क्या आप को कंदूखेड़ा याद है?

राजेन्द्र भट्ट*

पंजाब विधान सभा ने केंद्र- शासित चंडीगढ़ को पंजाब को दिए जाने का प्रस्ताव एक बार फिर पास कर दिया है। शुभकामना है कि यह एक गंभीर अभियान बने फिलहाल तो यही लगता है कि भारत सरकार ने केन्द्रीय सेवाओं वाले कानून चंडीगढ़ प्रशासन पर भी लागू होने, और इससे पहले भाखड़ा-ब्यास मैनेजमेंट बोर्ड में भी ‘बाहर से’  नियुक्तियां कर सकने की जो चुटकियाँ पंजाब में नई-नवेली सरकार को काटी थीं, उसके जवाब में प्रदेश सरकार द्वारा ये थप्पड़ दिखाया गया है।

इस लेख का मुद्दा भी ‘थप्पड़-चुटकी’ की अगंभीर राजनीति करते हुए, मुद्दों की गहराई में बिना जाए-बिना सुलझाए – तुरत-फुरत ‘चांदी काट लेने’ का ‘एड-होकिज़्म’ का है लेकिन पहले पृष्ठभूमि।

पंजाब देश का वह सूबा है जिसके दिल, दिमाग, जिस्म, चूल्हे, खेत-खलिहान, शहर-चौबारे- और गौरव – सबसे ज्यादा लहूलुहान होते रहे हैं। ( ये ‘की-वर्ड्स’ हैं – थोड़ा सोचें  तो तस्वीरें आपके सामने आ जाएंगी।) 1980 के आसपास दिल्ली के एक बस स्टॉप पर मुझे एक सरदारजी मिले थे – थोड़ा गुरु साहबान की छवि, थोड़ा राँझा और थोड़ा लोहड़ी वाले दुल्ला भट्टी। विभाजन की बात चली तो बेसाख्ता बोले – लाहौर बड़ा बांका शहर था जी। विभाजन के पंजाबी दर्द को, दिल-दिमाग-जिस्म-चूल्हे-चौबारे के चिर जाने के अहसास को उन बुजुर्ग के उस वाक्य में समेटता हूँ।

आग बढ़ें। शिमला भारत के पंजाब की राजधानी बना। लाहौर खो जाने के दर्द पर मरहम लगाने के लिए शिवालिक पहाड़ियों की छांव में मनोरम, आधुनिक चंडीगढ़ बना – नेहरू जी के उदात्त विजन के अनुरूप। 1953 में पंजाब को यह नई राजधानी मिल गई, जिसका उदघाटन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने 7 अक्तूबर 1953 को किया।

पंजाब फिर टूटा। 1 नवंबर 1956 को उत्तर-पूर्वी पहाड़ी हिस्सा केंद्र-शासित हिमाचल प्रदेश बना जो बाद में पूर्ण राज्य बन गया। 1966 में पंजाब का फिर पुनर्गठन हुआ – कुछ और पहाड़ी हिस्से हिमाचल प्रदेश में गए और हिन्दी-भाषी हरियाणा राज्य बना। चंडीगढ़ ‘अस्थायी रूप से’ केंद्र-शासित क्षेत्र और पंजाब -हरियाणा – दोनों की ‘फिलहाल’ राजधानी बन गया।

चंडीगढ़ पूरी तरह पंजाब को देने की मांग ज़ोर पकड़ती रही। वैसे भी, किसी राज्य के विभाजन  के बाद उसमें से नया राज्य निकलने पर राजधानी तो पुराने ‘पेरेंट’ राज्य के पास ही रहती है। नया राज्य नई राजधानी बनाता है। उत्तराखंड, बिहार, छतीसगढ़ – सभी जगह यही परिपाटी रही। और चंडीगढ़ तो भारत के पंजाब के लिए, एक तरह से ‘जख्म पर मलहम’ जैसा था।

लेकिन तुरंत ऐसा नहीं हुआ, न कोई तेज हरकत नज़र आई। नतीजा – सभी तरफ भाषा, धर्म की आग भड़की-भड़काई गई। पंजाबी सूबा आंदोलन के संत फतेहसिंह ने आत्म-दाह की धमकी दी।

बहरहाल, जनवरी 1970 में केंद्र सरकार ने साफ-साफ घोषणा की कि चंडीगढ़ पंजाब को ही मिलेगा। हरियाणा को नई राजधानी बनाने के लिए 10 करोड़ का अनुदान और इतनी ही रकम का कर्ज देने की घोषणा हुई। हरियाणा को पाँच साल में अपनी राजधानी बना लेने को कहा गया। तब तक चंडीगढ़ से ही उसे प्रशासन चलना था।

पर पाँच साल में न हरियाणा की नई राजधानी बनी, न पंजाब को पूरी तरह चंडीगढ़ मिला। ( राजनीति पर, केवल कहानी को स्वरूप देने के लिए थोड़ी चर्चा करेंगे।) मुद्दे के ‘जिंदा’ रहने से कांग्रेस, अकाली, जनसंघ, आर्य समाज, बड़े  किसानों की  लॉबी और शहर-कस्बों के  ‘महाशयों’ को अपने-अपने चूल्हे सुलगाने और देश के छप्पर  पर चिंगारियाँ फेंकने के मौके मिले। इस बीच, 1975 में सिख पंथ की  अस्मिता को लेकर आनंदपुर  साहब प्रस्ताव आए, जिसका एक बड़ा कारक  चंडीगढ़ पंजाब को देने में  उदासीनता, आलस्य, चालाकी और राजनीति थी। विस्तार और ‘तुम्हारी कमीज़ मेरे जैसी गंदी है’ के तर्क में न जा कर, 1981 की जनगणना से पहले, दिल्ली में लगे पोस्टरों में की जा रही एक ‘अपील’ याद आती है, “अपनी पहली भाषा हिन्दी लिखाएँ, दूसरी भाषा संस्कृत लिखाएँ।‘ ( मतलब, पंजाबी न लिखाएँ – जाहिर है, हीर-रांझा और ‘उसने कहा था’ कहानी के इलाके के वारिस,  अपील करने वाले महाशय घर में संस्कृत बोलते होंगे!)

इसके बाद, पंजाब आतंकवाद की आग में एक दशक तक बर्बाद रहा। इसके विस्तार में जाने पर खूब जहर की उल्टियाँ की जा सकती हैं। पर उससे बदबू ही फैलेगी। घटना-क्रम को सभी जानते हैं। बस इतना ही, कि शुरू में राजनीति के सभी खिलाड़ियों को यह सेंकने वाली मीठी- मीठी आग लगी थी। बाद में, उसमें सभी जले।

इस आग पर काबू पाने में, देश की एक प्रधानमंत्री को शहादत देनी पड़ी। उसके बाद, मैंने अपने स्मृति-काल में पहली बार देखा कि, 1984 में  अब तक के सबसे प्रचंड बहुमत से जीते  प्रधानमंत्री ने, उन्माद और बड़बोलेपन के उलट, सौम्यता की भाषा और नीति अपनाई और पंजाब और असम में, पीड़ित  ( या खुद को पीड़ित मान रहे ) पक्षों से बराबरी और संवेदना के स्तर पर बात की, समझौते किए; यहाँ तक कि उनको राज्यों में सत्ता मिलने को भी किसी लोकतान्त्रिक ‘स्टेट्समैन’ की गरिमा से स्वीकारा।

जनवरी 1985 में फिर चंडीगढ़ का मसला उठा। मैथ्यू आयोग ने फिर चंडीगढ़ पंजाब को देने के वादे की पुष्टि की पर एक शर्त जुड़ गई कि पंजाब के अबोहर-फाजिल्का के हिन्दीभाषी इलाके हरियाणा को दिए जाएँ। यहाँ एक पेंच फंस गया। ये इलाके हरियाणा से जुड़े नहीं थे – बीच में पंजाब के इलाके आ जाते थे। तभी कंदूखेड़ा गाँव खबरों में आया – मुक्तसर जिले का वो गाँव जो अबोहर-फाजिल्का को हरियाणा से जोड़ देता था। अगर वह हरियाणा को मिल जाता तो अबोहर-फाजिल्का हरियाणा की सीमाओं में सिमट पाता। अगले चरण में, चंडीगढ़ पंजाब को मिल सकता था।

बात आसान थी, पर अपनी राजनीति में ‘राजनीतिज्ञ (‘स्टेट्समैन’) तो कम ही होते जा रहे हैं न! तिकड़मी  राजनीतिबाजों  का ज़माना जो है। राजनीतिज्ञ होते तो खुद विवेक के और देश को बचाने, आग बुझाने के काम करते – अपनी जनता को भी विवेकशील, सौम्य बनाते। पर आग की आंच बनी रहे, तभी  तो राजनीति की रोटियाँ सिंकती हैं। भले ही, आग फैलने पर कोई भी न बचे।

 बहरहाल, कहा गया कि कंदूखेड़ा में जनमत-संग्रह हो कि वहाँ के लोग  पंजाबीभाषी हैं या हिंदीभाषी। अगर पंजाबीभाषी होंगे तो हरियाणा जैसे ‘पराये देश’ में कैसे जा सकते हैं! आखिर इसी सद्भावपूर्ण लोकतन्त्र के लिए तो हमारे महान नेताओं ने बलिदान किए थे! बहरहाल, कंदूखेड़ा में राजनीतिबाजों के तम्बू सज गए। लोगों से लुभावने वादे किए गए।  कंदूखेड़ा के 91 प्रतिशत लोगों ने खुद को पंजाबीभाषी बताया। चंडीगढ़  का मुद्दा अटक गया। मुझे नेट पर इंडिया टुडे पत्रिका की 15 फरवरी 1986 की  जीवंत रिपोर्ट (यहाँ देखें) मिली है जिसमें केंद्र सरकार की डाँठ-डपट पर पंजाब-हरियाणा के मुख्यमंत्रियों की वार्ता, उनकी राजनैतिक निराशा और अपनी-अपनी जनता को ‘उन्माद मोड में रखने  के दांव-पेंचों का दिलचस्प विवरण है। एक को जनता को यह बताना है कि उसने चंडीगढ़ जाने से बचा लिया, दूसरे को बताना है कि उसने अबोहर-फाजिल्का बचा लिया। देश के लोगों के लिए वैमनस्य का नासूर बना रहा। देश की, ‘जन’ की तकलीफ़ें ‘तंत्र’ की कामयाबियाँ हैं। ऐसा लगता है जैसे  शत्रु देशों के बीच वार्ता हो रही हो।

ताकि सनद रहे, पंजाब को चंडीगढ़ देने का प्रस्ताव पंजाब की विधानसभाएँ, इससे पहले 6 बार पास कर चुकी हैं। पहली बार 1967 में, ऐसा प्रस्ताव पास हुआ था। मतलब, चंडीगढ़ पंजाब को मिले, न मिले – ‘टेम्पो’ तो बना हुआ है। 

तो मुद्दे की पृष्ठभूमि यहीं खत्म होती है। आम आदमी के ‘कॉमन सेंस’ के हिसाब से सरल से मुद्दे से जुड़े सवाल/ निहितार्थ/ समाधान हैं।  ये  इतने उलझे क्यों हैं – ये सोचना है। तभी शायद सुलझेंगे।

एक, क्या हमारी राजनीति, हमारे नेता जान-बूझ के, खास तौर से भावनात्मक मुद्दों  को तब तक उलझाते हैं, उनसे उन्माद पै दा करते हैं, आग लगाते हैं – जब तक उनसे लोग भड़कते रहें। मतलब जान-बूझ कर फ्यूज़- कनेक्शन तब तक ठीक नहीं किए जाते, जब तक आग न लग जाए।

दो, सरल समाधान वाले भावनात्मक  मुद्दों को तुरंत सुलझा देने से एक अच्छे शासन-प्रशासन को लोगों की रोजी-रोटी, शिक्षा-संस्कृति-स्वास्थ्य जैसे बड़े कामों के लिए ज्यादा  वक्त और ऊर्जा मिल सकती है। अगर सत्ताधारी ऐसा नहीं करते तो इसका मतलब यही हुआ कि उनकी ‘सबका साथ-सबका विकास-सबका विश्वास’ में कोई दिलचस्पी नहीं है। वे केवल अज्ञान, उन्माद और नफरत की दुकान चलते हैं।

तीन, फ्यूज़- कनेक्शन ठीक न करने के बाद, अगर आग बेकाबू हो जाए और सत्ता से जुड़े लोगों को ही जलाने लगे तो दमकल गाडियाँ बुझा कर आग बुझाई जाती है जैसा पंजाब के आतंकवाद को समाप्त करने में सत्ता ने किया। लेकिन जब आग बुझ जाती है  तो शांति और फुर्सत के दौर में, जब उन  फ्यूज़- कनेक्शनों को आराम से ठीक किया जा सकता है, तब उस काम को पूरी तरह भुला दिया जाया जाता है  और आगे आग लगने तथा फायर ब्रिगेड बुलाने का इंतज़ार किया जाता है।  जैसे 35 साल से मैथ्यू कमीशन, अबोहर-फाजिल्का- कंदूखेड़ा भूले हुए हैं। अचानक, पूरी बेहयाई से वह सब एक बार फिर ‘जनरल नॉलेज’ की किताबों और फाइलों में आ जाएगा। विशेषज्ञ लेख लिखेंगे – पैसे पाएंगे।

चार, ये सवाल मेरे-आपके  जैसे  – सुबह चाय के साथ अखबार पढ़ने ( चाहे मोबाइल में ही सही) वाले मध्यवर्गीय समाज के लिए है। क्या हम कभी 40-50 साल पीछे जा कर चीजों को समझने की कोशिश करते हैं? यहाँ मैं, व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के फटाफट ज्ञानियों-उन्मादियों की बात नहीं कर रहा हूँ। थोड़ा  ज्यादा संजीदा पढे-लिखों की बात कर रहा हूँ। क्या आप भी खबरों को चाय के साथ की दालमोठ-मठरी मान कर ‘समझ’ लेते हैं, राय बना लेते हैं,संतुष्ट हो जाते हैं? मतलब, क्या आप को कंदूखेड़ा के बारे में पता  है? या उसकी याद है? व्हाट्सएप और कालिया नाग की तरह हज़ार फनों वाले ट्रोल मेसेजेज़ से पैदा हो रहे अज्ञान-उन्माद के दौर में – किसी मुद्दे की पूरी पृष्ठभूमि को समझना, उसके मानवीय पक्षों को समझना –  और ज्यादा से ज्यादा लोगों को समझाना क्या हमारा काम नहीं है? मसलन, क्या ‘लाहौर बांका शहर था’ वाले बुजुर्ग की थाती से लेकर – पंजाब के दर्द, दर्द की राजनीति, कंदूखेड़ा का रोड़ा – ये सब हमें पूरी संजीदगी से जानना-जीना नहीं चाहिए? फिर इस मुद्दे को वाकई सुलझाने के लिए नेताओं-अफसरों को मजबूर करने में क्या कुछ  योगदान हम भी कर सकते हैं?  इस लेख को पढ़ कर सोचिए तो। बातें जो कंदूखेड़ा पर चार दशक से अटक गई हैं, आगे समाधान की दिशा में बढ़ें तो।

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*लंबे समय तक सम्पादन और जन-संचार से जुड़े रहे राजेन्द्र भट्ट अब स्वतंत्र लेखन करते हैं

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1 COMMENT

  1. भई मान गए, सटीक विश्लेषण है, एक
    जटिल मुद्दे का. विडम्बना है यह.
    एक स्थिति जो है पर होनी नहीं चाहिए.
    लेख में व्यक्त विचारों से सहमत हूं.

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