Continuing experiment with his musings on a variety of subjects  through conversations, Onkar Kedia* writes another piece for us. His earlier piece can be seen here. I was surprised to see him. With no hair...
अमरदीप* सिर्फ धूप पहनना सुनो आज तुम धूप पहनना सिर्फ धूप सजा लेना अपनी माँग में!
क्या खूँटी पर लटके दिन देखे तुमने या फिर बिस्तर पर लेटी रातें करवटें बदलते पहर और घंटे या फिर तुमने देखे  दर्द से कराहाते पल?
पारुल बंसल* दुपट्टा - 1 सूर्य की किरणों की डोर बांधकर सुखाया है मैंने अपना वह दुपट्टा जिसे ओढ़ भीगी थी यौवन...
पूनम जैन* राम तो बसते हैं हर कण में, हर मन मेंवो हो श्रमिक, किसान या दलित हर जन मेंजहां इनका श्रम है, वहीं राम का मन्दिर हैइस धरती,...
ओंकार केडिया* इन उजड़ी झोंपड़ियों के आसपास कुछ टूटी चूड़ियां हैं,कुछ बदरंग बिंदियाँ हैं,कुछ टूटे फ्रेम हैं चश्मों के,कुछ तुड़ी-मुड़ी कटोरियाँ हैं.यहाँ कुछ अधजली बीड़ियाँ हैं,कुछ...
पारुल हर्ष बंसल* दस्तक बदला-बदला और अजनबी सा है रुख हवाओं का...आंधियों की हो चुकी है दस्तक....बंद करना दरवाज़े और  खिड़कियों का  लाज़मी...
Ajeet Singh* (Radio-Vaani 1) During my reporting assignments for the AIR and Doordarshan News which I did for almost three decades, there were several occasions when I met celebrities, even...
सुभद्रा कुमारी चौहान की कविताओं के बहाने राजेन्द्र भट्ट ने इस लेख में यह सिफ़ारिश की है कि कविताओं को पढ़ते-गुनते समय अगर आप अपना बुद्धिजीवी और अति-गंभीर होने का आग्रह छोड़ कर समालोचना करेंगे तो इस...
खंडहर नष्ट करो मुझे पूराआधा नष्ट अपमान है निर्माण कामेरा पुनर्निर्माण मत करनामत करना मेरे कंगूरों पर चूना आधे उड़े रंग  वाले भित्तिचित्र ध्वस्त करनाले जाने देना चरवाहे को मेरी...

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