ओम निश्चल* पारुल बंसल की कविताएं इस वेबपत्रिका में प्रकाशित होती रही हैं और इस पत्रिका के पाठक स्त्री अस्मिता पर लिखी उनकी रचनाओं से बखूबी वाकिफ़ हैं। हाल ही में...
Manoj Pandey* I am neither a psephologist nor a political analyst. I am a media/ social media watcher trying to share my take on how social media might (or might not?) influence voting...
सुधीरेन्द्र शर्मा* क्या यह कहना सही होगा कि हम कुछ खास दिनों को तो 'सेलिब्रेट' करते हैं (जैसे आज Mothers’ Day  मना रहे हैं) लेकिन दिन के भीतर समाए हुए विभिन्न 'प्रहरों ' को...
डॉ मधु कपूर* पिछले कुछ समय से इस वेब-पत्रिका में हम विभिन्न दार्शनिक सिद्धांतों पर डॉ मधु कपूर के लेख प्रकाशित कर रहे हैं जिनमें वह दर्शन या फिलोसॉफी की गूढ़ गुत्थियों को हमारे...
सुधीरेन्द्र शर्मा* 35 वर्ष पूर्व ईरान के धार्मिक और राजनीतिक नेता अयातुल्लाह ख़ुमैनी ने भारत में जन्मे ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी के ख़िलाफ़ फ़रवरी 1989 में फतवा जारी किया था  जिसमें उन्होंने रुश्दी...
डॉ मधु कपूर* आजकल पूरे विश्व में ‘उत्तर-सत्य काल’ या ‘Post-truth Era’ का बोलबाला है। ऐसे में उपलब्ध तथ्यों की पड़ताल करके सत्य की पहचान करना एक दुरूह कार्य हो गया है।...
राजेन्द्र भट्ट* राजेन्द्र भट्ट के नए-नए साहित्यिक प्रयोगों की प्रयोगशाला यह वेबपत्रिका ही है। अभी कुछ रोज़ पहले उनका ऐसा ही प्रयोग“मूली लौट आई” के साथ-साथ “कहानी पन्नालाल की” में भी आप...
सुधीरेन्द्र शर्मा* रिश्तेदारी का उद्गम कैसे और कब हुआ इस पर विचार करने से अच्छा तो यह है कि हम यह जांचें कि 'यह कहाँ आ गए यूँ ही साथ-साथ चल के'।  जहाँ तक...
राजेन्द्र भट्ट* ‘जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध’ - रामधारी सिंह दिनकर की यह कालजयी चेतावनी समर से मुंह छिपाए, सुविधाजीवी वर्ग को आज भी आईने की तेज चमक दिखा सकती...
डॉ मधु कपूर* काल का व्यक्तित्व बहु आयामी है। हमारी हर क्रिया में काल कहीं  न कहीं  नेपथ्य में  छिपा रहता है। कोई कहता है यह नित्य अपरिवर्तनीय, निरपेक्ष...

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