधाराएं थीं, संगठन थे, वो सब अधूरे जान पड़े हैं। समाजवाद के वारिसों का दावा है कि आज की जो सकारात्मक उपलब्धियां हैं, उसमें हमारा निर्णायक योगदान रहा है। लेकिन आज पूरे देश में एक भी ऐसा समाजवादी संगठन नहीं है जो निर्णायक रुप से असर डाल सके या कोई एक मुद्दा भी प्रभावी ढंग से उठा सके। लोकतंत्र पर ध्यान देना जरुरी है कि एक तरफ लोकतंत्र की बाढ़ आयी है और दूसरी तरफ लोकतंत्र नामक पानी से प्यास बुझाने के लिए कोई संस्था, दल, विचारधारा सक्षम नहीं नज़र आती। इस समस्या पर एक गंभीर, सुचिंतत विमर्श की शुरुआत हो, यही हमारे इस अंक का  एक उद्देश्य है।

    वार्ता में चलने वाली से अंततः लोकतंत्र की समग्र सुचिंतित और सर्वमान्य परिभाषाएं विकसित हों, यही हमारी कोशिश होनी चाहिए। जब हम ‘सर्वमान्य’ कहते हैं तो हमारा आशय लोकतंत्रवादियों की अपनी बिरादरी की परिभाषा से है। लोकतंत्र में तो कभी संभव नहीं होगा कि किसी एक की परिभाषा सर्वमान्य हो। उदारपंथियों की परिभाषा को समाजवादियों ने कभी स्वीकार नही किया। उदारपंथी परिभाषा में केवल राज कैसे चलेगा, सिर्फ यही चिंता होती है। यानी उसकी संस्थाएं कैसे काम करें, उसमें हर एक को भागीदारी का एक औपचारिक अधिकार, वोट का अधिकार हो; दल अपनी विचारधारा के अनुसार काम कर सकें, समय के अनुसार चुनाव हो, कानून का राज हो, मानवाधिकारों की सुरक्षा हो, अल्पसंख्यकों को उनके सांस्कृतिक-सामाजिक अधिकार हासिल हों, आम व्यक्ति के प्रति राज्य जवाबदेह हो और इस जवाबदेही को ठोस बनाने के लिए सूचना का अधिकार, प्रतिनिधियों को वापसी का अधिकार हों चुनाव सुधार  किए जाएं, चुनावों में पैसा कम खर्च हो, चुनावों में गैर-राजनैतिक मुद्दे न उठा दिए जाएं, आदि-आदि। परन्तु भारत ही क्या दुनिया में मानव समाज के किसी भी कोने में चले जाएं, लोकतंत्र की अगर इतनी ही परिभाषा रहे तो यह सतही परिभाषा होगी और लोकतंत्र के नाम पर अभिजनवाद चलेगा। इस तरह के लोकतंत्र के आवरण में कैसे अभिजनवाद चल सकता है इस बारे में समाजशास्त्रियों, राजनीतिशास्त्रियों और दार्शनिकों ने काफी कुछ लिखा है। अमेरिकी समाज के समालोचक और टिप्पणीकार चौम्सकी का इस मुद्दे पर काफी अध्ययन है कि किस तरह अमेरिका का प्रभु वर्ग का सामाजिक आधार सिकुड़ कर रह गया है।

हमारे यहां के अकादमिक लोग तो लोकतंत्र के सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष पर केवल इसलिए ध्यान नहीं रखते कि मूलतः राजनीतिशास्त्र उदारपंथ-प्रेरित है बल्कि इसलिए भी कि आम तौर से उसका चरित्र उच्च जाति तथा मध्यम वर्गीय है। राजनैतिक विमर्श में शामिल राजनेता भी आम तौर से अगड़ी जातियों के हैं और वे बाबासाहब अंबेडकर की इस बात को अनदेखा करते हैं जो उन्होंने ‘गांधी, रानाडे और जिन्ना’ नामक अपने भाषण में कही थी, “एक लोकतांत्रिक ढंग की सरकार यह मानकर चलती है कि समाज का स्वरूप भी जनतांत्रिक है परन्तु लोकतांत्रिक सरकार के औपचारिक ढांचे का तब तक कोई अर्थ नहीं है जब तक कि सामाजिक लोकतन्त्र नहीं है”। बाबा साहब आंबेडकर जल्दी ही इस दुनिया को छोड़कर चले गए और दलितों के दूसरे बड़े नेता, जगजीवन राम जी,  कांग्रेस में अपनी सत्ता बनाए रखने में ही ज्यादा सक्रिय रहे। दलित समाज एक स्वायत्त शक्ति के रुप में खड़ा हो, इसके लिए जातिवाद पर, जाति-व्यवस्था पर तीखा और लगातार हमला उन्होंने नहीं किया। न ही आज़ादी के बाद उनका गांधी अंत्योदय और सत्याग्रह की परंपरा से कोई संपर्क रहा। अलबत्ता 1955 के बाद समाजवादियों की अलग पहचान बनाने की कोशिश में डॉ. राममनोहर लोहिया ने जाति के सवाल को तीखे ढंग से उठाया। उऩ्होंने विशेष अवसर के सिद्धांत का विस्तार दस्तकार जातियों, किसान जातियों अन्य पिछड़े वर्गों के लिए भी किया। उनके विशेष अवसर के सिद्धांत की विशेषता यह थी कि उसमें जाति के साथ-साथ इसकी भी पहचान थी कि जाति और स्त्री-पुरुष भेदभाव के कटघरे किस तरह से एक-दूसरे को पुष्ट करते हैं। उसमें स्त्रियों के लिए आरक्षण की बात भी की गई थी, अल्पसंख्यक और दस्तकार जातियों के लिए भी आरक्षण की बात की गई थी। दलित, पिछड़े, मुसलमान, आदिवासी और महिलाओं के साझे संघर्ष से सामाजिक क्रांति की कल्पना की गई थी। कई तरह के पड़ावों से गुजरती हुई समाजवादियों की सक्रियता के कारण 7 अगस्त 1990 को विश्वनाथ प्रताप सिंह को मंडल आयोग की सिफारिशें माननी पड़ीं। लेकिन दुर्भाग्य से उस समय के राजनैतिक नेतृत्व ने मंडल आयोग को ‘जाति तोड़ो’का औज़ार न बनाकर, सामाजिक लोकतन्त्र लाने का औज़ार न बनाकर, उसको अस्मितावाद का एक औज़ार बना दिया। (उस समय के पिछड़े नेतृत्व की यह रणनीति रही कि) आप दलित और पिछडे़ के लिए लोक लुभावन भाषा में बात करें, जो अब तक की उनकी दलित या पिछड़ा होने की जो पीड़ा रही है उसको एक ही भाषा में मुखरित करें जिससे वो आपको अपने बीच का आदमी मान लेंगे।  (यह पिछड़े नेतृत्व की कमी रही कि उसने) समाज में अगड़ी जाति के गरीब और प्रगतिशील लोगों को साथ लेकर जिन्होंने मण्डल आंदोलन के दौरान उदारता दिखाई और संघर्ष में साथ दिया, ऐसे लोगों को साथ लेकर     दलित और पिछड़े नेतृत्व को खड़ा करने का काम भारत के मंडलवादी दलितों ने और पिछड़ों ने नहीं किया।  बल्कि तमाम महत्वपूर्ण पिछड़े नेता दलितों से भी सत्ता को परिवर्तन के लिए चलाने के लिए कोई साझा रणकौशल भी वह नहीं बना पाए।

इसका परिणाम यह हुआ कि अगड़ी जातियों ने जितनी सत्ता खोई नहीं, उससे ज्यादा उनको उसका भय लगने लगा। उनमें एक तरह की प्रतिक्रिया पनपी और अगड़ी जातियों का एक बड़ा हिस्सा हिन्दू अस्मितावाद के चक्कर में पड़ गया। कई तरह की अंतर्राष्ट्रीय ताकतों ने भी इस हिन्दू अस्मितावाद को बढ़ावा दिया जिसमें व्यवस्था परिवर्तन का, समाज के ढांचे को बुनियादी रुप से बदलने का सवाल न हो। आज की राजनीति के मुहावरे में सामाजिक क्रांति की बात होती है लेकिन उसमें क्रांति का तत्व ही गायब है। जाति या संप्रदाय की पहचान पर लोगों को जुटा सकने की क्षमता से एक दूसरा बड़ा नुकसान यह हुआ है कि इससे राजनीति में अब भ्रष्टाचार और नैतिकता के सवालों को उठाना मुश्किल हो गया है। इसका ब्राह्मणवादी ताकतों ने पुरज़ोर ढंग से लाभ उठाया है। इस तरह ऐसा वातावरण बना दिया गया है कि पिछड़ा और दलित नेतृत्व भ्रष्ट है। इस वातावरण के कारण मौजूदा राजग सरकार सुखराम जैसे तमाम भ्रष्ट कांग्रेसियों को साथ लेकर चलने की निर्लज्ज प्रदर्शन कर पाती है।

    सत्ता मद में पागल दलित और पिछड़ों का एक हिस्सा भी ब्राह्मणवाद से एक संधि करके चल रहा है। इससे राजनीति में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने का संकल्प आज देश के अभिजन और मध्यम वर्ग में नहीं दिख रहा। और अगर तंत्र भ्रष्ट होगा, अगर कानून का राज नहीं होगा, तो सब से ज्यादा नुकसान, स्वाभाविक है कि गरीब दबे, कुचले और वंचित वर्गों को होगा।

    लोकतंत्र की दूसरी बड़ी त्रासदी के बारे में इस अंक में लगभग चर्चा नहीं है। हम लोग मानते हैं कि समाजवादी आंदोलन का बिखरना और उसके बिखरने के कारणों की एक साझी समझ होनी जरुरी है। समाज की क्रांति के लिए संगठन के मोर्चे पर लगभग संपूर्ण असफलता एक पहेली भी है और त्रासदी भी, जिसके बारे में लोकतंत्र पर विचार करते हुए आवश्यक रुप से विचार होना चाहिए। समाजवादी चेतना या समाजवादी मुद्दों के लिए सामाजिक सक्रिताएं तो मिल जाएंगी लेकिन एक समग्र समाजवादी विचार के आधार पर एक समग्र किस्म का राजनैतिक औज़ार इस समाज में नहीं है। एक समाजवादी दल था जो लोकतंत्र के अतिवाद को मानता था। लेकिन स्तालिनवाद की प्रतिक्रिया में लगभग अराजकतावाद के वैचारिक रुझानों को अपने में आत्मसात करने के कारण ही शायद यह हुआ कि आज समाजवादी संगठन नाम की कोई चीज़ नहीं रही। स्थानाभाव के कारण हम अपने फलक को इतना नहीं विस्तृत कर सकते थे लेकिन इस अंक में मैं नेतृत्व की अवधारणा के बारे में लोहिया जी की एक टिप्पणी जरुर दर्ज कराना चाहूंगा कि “भविष्य में आने वाला नेतृत्व राष्ट्रीय स्तर का नहीं होगा। अब हमारा समाज जो नेता पैदा करेगा, वह गांव का होगा, जिले का होगा।” मुझे लगता है कि यह भविष्यवाणी सच हो गई है।

    जिनके सरोकार राष्ट्रीय हैं, जिनका नज़रिया राष्ट्रीय है, उनको अपनी संगठन-दृष्टि और संगठन-शास्त्र ऐसे विकसित करना होगें जिनमें भारतीय मनीषा का इस्तेमाल किया जा सके। मैं इस बात का खुलासा दो शब्दों को व्यवहार से स्पष्ट करना चाहूंगा। भारतीय भाषाओं में ‘जाति’ का दो अर्थों में इस्तेमाल किया जाता है। एक तो कुल से थोड़ा सा विस्तृत जो दायरा है, (गोत्र के बाद का) — उसको भी हम जाति कहते हैं; और दूसरी ओर यह और विस्तृत अर्थ में प्रयोग होता है, यानि ब्राह्मण वर्ण भी जाति है, मानव जाति भी जाति है। हमारी कौमियत यानि भारतीय होना भी एक जाति है। एक ही शब्द अलग संदर्भों में अलग-अलग स्तरों पर और जागतिक स्तर तक इस्तेमाल किया जाता है। ठीक उसी तरह से राष्ट्रीयता को हम देख सकते हैं। हमने राष्ट्र, राष्ट्रीयता को, देशभक्ति को भूगोल में नहीं बाँधा है, उसमें एक अलग किस्म का लचीलापन है। ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का वाक्यांश हर किसी ने सुना होगा। इसका अर्थ सिर्फ यह नही है कि पूरी वसुधा कुटुंब की भाँति है। इसका अर्थ यह भी है कि कुटंब में भी संगठन के वो सब सिद्धांत और नियम प्रतिबिम्बित होते है, अंतर्निहित होते हैं, जो पूरी वसुधा में है। यानी कुटुंब भी वसुधा का बिम्ब है और स्थानीयता, राष्ट्रीयता और अंतर्राष्ट्रीयता इनके बीच में कोई द्वैत नहीं है। ये अलग अलग संदर्भों में जि़दगी की असलियत के अलग-अलग पहलू हैं। चरखा तो एक स्थानीय और गांव की चीज थी लेकिन वह राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक बना। इसी तरह से अपन देश शब्द का व्यवहार लें। देश दस बीस गांवों की सीमाओं से परे जाने वाले को भी कहा जाता था कि वह व्यक्ति परदेस गया है और दूसरे देश में जाने वाला भी परदेस है। आज तीसरी दुनिया के देशों के खिलाफ अंध अस्मितावाद का एक षड़यंत्र चल रहा है। ऐसा माहौल खड़ा किया जा रहा है जिसमें गांव देहात का, जिले का जो नया नेतृत्व खड़ा हुआ है उसको मुद्दों पर लड़ने के बजाय अस्मितावादी संघर्ष में फंसा दिया जाए। अमरीकी समाजशास्त्री सैमुअल हंटिंगटन ने ‘क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन’ नामक पुस्तक में विभिन्न संस्कृतियों के बीच अस्मिता के संघर्ष को अपरिहार्य बताया है।

जैसी हमने चर्चा की है कि हर स्तर पर लोकतंत्र की बाढ़ आयी है और इससे नेता अर्थात सक्रिय कर्मी निकलेंगे जो अपने परिवेश को बेहतर बनाना चाहते हैं। परन्तु ऐसे लोग बेहतर समाज के लिए संगठन वगैरह कुछ कर नहीं सकते है। जरुरत इस बात की है कि ऐसे लोगों को अभिव्यक्ति का मौका देने के लिए एक संगठन तंत्र हो। ऐसा तंत्र जिसको अंग्रेजी वाले ‘ओपन एंडेड’ कहते है। शुरु से ही वह ऐसा हो जिसमें मानवीय, लोकतांत्रिक मूल्य, समता का, लोक-भागीदारी के स्पष्ट अहसास हों। ऐसा तंत्र गढ़ने के लिए एक नए प्रकार के संगठन की जरुरत है। इस नए प्रकार के संगठन के केवल पश्चिम से ली गई उदार अवधारणाओं, प्रयोगों और अनुभवों के आधार पर नहीं खड़ा किया जा सकता। ऐसे संगठन को भारतीय स्मृतियों, अनुभवों और भारतीय सांस्कृतिक-सामाजिक जरुरतों के अनुरुप ही गढ़ना होगा। उसके लिए चेतना का जो औपनिवेशीकरण हो गया है उससे लड़ना होगा।

हम लोग कई बार अपनी बनी-बनायी धारणाओं के इतने गुलाम हो जाते हैं कि सोचने का भी जोखिम नहीं उठाना चाहते। दलों का स्वास्थ्य आज खराब है तो उसके क्या ऐतिहासिक प्रक्रियागत कारण हैं इस पर अकसर विचार नहीं होता है। क्या अपने आप में चुनावी मशीन, रचनात्मक काम एवं संघर्ष का औज़ार एक साथ बन सकते हैं? या हमें राजनैतिक हस्तक्षेप के लिए संगठन पर फिर से सोचना होगा? अगर ऐसा हुआ तो आंदोलन समूहों को एक होना पड़ेगा, आंदोलन समूहों को अलोकप्रिय बातें भी कहनी होंगी। इतना संकल्प, सृजनशीलता और कल्पनाशीलता लोकतांत्रिक आंदोलनों में नहीं दिखती। लोकतांत्रिक संगठनों की यह विडंबना ही कही जाएगी कि जितने दल दिखते हैं, उनमें अंदरुनी लोकतंत्र का अभाव है। तीसरी शक्ति के अधिकांश दल कुछ जाति समूहों के कोएलिशन जैसे जमावड़े दिखते हैं। कांग्रेस नेहरु खानदान के आभामंडल के आधार पर अपने को खड़ा करना चाहती है, मुद्दों या संघर्ष के आधार पर नहीं।

    भाजपा संघ के मेहनती कार्यकर्ताओं की बुनियाद पर खड़ी है और संघ ही उसको निर्णायक रुप से नियंत्रित करता है। जो मुद्दे भाजपा ने बतौर भा.ज.पा. उठाए थे, चाहे वो शुचिता का, पारदर्शिता भ्रष्टाचार-मुक्त समाज देने का हो या भय-मुक्त समाज देने के हो भा.ज.पा. उसके ठीक उल्टा व्यवहार कर रही है। नारा स्वदेशी का और काम देश को बेचने का। इस विसंगति के बावजूद देश के व्यापक असंतोष को समेटने वाली कोई राजनैतिक ताकत नज़र नहीं आ रही।

लोकतंत्र के विमर्श में इसके कारणों में जाना होगा। आज की तारीख में जो दल का भांति संगठित लगते भाकपा, माकपा और भाकपा (माले) हैं सब के सब लोकतांत्रिक केन्द्रीयवाद को मानते हैं। दूसरी ओर भाजपा एक संगठित दल जैसा लगता है हालांकि अब उसमें आपसी झगड़े कांग्रेस से भी बड़े पैमाने पर होने लगे हैं। लेकिन उसके भी अधिकांश नेता ‘एक चालकानुवृत्ति’ के सिद्धांत को ठीक मानते हैं। उसके काफी महत्वपूर्ण पदों पर आसीन नेताओं के साथ जेल में रहने का मौका मुझे मिला है और वहां मैंने पाया है वे वो इमरजेंसी को कोई बहुत गलत चीज नहीं मानते थे। उनमें से कइयों का यह कहना था अगर सत्ता में होते और इस तरह का आहवान किया जाता है कि ‘सेना और पुलिस’ गलत कानून को न माने तो शायद वे भी यही करते। इसलिए यह भी लोकतंत्र की एक विडंबना ही कही जाएगी कि जो आंदोलन लोकतंत्र के लिए आज़ादी के बाद सबसे ज्यादा सक्रिय रहा यानि समाजवादी आंदोलन – उसके दल आज सिरे से ही राजनैतिक पटल पर नदारद है। जो लोग लोकतंत्र को नहीं मानते उनके ढांचे अपने अलोकतांत्रिक सिद्धांतों के बावजूद, किसी न किसी अस्मितावादी सिद्धांत के सहारे टिके हैं। या फिर साम्यवादी अपने लोकतांत्रिक केन्द्रीयतावाद के सहारे टिके हैं। दरअसल समाजवादियों का जो संकट है वही सांगठनिक स्तर पर लोकतंत्र का भी संकट है। यदि हम लोकतांत्रिक राजनैतिक दल संगठित नहीं कर पाए तो फिर लोकतंत्र को कैसे बचा पाएंगे?

राजनीति व दलों की दयनीय हालत की चर्चा होती भी है तो केवल टुकड़ों में व्यक्तिवाद, जातिवाद, वंशवाद, राजनीति के अपराधीकरण, नेताओं के भ्रष्टाचार की बातें होती हैं, लेकिन इन सब मुद्दों का आपसी संबंध क्या है, इस पर अकसर बात नहीं होती। हम चाहेंगे कि लोकतंत्र के दिशा संकेतों के बारे में एक मोटा-मोटी समग्र किस्म की सफाई कार्यकर्ताओं के दिमाग में हो। लोकतंत्र के मुद्दों पर संघर्षरत कार्यकर्ताओं में सहमतियां क्या है, हमारी असहमतियों के बिन्दु क्या हैं इसकी अगर पहचान हो जाएगी तो लोकतंत्र पर ईमानदार संवाद का एक राष्ट्रीय तंत्र खड़ा हो जाएगा। उसी तंत्र के समानांतर राष्ट्र की पीड़ा को समझने वाला एक संवेदन तंत्र भी खड़ा होगा और हममें से इतिहास को आगे ले जाने वाली जो सामाजिक शक्तियां होगी, जो तबके होंगे, वो अपने आप को राजनैतिक रूप में संगठित कर पाएंगे। विचार का संबल उनके साथ होगा, लोकतंत्र का आदर्शवाद उनके साथ होगा, और इस देश को गरीबी से, भुखमरी से. तंगहाली और बदहाली से, मुक्ति दिलाने का सपना होगा। लोकतंत्र के मायने तभी हैं जब लोकप्रियवाद के बहाने से, लोकतंत्र का संभ्रम न फैलाया जाए बल्कि लोक को वास्तव में उसकी शक्ति, उसकी सार्वभौमिकता लौटा दी जाए। इसी उम्मीद के साथ यह अंक लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्ध सभी कार्यकर्ताओं को समर्पित है।

*विद्यार्थी-काल से ही राजनीति में सक्रिय विजय प्रताप, पिछले पाँच दशकों से देश की लोकतान्त्रिक समाजवादी धारा से सम्बद्ध रहे हैं। 1975 में जब दिल्ली स्कूल ऑफ इक्नोमिक्स में समाज शास्त्र के विद्यार्थी थे तो आपात काल में 19 महीने के लिए जेल में रहे। जेल से छूटने पर देश के प्रमुख बुद्धिजीवियों और सक्रियकर्मियों के बीच सेतु का काम किया और प्रसिद्ध समाजशास्त्री रजनी कोठारी एवं अन्य लोगों के साथ लोकायन की स्थापना की। फिर 1998 में वसुधेव कुटुंबकम की स्थापना की और तदुपरान्त ‘हेलसिंकी प्रोसैस’ से जुड़े। इन्हीं प्रक्रियायों को आगे बढ़ाते हुए भारत में वर्ल्ड सोशल फ़ोरम को लाने में हिस्सेदारी की और फिर साउथ एशियन डायलॉगज़ ऑन इकोलोजिकल डेमोक्रेसी (SADED) (हरित स्वराज संवाद) की स्थापना की। लोकायन की हिन्दी पत्रिका के संपादक और अंग्रेज़ी पत्रिका के संयुक्त संपादक रहे।  बीच-बीच में अखबारों-पत्रिकाओं में लेख भी लिखे और सिविल सोसाइटी के परिप्रेक्ष्य से लोकतन्त्र पर तीन पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं।  

डिस्क्लेमर : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं और इस वैबसाइट का उनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। यह वैबसाइट लेख में व्यक्त विचारों/सूचनाओं की सच्चाई, तथ्यपरकता और व्यवहारिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।

भारत में लोकतन्त्र पर विजय प्रताप का एक और पुराना दस्तावेज़ भी उपलब्ध है –

“लोकतंत्र बचाने के लिए राजनीतिक कार्यकर्ता दलों से जुड़ें”

इसी वेब पत्रिका में लोकतन्त्र पर कुछ अन्य लेख भी देख सकते हैं:

क्या भारतीय लोकतन्त्र कमज़ोर हो रहा है?

लोकतन्त्र का संरक्षण कैसे हो?

राजनीति में हिस्सेदारी करें – वहाँ आपका इंतज़ार हो हा है

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