कश्मीरी छात्रों को आतंकवाद के रास्ते से बचाना होगा

आज की बात

पुलवामा में हमारे 41 जाँबाज सिपाहियों की शहादत के बाद आजकल देश में भावनाओं का एक तरह से ज्वार जैसा आया हुआ है। व्हाट्सएप्प से लेकर टिवीटर तक और फेसबुक से लेकर इंसटाग्राम तक – सभी सोशल मीडिया के साधनों पर लोग गुस्से और क्षोभ से भरे हैं।  

ये कुछ अस्वाभाविक भी नहीं है। गुस्सा और देश-भक्ति का इज़हार दोनों ही जायज़ हैं। लेकिन जहां एक तरफ लोग दुख से भरे हैं और सीमा पार से आतंकवाद को बढ़ावा देने की कार्यवाही के लिए पाकिस्तान को सबक सिखाना चाहते हैं, वहीं कुछ गिने-चुने लोग इस हादसे के बाद कश्मीर से उनके शहरों में पढ़ने के लिए आए हुए कश्मीरी छात्रों के ही खिलाफ हो गए हैं।

यह सही हो सकता है कि इन हज़ारों कश्मीरी छात्रों में से एक-आध या दो-चार ने मूर्खतावश कोई असंवेदनशील पोस्ट डाली हो या कोई दूसरी वैसी ही मूर्खता की हो किन्तु बजाय इसके कि उस तरह के इक्का-दुक्का मामलों को कानून के हवाले किया जाता, माहौल कुछ ऐसा बन गया है कि अपना घर छोड़ कर आए कश्मीरी छात्र दहशत में आ गए हैं और वापसी की टिकेट बुक करवा रहे हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की एक खबर के अनुसार अकेले देहरादून के शैक्षणिक संस्थानों में करीब 3000 कश्मीरी छात्र पढ़ रहे हैं जिनमें से बहुत से पिछले तीन दिनों में देहरादून छोड़ चुके हैं। हालांकि हो सकता है कि यह लिखे जाने तक बहुत से छात्रों ने अपना निर्णय बदल भी लिया हो और वह सामान्य रूप से कॉलेजों में जाने लगें लेकिन ऐसी खबरों से एकबारगी निराशा तो होती है। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार भीड़ ने शैक्षिक संस्थानों का घेराव कर के उनसे ये लिखित आश्वासन लिया है कि वो अगले शैक्षिक वर्ष से कश्मीरी छात्रों को दाखिला नहीं देंगे। इसी खबर में पुलिस का ये ब्यान भी है कि किसी से ये लिखित आश्वासन लेने में ज़बरदस्ती नहीं की गई है बल्कि बजरंग दल और कॉलेज प्रशासन के बीच आपसी बातचीत से ये हुआ है। (लिंक में पूरी खबर पढ़ सकते हैं।)

हमारी चिंता ये है कि किसी दबाव में आ कर अगर थोड़े-बहुत छात्र भी वापिस चले गए तो ये लोग वहाँ आतंकवादियों के निशाने पर आ जाएँगे जो इन्हें ढूंढ-ढूंढ कर अपने संगठनों में शामिल करना चाहेंगे। 1984 में सिक्ख-विरोधी हिंसात्मक दंगों के बाद कितने ही युवक आतंकवाद की राह पर चल पड़े थे। एक देश के इतिहास में पैंतीस वर्ष इतना भी लम्बा समय नहीं होता कि हम तब की घटनाओं से कोई सबक लेना भी भूल जाएँ।

यह बात सही है कि सौभाग्य से अभी तक कहीं से कश्मीरी छात्रों के विरुद्ध हिंसा की कोई खबरें नहीं आई हैं लेकिन किसी भी कारण से उनका बीच में पढ़ाई छोड़ कर वापिस कश्मीर जाना या अगले सेशन से कश्मीरी छात्रों को दाखिला ना मिलना उन्हें उस राह पर धकेल सकता है जिस पर ना वो जाना चाहते हैं और ना देश उन्हें भेजना चाहता है।

इसलिए हमें उम्मीद करनी चाहिए कि कहीं ना कहीं से कोई ऐसी आवाज़ आएगी जो उन छात्रों को आश्वस्त करेगी कि ये देश सभी के लिए समान रूप से सुरक्षित है। वैसे तो खबरों के अनुसार केंद्र सरकार की तरफ से सभी राज्य सरकारों को यह निर्देश दिया गया है कि वो जम्मू-कश्मीर के लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करें। इस निर्देश के बारे में गृह मंत्रालय के किसी अनाम अधिकारी ने बताया है, बेहतर होता कि यह बात बड़े नेताओं की तरफ से अपील के तौर पर आती।  

विद्या भूषण अरोरा

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