धर्म-चर्चा (एक)

धर्म पर तो सदियों से लिखा जा रहा है और यह स्तंभकार बिना गूगल की मदद के निश्चयपूर्वक ये कह सकता है कि जब से मानवता ने लिखना-पढ्ना सीखा है, या बल्कि उससे पहले यदि श्रुति-परंपरा के युग को भी जोड़ लिया जाये तो धर्म पर जितना कहा-सुना गया है, उतना किसी भी अन्य विषय पर नहीं! इसलिए यह लेख धर्म पर नहीं लिखा जा रहा बल्कि यह तो एक आक्षेप-पत्र है, एक तरह से धर्म के ही खिलाफ उसी से ही शिकायतें। दरअसल परंपरा तो यह है कि ऐसी शिकायतें आम तौर पर सरकार से की जाती हैं बल्कि कई बार तो कुछ लोग सरकारों के नाम खुले पत्र लिखते हैं जैसे प्रधान मंत्री के नाम खुला पत्र या गृह मंत्री के नाम खुला पत्र लेकिन आजकल माहौल कुछ ऐसा है कि शासकों के नाम खुले पत्र लिखने के अपने जोखिम हैं और हम उनसे बचना चाहते हैं, इसलिए हम धर्म से ही धर्म की चर्चा कर रहे हैं।

अणु-परमाणु या कोशिकाओं से जब भी कभी जीवधारी मानव बना होगा और जिस भी रूप में बना होगा, तभी से धर्म उसके साथ किसी ना किसी रूप में हैं। इसमें कोई शक नहीं कि धर्म के मूल में ही डर और असुरक्षा है और मानव अपने डर से निपटने के लिए ही धर्म की शरण में आता है। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि जीवन का मूल एक ही है और मानव उस मूल से छिटका हुआ ईगो या अहं का एक हिस्सा है, जो अपने मूल से छिटकने की गलती करने के बाद अब डर रहा है, इसलिए डरना और असुरक्षित महसूस करना तो मानव की नियति ही है। अपने आप में यह कितना बड़ा विरोधाभास है कि जिसका सृजन ही डर के कारण हुआ हो (यानि धर्म), हम उसी के पास अपने डर दूर करने जाते हैं।

धर्म डरे हुए मनुष्य की कैसे मदद करते हैं और कैसे उसके डर को दूर करते हैं, यह भी इस लेख का विषय नहीं है। इसके विपरीत हम तो कुछ ऐसे सवालों पर विचार करना चाहते हैं जो धर्म की भूमिका को लेकर हमारे सामने यक्ष प्रश्न बन कर खड़े हैं। सच बात ये है कि ऐसे प्रश्न भी हमेशा ही और हर युग में उठते रहे हैं लेकिन समय की आवश्यकता के अनुरूप उनका स्वरूप बदलता रहता है।  

उदाहरण के लिए हम ये याद दिलाना चाहते हैं कि मानवता के ज्ञात इतिहास में धर्म के नाम पर अगर हमेशा ही युद्ध होते रहे हैं जिनमें लाखों की संख्या में जानें जाती रही हैं तो इसका उल्टा भी हुआ ही है। धर्म के नाम पर शांति भी स्थापित हुई है, युद्धों की विभीषकाओं से थके-हारे इंसान को धर्म ने सहारा भी दिया है। महात्मा बुद्ध, भगवान महावीर और सम्राट अशोक से लेकर गांधी और मार्टिन लूथर किंग तक मानव इतिहास में बहुत सारे ऐसे महान संत हुए हैं जिन्होंने धर्म को नकारा नहीं बल्कि उन्होंने धर्म को प्रेम, भाईचारा और सद्भाव बढ़ाने के लिए अपना अस्त्र बनाया।

फिर इस देश से, जिस में बुद्ध, नानक और गांधी जैसे लोगों ने जन्म लिया, आखिर क्या गलती हुई कि आज हमें धर्म के लड़ाने वाले स्वरूप का सामना कर पड़ रहा है? हम बहुत चिंता से हाल की घटनाओं की तरफ देख रहे हैं जब हमारे देश के बहुसंख्यक धर्म के जुलूस (जिन्हें कुछ जगहों पर शोभा यात्राएं भी कहा गया है) नफरत और आपसी विद्वेष के कारण बन गए और सांप्रदायिक माहौल बिगड़ गया।

क्या हमें भगत सिंह के उस प्रसिद्ध निबंध (मैं नास्तिक क्यों हूँ) की तरफ देखना चाहिए जिसके अनुसार धर्म का आविष्कार शासक और शोषक-वर्ग ने किया ताकि भोले-भाले मेहनतकशों को बेवकूफ बना कर रखा जा सके? या फिर अभी भी हमें श्री आदि ग्रंथ साहिब में दी उस शिक्षा को याद करना चाहिए जिसमें बताया गया है – “अव्वल अल्लाह नूर उपाया कुदरत के सब बंदे, एक नूर ते सब जग उपजाया कौन भले को मंदे,”! अर्थात हम सब एक ही ईश्वर की संतान हैं और हम एक दूसरे से छोटे या बड़े नहीं हैं। इस शिक्षा की खासतौर पर याद आ रही है क्योंकि पिछले दिनों यहाँ-वहाँ श्री गुरु तेग बहादुर जी की 401वीं जयंती के संदर्भ में प्रधानमंत्री जी और गृह मंत्री जी की तस्वीरें और ब्यान नज़र आ रहे हैं। क्या ही अच्छा होता कि ये दोनों ही धर्म के सकारात्मक स्वरूप की चर्चा करते हुए पूरे देश को बताते कि देश में अगर सामाजिक सौहार्द नहीं होगा तो फिर उससे क्या-क्या नुकसान हो सकता है और कैसे देश के आर्थिक हित भी उससे प्रभावित होंगे।

धर्म क्या है और अधर्म क्या है? वैसे तो दुनिया के हर कोने में धर्म क्या है, इस पर बहुत अच्छे ढंग के सकारात्मक उत्तर मिल जाएँगे लेकिन इस प्रश्न को जितनी अच्छी तरह हमारे यहाँ (अर्थात भारतीय उपमहाद्वीप में) समझा जा सकता है, उतने अच्छे से शायद और कहीं नहीं। उसका कारण है कि हमारे पुरखों ने बहुत बुद्धिमत्तापूर्वक यहाँ हर धर्म को पनपने का अवसर दिया है और इसलिए हमें यहाँ उसके विभिन्न स्वरूपों से परिचय हो जाता है। यहाँ के बहुसंख्यकों के धर्म यानि हिन्दू धर्म की बात करें तो धर्म और अधर्म को पहचानने का काम और आसान हो जाता है। हमारे सभी पारंपरिक ग्रंथ जिनमें गंभीर आध्यात्मिक ग्रन्थों से लेकर लोक-ग्रन्थों तक में जगह जगह धर्म की चर्चा है यानि धर्म क्या है, इस सवाल पर गहन चर्चा है। अब चाहे वो उपनिषद हों या स्मृतियाँ, महाभारत हो या रामायण, पुराण हों या पंचतंत्र और या परम-पूजनीय गीता हो – हर स्थान पर धर्म और अधर्म की चर्चा है।

ज्ञान के इन स्रोतों के साथ हमने सदियाँ बिताई हैं और कोई हमलावर हमें इतना प्रताड़ित नहीं कर सका कि हम सामुदायिक तौर पर अपना धर्म छोड़ें। इसके विपरीत हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि हमने सभी आने वालों धर्मों का भी स्वागत किया, उनसे आदान-प्रदान हुआ और दोनों पक्ष एक-दूसरे से लाभान्वित हुए। स्वामी विवेकानन्द ने इस्लाम और हिन्दू धर्म के इस आपसी रिश्ते पर बहुत ही खूबसूरती से लिखा है और उनका यह कथन अगर आप इंटरनेट पर ढूंढें तो कई जगह मिल जाएगा – “हमारी मातृभूमि के लिए दो महान व्यवस्थाओं हिंदुत्व और इस्लाम का मिलन – जिसका दिमाग वेदांती हो और शरीर इस्लाम का एकमात्र उम्मीद की किरण है।‘ स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि मातृभूमि के उत्थान के लिए यही एक मात्र उम्मीद की किरण है। उपरोक्त बातें उन्होंने 10 जून 1898 को लिखे अपने एक पत्र में कहीं थीं जो अल्मोड़ा मे रह रहे अपने एक मुस्लिम मित्र को लिखा था।  

मूल प्रश्न पर वापिस आयें तो फिर यही पूछना होगा कि जब हमारे पास इतनी तरह का ज्ञान है, सैंकड़ों ग्रन्थों में हज़ारों ऋषि-मुनियों का दिया ज्ञान है कि मनुष्य-मनुष्य के बीच कोई भेद नहीं है, फिर हम असुरक्षित क्यों महसूस करने लगते हैं कि धर्म की कोई और शाखा हमें लील ना ले। इसकी कभी कोई संभावना नहीं थी, नहीं तो इतने बाहरी हमलावरों ने हमारे देश पर हमला किया और हमारे स्थानीय शासक अनेक युद्धों में पराजित होते रहे किन्तु स्थानीय धर्म, परम्पराएँ और रीतियाँ पराजित नहीं हुईं। यहाँ तक कि अगर हमारे समाज में कुछ विकृत परम्पराएँ भी पनप गईं थीं तो वह भी प्रभावित नहीं हुई। जी हाँ, हम जाति-प्रथा की ओर ही संकेत कर रहे हैं जिसे स्वामी विवेकानंद समेत भक्तिकाल के लगभग सभी संत नकार चुके थे लेकिन फिर भी उसकी मजबूती बनी रही। महात्मा गांधी और बाबा साहब अंबेडकर के अपने-अपने प्रयासों से जाति-प्रथा कुछ कमजोर अवश्य हुई है और उसके खिलाफ संवैधानिक व्यवस्थाएं भी हुई हैं लेकिन अभी भी जाति-प्रथा अपनी जगह कायम है।

ऐसे समाज को (जो अपनी बुराइयाँ भी खतम नहीं होने देता), यह डर पैदा हो भी कैसे सकता है कि उसके धर्म को कोई और धर्म लील लेगा? यह तो केवल एक राजनीतिक दांव है जिसे ऐसे लोग छोडना नहीं चाहते जिन्हें इस प्रकार का डर पैदा करके चुनाव में लाभ मिलता है। यह तो अब समाज को, इसके अलग-अलग वर्गों को समूह के तौर पर ये तय करना है कि क्या वह राजनीति के इसी गंदे खेल में फंसे रहेंगे या अपने-अपने असली धर्म को पहचानेगें जिनमें मनुष्यों-मनुष्यों के बीच भेद रखने को अधर्म माना गया है। उन्हें यह तय करना है कि उन्हें व्हाट्सएप्प पर आई बकवास पर विश्वास करके आपस में लड़ना है और धर्म के विरुद्ध आचरण करना है या फिर विवेकानंद, अंबेडकर, गांधी और गुरुनानक के सुझाए मार्ग पर चलना है। यदि देश और समाज को आगे ले जाना है तो हमें अपने यहाँ सौहार्दपूर्ण माहौल पुनः स्थापित करना होगा। समय-समय पर अर्थशास्त्रियों की इस आशय की चेतावनियाँ आती रहती हैं कि यदि सौहार्दपूर्ण वातावरन ना बना तो अर्थव्यवस्था की हालत और बिगड़ेगी और बेरोजगारी और महंगाई तो बेलगाम बढ़ेंगी ही और सरकार की कल्याणकारी योजनाएँ लागू करने की क्षमता भी छीजती जाएगी। देखना है कि धर्मों को आपस में लड़वाने वाले पहले थकेंगे या जनता स्वयम ही अपना हित समझेगी और धर्मों के नाम पर लड़ने का अधर्म छोड़ेगी! ये जितना जल्दी हो देश के लिए उतना अच्छा!

विद्या भूषण अरोड़ा

Vidya Bhushan Arora

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4 COMMENTS

  1. बहुत आत्मीय, सरल अंदाज़ में वह सब बताता लेख जिसे हम सब जानते हैं, पर अक्सर भूल जाते हैं।
    इतनी बड़ी, मार्मिक बातें, और इतनी सहज प्रस्तुति।

    अगले लेखों का इंतजार रहेगा।

  2. इस उदास समय मे गुमसुम समाज जब रात को रात कहने से डरता हो, ऐसे लेख अवश्य ही सुबह की उम्मीद को जिन्दा रखते हैं।

  3. सनातन धर्म का आदि ग्रंथ ऋग्वेद की एक ऋचा है …….
    “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोऽदब्धासो अपरितासउद्भिदः”
    अर्थात
    ” सभी दिशाओं से सद्विचार हमारे सामने आये ।”

    इतिहास के पन्ने सावधानी से पलटें तो एक बात उभरकर सामने आती है कि अधिकांश धर्म राजनीतिक समर्थन और सत्ता प्राप्त करने के हथियार के रूप में विभिन्न कालखंडों में उपयोग में लाये जाते रहे हैं । कुछ दार्शनिकों का तो यहां तक मानना है ये धर्म कुछ कल्ट जैसे स्वरूप में ही रह गए होते यदि उन्हें साम्राज्यवादी या राजनीतिक संरक्षण नहीं मिलता ।
    Love thy neighbour as thyself के नामपर दुनियां में जितने नरसंहार हुए हैं और हो रहे हैं वे धर्म के व्यवहारिक स्वरूप और असर के प्रति चिंता बढ़ाते हैं ।

    मैं तो ये विनम्र विचार रखने की इजाजत चाहूंगा कि जब कोई व्यक्ति किसी धर्म का ध्वज लहराता है उसी क्षण अन्य धर्मावलंबी का हृदय छलनी हो जाता है। उस ध्वज से ऊंचा ध्वज लहराने की आकांक्षा प्रबल हो जाती है। धर्म का व्यवहारिक स्वरूप यही है। बौद्धिक, धर्म की व्याख्या करते हुए हमेशा इस बात पर जोर देते रहे हैं कि सभी धर्म हमें प्रेम , सद्भाव और दया सिखाता है। लेकिन धर्मों से जुड़े प्रतिष्ठान जिनमें साम्राज्यवादी और राजनीतिक शक्तियां शातिर तरीके से शामिल हैं , आखिरकार अन्य धर्मों के अनुयायियों को अपने महान धर्म मे येन केन प्रकारेण शामिल करने का प्रयास क्यों करते हैं ।
    इसमें संदेह नहीं कि समाज की प्रगति और इसके बेहतर संचालन के लिए कुछ मूलभूत आम सहमति के सिद्धांत आवश्यक हैं अन्यथा एक अराजक स्थिति उत्पन्न हो सकती है । एक समय था कि तत्कालीन चिंतकों , समाजसेवियों ने परिस्थितियों को देखते हुए धर्म की रचना की और उसमें मानवीय व्यवहार के लिए एक आदर्श स्थापित करने का प्रयास किया । तत्कालीन काल खंड में वह उचित रहा होगा लेकिन आज जबकि समस्याएं बिखरी पड़ी हैं , उनके आयाम विलक्षण हैं ।
    समस्याएं आज की और समाधान पांच हज़ार वर्ष या दो हज़ार वर्ष या चौदह सौ वर्ष या पांच सौ वर्ष पुराने ! ये समाधान नाकाफी हैं यह स्वयंसिद्ध है , विशेषकर तब जब अपने – अपने श्रेष्ठता का दम्भ सर्वोपरि होगा ।
    एक उदाहरण देकर मैं ध्यान आकृष्ट करूँ, तीसरा विश्वयुद्ध नहीं होने या परमाणु युद्ध नहीं होने का कारण राष्ट्राध्यक्षों में धार्मिक वजहों से मानवीय भविष्य के बारे में उपजी करुणा नहीं बल्कि विनाश के ऐसे तांडव की आशंका है जिसमें किसी के बचने की संभावना नहीं है ।
    सत्ता की राजनीति और कथित तौर पर धार्मिक श्रेष्ठता का उन्माद हमारी उस चेतना पर पर्दा डाल देती है कि हम सब का साझा भविष्य आपसी सद्भाव और सहअस्तित्व में निहित है । किसी धार्मिक श्रेष्ठता का दम्भ नहीं । हैरत है कि हमारे जेहन में ये बात नहीं आती की पड़ोस के घर लगी आग की तपन से हम अछूते नहीं रह सकते ।

  4. सहज मन में उठने वाले सहज प्रश्नों का अच्छा आकलन है। ऐसे ही प्रश्न हमारी समझ और चेतना को उन्नत बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इस सन्दर्भ में समझने की बात यह है कि समस्याओं के सही निदान के लिए समस्या को सही परिपेक्ष्य में समझना अत्यंत आवश्यक है। हमारी सबसे पहली और सबसे बड़ी गलती यही है कि हम धर्म का मूल डर और असुरक्षा से समझते हैं।जबकि इसके मूल में सबके कल्याण के साथ साथ व्यक्तिगत कल्याण निहित है। दूसरे- समस्याओं के लिए धर्म को दोष देना उचित नहीं क्योंकि धर्म दोषी नहीं बल्कि धर्म के आचरण का अभ्यास करने वाले दोषी हैं। तीसरे – कारण और प्रभाव (cause and effect) से संचालित विश्व में किसी एक धर्म के अनुयायईयों से,चाहे वह अल्पसंख्यक हों या बहुसंख्यक एक तरफा आदर्श आचरण की अपेक्षा बेमानी है। चौथे- इस कारण और प्रभाव के चलते कर्म सिद्धांत भी अपनी भूमिका निभाता है और सबको अपने अपने हिस्से का कर्म फल भोगना ही पड़ता है।
    यदि धर्म में कोई त्रुटि होती तो विश्व के सच्चे धर्मात्माओं को लोग आज ना पढ़ रहे होते और ना ही उनकी चर्चा हो रही होती। रही बात सौहार्दपूर्ण संबंधों और वातावरण की। मुझे लगता है कि राजनीतिक अपेक्षाओं को जब तक धर्मिक अपेक्षाओं से जोड़ा जाता रहेगा, तब तक वातावरण में तो उथल पुथल रहेगी लेकिन सम्बंध आपसी व्यावहार पर निर्भर होने के कारण बहुत अधिक प्रभावित नहीं होंगे। ऐसा सोचने के पीछे का कारण यह है कि अगर 96 प्रतिशत मुस्लिम वोट एकमुश्त पड़ने पर जैसे
    हमारे संबंध उनसे नहीं बिगड़ते, वैसे ही शत प्रतिशत हिन्दू वोट एकजुट होने पर भी उनके संबंध हमसे नहीं बिगड़ेंगे। साथ ही वैश्विक शक्तियों और उनके खेल को भी हर भारतीय को समझना होगा। आपसी सौमनस्य बढ़े बिना सहअस्तित्व की कल्पना झूठी है और यह तभी बढ़ेगा जब व्यवहार के धरातल पर किसी भी धर्म या जाति के साथ भेदभाव ना हो। ऐसे नेताओं के उभरने की ,समर्थन की जरूरत है ।

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